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________________ पद्मपुराणे ज्ञात्वा सुदुर्जर वैरं सौमित्रेः रावणस्य च । महादुःखभयोपेतं निर्मत्सरमभूसदः ॥२३॥ मुनयः शक्किता जाता देवाश्चिन्ता परां गताः । राजानः प्रापुरुद्वेगं प्रतिबुद्धाच केचन ॥२३॥ विमुक्तगर्वसम्भाराः परिशान्ताः प्रवादिनः । अपि सम्यक्त्वमायाता भासन्ये कर्मकर्कशाः ॥२३॥ कर्मदौरात्म्यसम्भारक्षणमात्रकमूर्छिता । समाश्वसरसभा हा ही धिक् चित्रमिति वादिनी ॥२४॥ कृत्वा करपुटं मूनि प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । मनुष्यासुरगीर्वाणाः प्रशशंसुर्विभीषणम् ॥२४॥ भवत्समाश्रयाद्भद्र श्रुतमस्माभिरुत्तमम् । चरितं बोधनं पुण्यं मुनिपादप्रसादतः ॥२४२॥ ततो नरेन्द्रदेवेन्द्रमुनीन्द्राः सम्मदोत्कटाः । सर्वशं तुष्टुवुः सर्वे परिवर्गसमन्विताः ॥२४३।। त्रैलोक्यं भगवन्नेतत्त्वया सकलभूषण । भूषितं तेन नामेदं तव युक्तं सहार्थकम् ॥२४॥ तिरस्कृत्य श्रियं सर्वा ज्ञानदर्शनवर्तिनी । केवलश्रीरियं भाति तव दूरीकृतोपमा ॥२४५॥ अनाथमध्रवं दीनं जन्ममृत्युवशीकृतम् । क्लिश्यतेऽदो जगत्प्राप्त स्वं पदं जैनमुत्तमम् ॥२४६॥ शार्दूलविक्रीडितम् नानाव्याधिजरावियोगमरणप्रोद्भूतिदुःखं परं । प्राप्तानां मृगयुप्रवेजितमृगबातोपमावर्तिनाम् । कृच्छ्रोत्सर्जनदारुणाशुभमहाकावरुद्धात्मना मस्माकं कृतकार्य यच्छ निकटं कर्मक्षयं केवलिन् ॥२४७॥ मनुष्य परम विस्मयको प्राप्त हुए ॥२३६॥ लक्ष्मण और रावणके सुदृढ़ वैरको जानकर समस्त सभा महादुःख और भयसे सिहर उठी तथा निर्वैर हो गई। अर्थात् सभाके सब लोगोंने वैरभाव छोड़ दिया ।।२३७॥ मुनि संसारसे भयभीत हो गये, देवलोग परम चिन्ताको प्राप्त हुए, राजा उद्वेगको प्राप्त हुए और कितने ही लोग प्रतिबुद्ध हो. गये ।।२३८।। अपनी वक्तृत्व-शक्तिका अभिमान रखनेवाले कितने ही लोग अहंकारका भार छोड़ शान्त हो गये । जो कर्मोदयसे कठिन थे अर्थात् चारित्रमोहके तीब्रोदयसे जो चारित्र धारण करनेके लिए असमर्थ थे उन्होंने केवल सम्यग्दर्शन प्राप्त किया ॥२३॥ कर्मोकी दुष्टताके आरसे जो क्षणभरके लिए मूञ्छित हो गई थी ऐसी सभा 'हाहा, धिक् चित्रम्' आदि शब्द कहती हुई साँसें भरने लगी।॥२४०॥ मनुष्य, असुर और देव हाथ जोड़ मस्तकसे लगा मुनिराजको प्रणामकर विमीषणकी प्रशंसा करने लगे कि हे भद्र ! आपके आश्रयसे ही मुनिराजके चरणोंका प्रसाद प्राप्त हुआ है और उससे हमलोग इस उत्तम ज्ञानवर्धक पुण्य चरितको सुन सके हैं ॥२४१-२४२॥ तदनन्तर हर्षसे भरे एवं अपने-अपने परिकरसे सहित समस्त नरेन्द्र सुरेन्द्र और मुनीन्द्र सर्वज्ञदेवकी स्तुति करने लगे ॥२४३॥ कि हे सकलभूषण ! भगवन् ! आपके द्वारा ये तीनों लोक भूषित हुए हैं इसलिए आपका यह 'सकलभूषण' नाम सार्थक है ।।२४४॥ ज्ञान और दर्शनमें वर्तमान तथा उपमासे रहित आपकी यह केवलज्ञानरूपी लक्ष्मी संसारको अन्य समस्त लक्ष्मियों का तिरस्कार कर अत्यधिक सुशोभित हो रही है ॥२४५।। अनाथ, अध्रुव, दीन तथा जन्म जरा मृत्युके वशीभूत हुआ यह संसार अनादि कालसे क्लेश उठा रहा है पर आज आपके प्रसादसे जिनप्रदर्शित उत्तम आत्मपदको प्राप्त हुआ है।॥२४६॥ हे केवलिन् ! हे कृतकृत्य ! जो नाना प्रकारके रोग, बुढ़ापा, वियोग तथा मरणसे उत्पन्न होनेवाले परम दुःखको प्राप्त हैं, जो शिकारीके द्वारा डराये हुए मृगसमूहकी उपमाको प्राप्त हैं तथा कठिनाईसे छूटनेयोग्य दारुण एवं अशुभ महाकर्मोसे जिनकी आत्मा अवरुद्ध है-घिरी हुई हैं ऐसे हम लोगोंके लिए शीघ्र ही कोका क्षय १. चिन्तान्तरं ज० । २. दूरात्म म० । दूरात्म्य ज० । ३. मनुष्यसुरगीर्वाणाः म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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