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________________ पडसरशतं पर्व ३०७ निशम्येति मुनेरुक्तं श्रीचन्द्रो बोधिमाश्रितः । पराचीनत्वमागच्छन् विषयास्वादसौख्यतः ॥१०॥ तिकान्ताय पुत्राय दत्त्वा राज्यं महामनाः । समाधिगुप्तनाथस्य पावें श्रामण्यमग्रहीत् ॥११॥ सम्यग्भावनया युक्तीयोगी शुद्धिमादधन् । ससमित्यान्वितो गुप्तया रागद्वेषपराङमुखः॥१११॥ रत्नत्रयमहाभूषः सात्यादिगुणसङ्गतः। जिनशासनसम्पूर्णः श्रमणः सुसमाहितः ॥११२॥ पञ्चोदारव्रताधारः सत्वानामनुपालकः । सप्तमीस्थाननिर्मुक्तो धृत्या परमयान्वितः ॥११३॥ सुविहारपरः सोढा परीषहगणान् मुनिः। षष्ठाष्टमा मासादिकृतसंशुद्धपारणः ॥११॥ ध्यानस्वाध्याययुक्तात्मा निर्ममोऽतिजितेन्द्रियः। निनिंदानकृतिः शान्तः परः शासनवत्सलः ॥११५॥ प्रासुकाचारकुशलः ससानुग्रहतत्परः । बालाप्रकोटिमात्रेऽपि स्पृहामुक्तः परिग्रहे ॥११६॥ अस्नानमलसाध्वङ्गो निराबन्धो निरम्बरः । एकरात्रस्थितिमे नगरे पञ्चरात्रभाक ।।११७॥ कन्दरापुलिनोद्याने प्रशस्तावाससङ्गमः। व्युत्सृष्टाङ्गः स्थिरो मौनी विद्वान् सम्यकतपोरतः ॥१८॥ एवमादिगुणः कृत्वा जर्जरं कर्मपञ्जरम् । श्रीचन्द्रः कालमासाद्य ब्रह्मलोकाधिपोऽभवत् ॥११६।। निवासे परमे तत्र श्रीकीर्तिद्युतिकाम्तिभाक् । चूडामणिकृतालोको भुवनत्रयविश्रुतः ॥१२०॥ ऋद्धया परमया क्रीडन्समनुध्यानजन्मना । अहमिन्द्रसुरो यद्वदासीद् भरतभूपतिः ॥१२॥ नन्दनादिषु देवेन्द्राः सौधर्माचाः सुसम्पदः । तिष्ठत्युदीक्षमाणास्तं तदुत्कण्ठापरायणाः॥१२२॥ मुनियोंने अपने शुक्ल ध्यान रूपी नेत्रके द्वारा दुःख रूपी वन्य पशुओंसे व्याप्त इस अत्यन्त विशाल समस्त कर्मरूपी अटवीको भस्म किया है ॥१०८॥ इस प्रकार मुनिराजका उपदेश सुन कर श्रीचन्द्र विषयास्वाद-सम्बन्धी सुखसे पराङ्मुख हो रत्नत्रयको प्राप्त हो गया ॥१०६॥ फल. स्वरूप उस उदारचेताने धृतिकान्त नामक पुत्रके लिए राज्य देकर समाधिगुप्त मुनिराजके समीप मुनिदीक्षा धारण कर ली ॥११०॥ अब वे श्रीचन्द्रमुनि समीचीन भावनासे सहित थे, त्रियोग सम्बन्धी शुद्धिको धारण करते थे, समितियों और गुप्तियोंसे सहित थे तथा राग-द्वेषसे विमुख थे ॥१११॥ रत्नत्रय रूपी उत्तम अलंकारोंसे युक्त थे, क्षमा आदि गुणोंसे सहित थे, जिन-शासन से ओत-प्रोत थे, श्रमण थे और उत्तम समाधानसे युक्त थे ॥११२॥ पञ्च महाव्रतोंके धारक थे, प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले थे, सात भयोंसे निर्मक्त थे तथा उत्तम धैर्यसे सहित थे॥१ ईर्यासमितिपूर्वक उत्तम विहार करने में तत्पर थे, परीषहोंके समहको सहन करने वाले थे, मुनि थे, तथा बेला, तेला और पक्षोपवासादि करनेके बाद पारणा करते थे ॥११४॥ ध्यान और स्वाध्यायमें निरन्तर लीन रहते थे; ममता रहित थे, इन्द्रियोंको तोब्रतासे जीतने वाले थे, उनके कार्य निदान अर्थात् आगामी भोगाकांक्षासे रहित होते थे, वे परम शान्त थे और जिन शासनके परम स्नेही थे ॥११५।। अहिंसक आचरण करनेमें कुशल थे, मुनिसंघपर अनुग्रह करनेमें तत्पर थे, और बालकी अनीमात्र परिग्रहमें भी इच्छासे रहित थे ।।११६।। स्नानके अभावमें उनका शरीर मलसे सुशोभित था, वे आसक्तिसे रहित थे, दिगम्बर थे, गाँवमें एक रात्रि और नगरमें पाँच रात्रि तक ही ठहरते थे ॥११७|| पर्वतकी गुफाओं, नदियोंके तट अथवा बाग-बगीचोंमें ही उनका उत्तम निवास होता था, उन्होंने शरीरसे ममता छोड़ दी थी, वे स्थिर थे, मौनी थे, विद्वान थे और सम्यक् तपमें तत्पर थे ॥११८॥ इत्यादि गुणोंसे सहित श्रीचन्द्रनुनि कामरूपी पञ्जरको जर्जर-जीर्ण-शीर्णकर तथा समाधिमरण प्राप्तकर ब्रह्मस्वर्गके इन्द्र हुए ॥११॥ वहाँ वे उत्तम विमानमें श्री, कीर्ति, द्यति और कान्तिको प्राप्त थे, चूड़ामणिके द्वारा प्रकाश करनेवाले थे, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध थे ॥१२०॥ यद्यपि ध्यान करते ही उत्पन्न होनेवाली परम ऋद्धिसे क्रीड़ा करते थे तथापि अहमिन्द्रदेवके समान अथवा भरत चक्रवर्तीके समान निर्लिप्त हो रहते थे ॥१२१॥॥ नन्दन वन आदि स्थानों में उत्तम सम्पदाओंसे युक्त सौधर्म आदि इन्द्र जब १. साध्वङ्गे म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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