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________________ षडुत्तरशतं पर्व कनकप्रभसंज्ञस्य तत्र विद्याभृतां विभोः । विभूति गगने वीचय प्रशान्तोऽपि न्यदानयत् ॥१६५॥ अलं विभवमुक्तेन तावन्मुक्तिपदेन मे । ईगैश्वर्यमाप्नोमि तपोमाहात्म्यमस्ति चेत् ॥१६६॥ अहो पश्यत मूढत्वं जनितं पापकर्मभिः । रत्नं त्रैलोक्यमूल्यं यद्विक्रीतं शाकमुष्टिना ॥१६७॥ भवन्त्युद्भवकालेषु विपद्यन्ते विपर्यये । धियः कर्मानुभावेन केन किं क्रियतामिह ॥१६॥ निदानदूषितात्मासौ कृत्वातिविकटं तपः। सनत्कुमारमारुतत्तत्र भोगानसेवत ॥१६॥ च्युतः पुण्यावशेषेण भोगस्मरगमानसः । रत्नश्रवःसुतो जातो कैकस्यां रावणाभिधः ॥१७॥ लकायां च म हैश्वर्य प्राप्तो दुर्लढितक्रियम् । कृतानेकमहाश्चर्य प्रतापाक्रान्तविष्टपम् ॥१७॥ असौ तु ब्रह्मलोकेशो दशसागरसम्मितम् । स्थित्वा कालं स्युतो जातो रामो दशरथात्मजः ॥१७२॥ तस्यापराजितासूनोः पूर्वपुण्यावशेषतः । भूत्या रूपेण वीर्येण समो जगति दुर्लभः ॥१७३॥ धनदत्तोऽभवद्योऽसौ सोऽयं पद्मो मनोहरः । यशसा चन्द्रकान्तेन समाविष्टब्धविष्टपः ॥१७४।। वसुदत्तोऽभवद्यश्च श्रीभूतिश्च द्विजः क्रमात् । जातो नारायणः सोऽयं सौमित्रिः श्रीलतातरुः ॥१७५॥ श्रीकान्तः क्रमयोगेन योऽसौ शम्भुत्वमागतः। अभूत्प्रभासकुन्दश्च सञ्जातः स दशाननः ।।१७६॥ येनेह भरतक्षेत्रे खण्डनयमखण्डितम् । अङ्गुलान्तरविन्यस्तमिव वश्यत्वमाहृतम् ॥१७७॥ आसीद् गुणवती या तु श्रीभूतेश्च सुता क्रमात् । सेयं जनकराजस्य सीतेति तनयाऽजनि ॥१७॥ जो कि स्मृतिमें आते ही पापका नाश करनेवाला था ॥१६२-१६४॥ यद्यपि वह शान्त था तथापि उसने वहाँ आकाशमें कनकप्रभ नामक विद्याधरकी विभूति देख निदान किया कि मुझे वैभवसे राहत मुक्तिपदकी आवश्यकता नहीं है। यदि मेरे तपमें कुछ माहात्म्य है तो मैं ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त करूँ ॥१६५-१६६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो पापकर्मके उदयसे उत्पन्न हुई मूर्खता तो देखो कि उसने त्रिलोकी मूल्य रत्नको शाककी एक मुट्ठी में बेच दिया ॥१६७॥ अथवा ठीक है क्योंकि कर्मों के प्रभावसे अभ्युदयके समय मनुष्यके सद्बुद्धि उत्पन्न होती है और विपरीत समय में सद्बुद्धि नष्ट हो जाती है । इस संसारमें कौन क्या कर सकता है ? ॥१६८।। । तदनन्तर जिसकी आत्मा निदानसे दूषित हो चुकी थी ऐसा प्रभासकुन्द, अत्यन्त विकट तप कर सनत्कुमार स्वर्गमें आरूढ़ हुआ और वहाँ भोगोंका उपभोग करने लगा ॥१६॥ तत्पश्चात् भोगोंके स्मरण करने में जिसका मन लग रहा था ऐसा वह देव अवशिष्ट पुण्यके प्रभाव वश वहाँसे च्युत हो लङ्का नगरीमें राजा रत्नश्रवा और उनकी रानी कैकसीके रावण नामका पुत्र हआ। वहाँ वह निदानके अनुसार उस महान ऐश्वर्यको प्राप्त हआ जिसकी क्रियाएँ अत्यन्त विलासपूर्ण थीं, जिसमें बड़े-बड़े आश्चर्यके काम किये गये थे तथा जिसने प्रतापसे समस्त लोकको व्याप्त कर रक्खा था||१७०-१७१॥ तदनन्तर श्रीचन्द्रका जीव, जो ब्रह्मलोकमें इन्द्र हुआ था वहाँ दश सागर प्रमाण काल तक रह कर च्युत हो दशरथका पुत्र राम हुआ। उसकी माताका नाम अपराजिता था। पूर्व पुण्यके अवशिष्ट रहनेसे इस संसारमें विभूति, रूप और पराक्रमसे रामकी तुलना करनेवाला पुरुष दुर्लभ था ॥१७२-१७३॥ पहले जो धनदत्त था वही चन्द्रमाके समान यशसे संसारको व्याप्त करने वाला मनोहर राम हुआ है ॥१७४॥ पहले जो वसुदत्त था फिर श्रीभूति ब्राह्मण हुआ वही क्रमसे लक्ष्मी रूपी लताके आधारके लिए वृक्षस्वरूप नारायण पदका धारी यह लक्ष्मण हुआ है ।।१७।। पहले जो श्रीकान्त था वही क्रम-क्रमसे शम्भु हुआ फिर प्रभासकुन्द हुआ और अब रावण हुआ था ॥१७६॥ वह रावण कि जिसने भरतक्षेत्रके सम्पूर्ण तीन खण्ड अंगुलियोंके ब्रोचमें दबे हुएके समान अपने वश कर लिये थे ॥१७७॥ जो पहले गुणवती थी फिर क्रमसे श्रीभूति १.निदानं चक्रेऽप्यन्यदा नयन् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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