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________________ पञ्चोत्तरशतं पर्व यदीयं दर्शनं ज्ञानं लोकालोकप्रकाशकम् । क्षुदद्रव्यप्रकाशेन नैव ते भानुना समाः ॥१३॥ करस्थामलकज्ञानसर्वभागेऽप्यपुष्कलम् । छमस्थ पुरुषोत्पन्नं सिद्धज्ञानस्य नो समम् ॥१६॥ समं त्रिकालभेदेषु सर्वभावेषु केवली । ज्ञानदशनयुक्तात्मा नेतरः सोऽपि सर्वथा ॥१७॥ ज्ञानदर्शनभेदोऽयं यथा सिद्धेतरात्मनाम् । सुखेऽपि दृश्यतां तद्वत्तथा वीर्येऽपि दृश्यताम् ॥१६८।। दर्शनज्ञानसौख्यानि सकलत्वेन तत्त्वतः । सिद्धानां केवली वेत्ति शेषेष्वौपमिकं वचः ॥१६॥ अभव्यात्मभिरप्राप्यमिदं जैनेन्द्रमास्पदम् । अत्यन्तमपि यत्नाव्यैः कायसंक्लेशकारिभिः ॥२०॥ अनादिकालसम्बद्धां विरहेण विवर्जिताम् । अविद्यागेहिनी ते हि शश्वदाश्लिष्य शेरते ॥२०॥ विमुक्तिवनिताऽऽश्लेषसमुत्कण्ठापरायणाः । भव्यास्तु दिवसान कृच्छू प्रेरयन्ति तपःस्थिताः ॥२२॥ सिद्धिशक्तिविनिमुक्ता अभव्याः परिकीर्तिताः । भविष्यत्सिद्धयो जीवा भव्यशब्दमुपाश्रिताः ॥२०॥ जिनेन्द्रशासनादन्यशासने रघुनन्दन । न सर्वयत्नयोगेऽपि विद्यते कर्मणां यः ॥२०॥ यत्कर्म रुपयत्यज्ञो भूरिभिर्भवकोटिभिः । ज्ञानी मुहूर्तयोगेन त्रिगुप्तस्तदपोहयेत् ॥२०५॥ प्रतीतो जगतोऽप्येतत्परमात्मा निरञ्जनः । दृश्यते परमार्थेन यथा प्रक्षीणकर्मभिः ॥२०६॥ गृहीतं बहुभिर्विद्धि लोकमार्गमसारकम् । परमार्थपरिप्राप्त्यै गृहाण जिनशासनम् ॥२०७॥ एवं रघूत्तमः श्रुत्वा वचः साकलभूषणम् । प्रणिपत्य जगौ नाथ तारयाऽस्माद्भवादिति ॥२०॥ हैं उन सिद्धोंका सुख अपनी समानता नहीं रखता ॥१६॥ जिनका दर्शन और ज्ञान लोकालोकको प्रकाशित करनेवाला है, वे क्षुद्र द्रव्योंको प्रकाशित करनेवाले सूर्य के समान नहीं कहे जा सकते ॥१६५।। जो हाथ पर स्थित आँवलेके सर्वभागोंके जाननेमें असमर्थ है ऐसा छद्मस्थ पुरुषोंका ज्ञान सिद्धाके समान नहीं है॥१६६॥ त्रिकाल सम्बन्धी समस्त पदार्थों के विषयमें एक केवली ही ज्ञान दर्शनसे सम्पन्न होता है, अन्य नहीं ॥१६७॥ सिद्ध और संसारी जीवोंमें जिस प्रकार यह ज्ञान दर्शनका भेद है उसी प्रकार उनके सुख और वीर्यमें भी यह भेद समझना चाहिए ॥१८॥ यथार्थमें सिद्धोंके दर्शन, ज्ञान और सुखको सम्पूर्ण रूपसे केवली ही जानते हैं अन्य लोगोंके वचन तो उपमा रूप ही होते हैं ।।१६। यह जिनेन्द्र भगवान्का स्थान-सिद्धपद, अभव्य जीवोंको अप्राप्य है, भले हो वे अनेक यत्नोंसे सहित हों तथा अत्यधिक काय-क्लेश करनेवाले हों॥२००। इसका कारण भी यह है कि वे अनादि कालसे सम्बद्ध तथा विरहसे रहित अविद्यारूपी गृहिणीका निरन्तर आलिङ्गन कर शयन करते रहते हैं ।।२०१॥ इनके विपरीत मुक्तिरूपी स्त्रीके आलिङ्गन करनेमें जिनकी उत्कण्ठा बढ़ रही है ऐसे भव्य जीव तपश्चरणमें स्थित होकर बड़ी कठिनाईसे दिन व्यतीत करते हैं अर्थात् वे जिस किसी तरह संसारका समय बिताकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं ।।२०२।। जो मुक्ति प्राप्त करनेकी शक्तिसे रहित हैं वे अभव्य कहलाते हैं और जिन्हें मुक्ति प्राप्त होगी वे भव्य कहे जाते हैं ।।२०३॥ सर्वभूषण केवली कहते हैं कि हे रघुनन्दन ! जिनेन्द्रशासनको छोड़कर अन्यत्र सर्व प्रकारका यत्न होने पर भी कोका क्षय नहीं होता है ॥२०४॥ अज्ञानी जीव जिस कर्मको अनेक करोड़ों भवोंमें क्षीण कर पाता है उसे तीन गुप्तियोंका क ज्ञानी मनुष्य एक मुहूर्तमें ही क्षण कर देता है।।२०।। यह बात संसारमें भी प्रसिद्ध है कि यथार्थमें निरञ्जन-निष्कलङ्क परमात्माका दर्शन वही कर पाते हैं जिनके कि कर्म क्षीण हो गये हैं ॥२०६॥ यह सारहीन संसारका मार्ग तो अनेक लोगोंने पकड़ रक्खा है पर इससे परमार्थकी प्राप्ति नहीं, अतः परमार्थकी प्राप्तिके लिए एक जिनशासनको ही ग्रहण करो ॥२०७॥ इस प्रकार सकलभूषणके वचन सुनकर श्रीरामने प्रणाम कर कहा कि हे नाथ! इस संसार-सागरसे पार १. यत्नाद्यैः म० । २. सर्वरत्नम-० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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