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________________ ३०८ पद्मपुराणे मणिमात्मके कान्ते मुक्ताजालविराजिते । रमते स्म विमानेऽसौ दिव्यस्त्रीनयनोत्सवः ॥२३॥ या 'श्रीश्चद्रचरस्यास्य न वा वाचस्पतेरपि । संवत्सरशतेनाऽपि शक्या वक्तुं विभीषण ॥१२॥ अनयं परमं रत्नं रहस्यमुपमोज्झितम् । त्रैलोक्यप्रकटं मूढा न विदुर्जिनशासनम् ॥१२५॥ मुनिधर्मजिनेन्द्राणां माहात्म्यमुपलभ्य सत् । मिथ्याभिमानसंमूढा धर्म प्रति पराङ्मुखाः ॥१२॥ इहलोकसुखस्याथ शिशुर्यः कुमते रतः । तदसौ कुरुते स्वस्य ध्यायपि न यद्विषः ॥१२॥ कर्मबन्धस्य चित्रत्वान्न सर्वो बोधिभाग्जनः । केचिल्लब्ध्वाऽपि मुञ्चन्ति पुनरन्यव्यपेक्षया ॥१२॥ बहुकुत्सितलोकेन गृहीते बहुदोषके । 'मारंध्वं निन्दिते धर्मे कुरुध्वं उचिरस्वबन्धुताम् ॥१२६॥ जिनशासनतोऽन्यत्र दुःखमुक्तिन विद्यते । तस्मादनन्यचेतस्का जिनमर्चयताऽनिशम् ॥१३०॥ त्रिदशत्वान्मनुष्यत्वं सुरत्वं मानुषत्वतः । एवं मनोहरं प्राप्तो धनदत्तो निवेदितः ॥१३॥ वच्याम्यतः समासेन वसुदत्तादिसंसृतिम् । कर्मणां चित्रतायोगात् चित्रत्वमनुविभ्रतीम् ॥१३२॥ पुरे मृणालकुण्डाख्यो प्रतापी यशसोज्ज्वलः । राजा विजयसेनाख्ये रत्नचूलास्य भामिनी ॥१३॥ वज्रकम्बुः सुतस्तस्य हेमवत्यस्य भामिनी । शम्भुनामा तयोः पुत्रः प्रख्यातो धरणीतले ॥१३॥ पुरोधाः परमस्तस्य श्रीभूतिस्तत्वदर्शनः । तस्य परनीगुणेर्युक्ता पत्नी नाम्ना सरस्वती ॥१३॥ आसीद्गुणवती याऽसौ तिर्यग्योनिषु सा चिरम् । भ्रान्त्वा कर्मानुभावेन सम्यग्धर्मविवर्जिता ॥१३॥ उनकी ओर देखते थे तब उन जैसा वैभव प्राप्त करनेके लिए उत्कण्ठित हो जाते थे ॥१२२।। देवाङ्गनाओंके नेत्रोंको उत्सव प्रदान करनेवाले वे ब्रह्मेन्द्र, मणि तथा सुवर्णसे निर्मित एवं मोतियोंकी जालीसे सुशोभित सुन्दर विमानमें रमण करते थे ।।१२३॥ श्रीसकलभूषण केवली कहते हैं कि हे विभीषण ! श्रीचन्द्र के जीव ब्रह्मेन्द्रकी जो विभूति थी उसे बृहस्पति भी सौ वर्षमें भी नहीं कह सकता ॥१२४।। जिनशासन अमूल्य रत्न है, अनुपम रहस्य है तथा तीनों लोकोंमें प्रकट है परन्तु मोही जीव इसे नहीं जानते ॥१२॥ मुनिधर्म तथा जिनेन्द्रदेवके उत्तम माहात्म्य को जानकर भी मिथ्या अभिमानमें चर रहनेवाले मनुष्य धर्मसे विमुख रहते हैं ॥१२६।। जो बालक अर्थात् अज्ञानी इस लोकसम्बन्धी सुखके लिए मिथ्यामतमें प्रीति करता है वह अपना ध्यान रखता हुआ भी उसका वह अहित करता है जिसे शत्रु भी नहीं करते ॥१२७|| कर्मबन्धकी विचित्रता होनेसे सभी लोग रत्नत्रयके धारक नहीं हो जाते । कितने ही लोग उसे प्राप्त कर भी दूसरेके चक्रमें पड़कर पुनः छोड़ देते हैं ।।१२८॥ हे भव्यजनो ! अनेक खोटे मनुष्यों के द्वारा गृहीत एवं बहुत दोषोंसे सहित निन्दित धर्ममें रमण मत करो। अपने चित् स्वरूपके साथ बन्धुताका काम करो ॥१२६।। जिनशासनको छोड़कर अन्यत्र दुःखसे मुक्ति नहीं है इसलिए हे भव्यजनो! अनन्यचित्त हो निरन्तर जिनभगवान्को अर्चा करो ॥१३०॥ इस प्रकार देवसे उत्तम मनुष्य पर्याय और मनुष्यसे उत्तम देवपर्यायको प्राप्त करनेवाले धनदत्तका वर्णन किया ॥१३१।। अब संक्षेपसे कर्मोकी विचित्रताके कारण विविधरूपताको धारण करनेवाले, वसुदत्तादिके भ्रमणका वर्णन करता हूँ ॥१३२॥ अथानन्तर मृणालकुण्डनामक नगरमें प्रतापवान् तथा यशसे उज्ज्वल विजयसेन नामका राजा रहता था । रत्नचूला उसकी स्त्री थी ।।१३३।। उन दोनोंके वनकम्बु नामका पुत्र था और हेमवती उसकी स्त्री थी। उन दोनोंके पृथिवीतलपर प्रसिद्ध शम्भु नामका पुत्र था ॥१३४॥ उसके श्रीभूति नामका परमतत्त्वदर्शी पुरोहित था और उसकी बीके योग्य गुणोंसे सहित सरस्वती नामकी स्त्री थी ॥१३५।। पहले जिस गुणवतीका उल्लेख कर आये हैं वह समीचीन धर्मसे रहित १. श्रीचन्द्रचरस्यास्य म०। २. रागं मा कुरुत । मारध्वं म० । ३. चेत्स्वबन्धुना म०, ख०, ज०। ४. मनोहरप्राप्तो म०। ५. मृणालकुण्डाख्यो म । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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