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________________ पञ्चोत्तरशतं पर्व विनयो नियमः शीलं ज्ञानं दानं दया दमः । ध्यानं च यत्र मोक्षार्थ सुचारित्रं तदुच्यते ॥२२३॥ एतद्गुणसमायुक्तं जिनेन्द्रवचनोदितम् । श्रेयः सम्प्राप्तये सेव्यं चारित्रं परमोदयम् ॥२२॥ शक्यं करोत्यशक्ये तु श्रद्धावान् स्वस्य निन्दकः । सम्यक्त्वसहितो जन्तुः शक्तश्चारित्रसङ्गतः ॥२२५॥ यत्र त्वेते न विद्यन्ते समीचीना महागुणाः । तत्र नास्ति सुचारित्रं न च संसारनिर्गमः ॥२२६॥ दयादमक्षमा यत्र न विद्यन्ते न संवरः। न ज्ञानं न परित्यागस्तत्र धर्मो न विद्यते ॥२२७॥ हिंसावितथचौर्यस्त्रीसमारम्भसमाश्रयः । क्रियते यत्र धर्मार्थ तत्र धर्मो न विद्यते ॥२२॥ दीक्षामुपेत्य यः पापे मूढचेताः प्रवर्तते । आरम्भिणोऽस्य चारित्रं विमुक्तिर्वा न विद्यते ॥२२६॥ पण्णां जीवनिकायानां क्रियते यत्र पीडनम् । धर्मव्याजेन सौख्यार्थ न तेन शिवमाप्यते ॥२३०॥ वधताडनबन्धाङ्कदोहनादिविधायिनः । ग्रामक्षेत्रादिसक्तस्य प्रव्रज्या का हतात्मनः ॥२३१॥ क्रयविक्रयसक्तस्य पक्तियाचनकारिणः । सहिरण्यस्य का मुक्तिर्दीक्षितस्य दुरात्मनः ॥२३२॥ मर्दनस्नानसंस्कारमाल्यधपानुलेपनम् । सेवन्ते दुर्विदग्धा ये दीक्षितास्ते न मोक्षगाः ॥२३३॥ हिंसां दोषविनिमुक्तां वदन्तः स्वमनीषया । शास्त्रं वेषं च वृत्तं च दूषयन्ति समूढकाः ॥२३॥ एकरात्रं वसन् ग्रामे नगरे पञ्चरात्रकम् । नित्यमूर्द्धभुजस्तिष्ठन् मासे मासे च पारयन् ॥२३५॥ मृगैः सममरण्यान्यां शयानो विचरन्नपि । कुर्वन्नपि भूगोः पातं मौनवान्निःपरिग्रहः ॥२३६॥ मिथ्यादर्शनदुष्टात्मा कुलिङ्गो बीजवर्जितः । पद्भ्यामगम्यदेशं वा नैवाप्नोति शिवालयम् ॥२३७॥ सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२२२।। जिसमें विनय, नियम, शील, ज्ञान, दया, दम और मोक्षके लिए ध्यान धारण किया जाता है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ।।२२३।। इस प्रकार इन गुणोंसे सहित, 'जिन शासनमें कथित, परम अभ्युदयका कारण जो सम्यक्चारित्र है, कल्याण प्राप्तिके लिए उसका सेवन करना चाहिए ।।२२५॥ सम्यग्दृष्टि जीव शक्य कार्यको करता है और अशक्य कार्यकी द्धा रखता है परन्तु जो शक्त अर्थात् समर्थ होता है वह चारित्र धारण करता है ॥२२॥ जिसमें पूर्वोक्त समोचीन महागुण नहीं हैं उसमें सम्यक्चारित्र नहीं है, और न उसका संसारसे निकलना होता है ॥२२६।। जिसमें दया, दम, क्षमा नहीं हैं, संवर नहीं है, ज्ञान नहीं है, और परित्याग नहीं हैं उसमें धर्म नहीं रहता ।।२२७|| जिसमें धर्मके लिए हिंसा, मूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहका आश्रय किया जाता है वहाँ धर्म नहीं है ॥२२८॥ जो मूर्ख हृदय दीक्षा लेकर पापमें प्रवृत्ति करता है उस आरम्भीके न चारित्र है और न उसे मुक्ति प्राप्त होती है ॥२२६।। जिसमें धर्मके बहाने सुख प्राप्त करनेके लिए छह कायके जीवोंकी पीडा की जाती है उस धर्मसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥२३०|| जो मारना, ताडना, बाँधना, आँकना तथा दोहना आदि कार्य करता है तथा गाँव, खेत आदिमें आसक्त रहता है उस अनात्मज्ञका दीक्षा लेना क्या है ? ॥२३१॥ जो वस्तुओंके खरीदने और बेंचने में आसक्त है, स्वयं भोजनादि पकाता है अथवा दूसरेसे याचना करता है, और स्वर्णादि परिग्रह साथ रखता है, ऐसे आत्महीन दीक्षित मनुष्यको क्या मुक्ति प्राप्त होगी ? ॥२३२॥ जो अविवेकी मनुष्य दीक्षित होकर मर्दन, स्नान, संस्कार, माला, धूप तथा विलेपन आदिका सेवन करते हैं वे मोक्षगामी नहीं हैं-उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं होता ॥२३३॥ जो अपनी बुद्धिसे हिंसाको निर्दोष कहते हुए शास्त्र वेष तथा चारित्रमें दोष लगाते हैं वे मूढ़तासे सहित हैं-मिथ्यादृष्टि हैं ॥२३४।। जो गाँवमें एक रात और नगरमें पाँच रात रहता है, निरन्तर ऊपरकी ओर भुजा उठाये रहता है, महीने-महीने में एक बार भोजन करता है, मृगों के साथ अटवीमें शयन करता है, उन्हींके साथ विचरण करता है, भृगुपात भी करता है, मौनसे रहता है, और परिग्रहका त्याग करता है, वह मिथ्या दर्शनसे दूषित होनेके कारण कुलिङ्गी है . तथा मोक्षके कारण जो सम्यग्दर्शनादि उनसे रहित है। ऐसा जीव पैरोंसे चलकर किसी अगम्य १. भुक्त-म० । २. आरम्भितोऽ -म० । ३. च म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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