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________________ २१२ पद्मपुराणे ध्रुवं परमनाबाधमुपमान विवर्जितम् । आत्मस्वाभाविकं सौख्यं सिद्धानां परिकीर्तितम् ॥१८॥ सुप्तचा किं ध्वस्तनिद्राणां नीरोगाणां किमौषधः। सर्वज्ञानां कृतार्थानां किं दीपतपनादिना ||१८२॥ आयुधैः किमभीतानां निर्मुक्तानामरातिभिः । पश्यतां विपुलं सर्वसिद्धार्थानां किमीहया ॥१३॥ महात्म सुखतृप्तानां किं कृत्यं भोजनादिना । देवेन्द्रा अपि यत्सौख्यं वाञ्छन्ति सततोन्मुखाः ॥१८॥ नास्ति यद्यपि तत्त्वेन प्रतिमाऽस्य तथाऽपि ते । वदामि प्रतिबोधार्थ सिद्धात्मसुखगोचरे ।।१८५।। सचक्रवर्तिनो माः सेन्द्रा यच्च सुराः सुखम् । कालेनान्तविमुक्तेन सेवन्ते भवहेतुजम् ॥१८॥ अनन्तपुरणस्यापि भागस्य तदकर्मणाम् । सुखस्य तुल्यतां नैति सिद्धानामीदृशं सुखम् ।।१८।। जनेभ्यः सुखिनो भूपाः भूपेभ्यश्चक्रवर्तिनः । चक्रिभ्यो व्यन्तरास्तेभ्यः सुखिनो ज्योतिषाऽमराः ॥१८॥ ज्योतिभ्यो भवनावासास्तेभ्यः कल्पभुवः क्रमात् । ततो वेयकावासास्ततोऽनुत्तरवासिनः ॥१८॥ अनन्तानन्तगुणतस्तेभ्यः सिद्धिपद स्थिताः । सुखं नापरमत्कृष्ट विद्यते सिद्धसौख्यतः ॥१६॥ अनन्तं दर्शनं ज्ञानं वीर्य च सुखमेव च । आत्मनः स्वमिदं रूपं तच्च सिद्धेषु विद्यते ॥१६१|| संसारिणस्तु तान्येव कर्मोपशमभेदतः । वैचित्र्यवन्ति जायन्ते बाह्यवस्तुनिमित्ततः ।।१६२।। शब्दादिप्रभवं सौख्यं शल्यितं व्याधिकीलकैः । नवव्रणभवे तत्र सुखाशा मोहहेतुका ।।१६३।। गत्यागतिविमुक्तानां प्रतीणक्लेशसम्पदाम् । लोकशेखरभूतानां सिद्धानामसमं सुखम् ॥१४॥ पर लगे हुए मधुके स्वादके समान है, स्वर्गका सुख जले हुए घावपर चन्दनके लेपके समान है और चक्रवर्तीका सुख विषमिश्रित अन्नके समान है ॥१८०।। किन्तु सिद्ध भगवानका जो सुख है वह नित्य है, उत्कृष्ट है, आबाधासे रहित है, अनुपम है, और आत्मस्वभावसे उत्पन्न है ॥१८१॥ जिनकी निद्रा नष्ट हो चुकी है उन्हें शयनसे क्या ? नीरोग मनुष्योंको औषधिसे क्या ? सर्वज्ञ तथा कृतकृत्य मनुष्योंको दीपक तथा सूर्य आदिसे क्या ? शत्रुओंसे रहित निर्भीक मनुष्योंके लिए आयुधोंसे क्या ? देखते-देखते जिनके पूर्ण रूपमें सब मनोरथ सिद्ध हो गये हैं ऐसे मनुष्योंको चेष्टासे क्या ? और आत्मसम्बन्धी महा सुखसे संतुष्ट मनुष्योंको भोजनादिसे क्या प्रयोजन है ? इन्द्र लोग भी सिद्धांके जिस सुखकी सदा उन्मुख रहकर इच्छा करते रहते हैं। यद्यपि यथार्थमें उस सुखकी उपमा नहीं है तथापि तुम्हें समझानेके लिए सिद्धोंके उस आत्मसुखके विषयमें कुछ कहता हूँ ॥१८२-१८५॥ चक्रवर्ती सहित समस्त मनुष्य और इन्द्र सहित समस्त देव अनन्त कालमें जिस सांसारिक सुखका उपभोग करते हैं वह कर्म रहित सिद्ध भगवान्के अनन्तवें सुखकी भी सदृशताको प्राप्त नहीं होता। ऐसा सिद्धोंका सुख है ॥१८६-१८७।। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा राजा सुखी हैं, राजाओंकी अपेक्षा चक्रवर्ती सुखी हैं, चक्रवर्तियोंकी अपेक्षा व्यन्तर देव सुखी हैं, व्यन्तर देवोंकी अपेक्षा ज्यौतिष देव सुखी हैं ॥१८८|| ज्यौतिष देवोंकी अपेक्षा भवनवासी देव सुखी हैं, भवनवासियोंकी अपेक्षा कल्पवासी देव सुखी हैं, कल्पवासी देवोंकी अपेक्षा ग्रैवेयक वासी सुखी हैं, अवेयकवासियोंकी अपेक्षा अनुत्तरवासी सुखी हैं ॥१८६॥ और अनुत्तरवासियोंसे अनन्तानन्त गुणित सुखी सिद्ध जीव हैं । सिद्ध जीवोंके सुखसे उत्कृष्ट दूसरा सुख नहीं है ॥१०॥ अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्तवीर्य और अनन्तसुख यह चतुष्टय आत्माका निज स्वरूप है और वह सिद्धोंमें विद्यमान है ॥१६॥ परन्तु संसारी जीवोंके वे ही ज्ञान दर्शन आदि कर्मोके उपशममें भेद होनेसे तथा बाह्य वस्तुओंके निमित्तसे अनेक प्रकारके होते हैं ॥१६२॥ शब्द आदि इन्द्रियोंके विषयोंसे होनेवाला सुख व्याधिरूपी कीलोंके द्वारा शल्य युक्त है इसलिए शरीरसे होनेवाले सुखमें सुखकी आशा करना मोहजनित आशा है ॥१६३॥ जो गमनागमनसे विमुक्त हैं, जिनके समस्त क्लेश नष्ट हो चुके हैं एवं जो लोकके मुकुट स्वरूप हैं अर्थात् लोकाग्रमें विद्यमान १. माहात्म्य- म० । २. सुचक्र-म०, ज० । For Private & Personal Use Only Jain Education international www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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