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________________ पञ्चोत्तरशतं पर्व ऊर्ध्व व्यन्तरदेवानां ज्योतिषां चक्रमुज्ज्वलम् । मेरुप्रदक्षिणं नित्यङ्गतिश्चन्द्रार्क राजकम् ||१६५|| संख्येयानि सहस्राणि योजनानां व्यतीत्य च । तत ऊर्ध्वं महालोको विज्ञेयः कल्पवासिनाम् || १६६ ॥ सौधर्माख्यस्तथैशानः कल्पस्तत्र प्रकीर्त्तितः । ज्ञेयः सानत्कुमारश्च तथा माहेद्रसंज्ञकः ।। १६७॥ ब्रह्म ब्रह्मोत्तरो लोको लान्तवश्च प्रकीर्त्तितः । कापिष्ठश्च तथा शुक्रो महाशुक्राभिधस्तथा ।। १६८ ।। शतारोऽथ सहस्रारः कल्पश्चानतशब्दितः । प्राणतश्च परिज्ञेयस्तत्परावारणच्युतौ ॥ १६६ ॥ नव ग्रैवेयकास्ताभ्यामुपरिष्टात्प्रकीर्त्तिताः । अहमिन्द्रतया येषु परमास्त्रिदशाः स्थिताः || १७० || विजयो वैजयन्तश्च जयन्तोऽथापराजितः । सर्वार्थसिद्धिनामा च पञ्चैतेऽनुत्तराः स्मृताः ।।१७१ ।। अग्रे त्रिभुवनस्यास्य क्षेत्रमुत्तमभासुरम् । कर्मबन्धनमुक्तानां पदं ज्ञेयं महाद्भुतम् || १७२ || ईषत्प्राग्भारसंज्ञासौ पृथिवी शुभदर्शना । उत्तानधवलच्छ्त्रप्रतिरूपा शुभावहा ॥१७३॥ सिद्धा यत्रावतिष्ठन्ते पुनर्भवविवर्जिताः । महासुखपरिप्राप्ताः स्वात्मशक्तिव्यवस्थिताः ॥१७४॥ रामो जगाद भगवन् तेषां विगतकर्मणाम् । संसारभावनिर्मुक्तं निर्दुःखं कीदृशं सुखम् ॥१७५॥ उवाच केवली लोकत्रितयस्यास्य यत्सुखम् । व्यावाधभङ्गदुः पाकै दुःखमेव हि तन्मतम् ।।१७६ ।। कर्मणाऽष्टप्रकारेण परतन्त्रस्य सर्वदा । नास्य संसारिजीवस्य सुखं नाम मनागपि ॥ १७७॥ यथा सुवर्णपिण्डस्य वेष्टितस्यायसा भृशम् । आत्मीया नश्यति छाया तथा जीवस्य कर्मणा ॥१७८॥ मृत्यु जन्मजराव्याधिसहस्रैः सततं जनाः । मानसैश्च महादुःखैः पीड्यन्ते सुखमत्र किम् ॥१७३॥ असिधारामधुस्वादसमं विषयजं सुखम् । दग्धे चन्दनवद्दिव्यं चक्रिणां सविषान्नवत् ॥ १८०॥ योग्य कहे गये हैं || १६४ || व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंका निवास ऊपर मध्यलोक में है । इनमें ज्योतिषी देवोंका चक्र देदीप्यमान कान्तिका धारक है, मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देता हुआ निरन्तर चलता रहता है तथा सूर्य और चन्द्रमा उसके राजा हैं ॥ १६५ ॥ ज्योतिश्चक्रके ऊपर संख्यात हजार योजन व्यतीत कर कल्पवासी देवोंका महालोक शुरू होता है यही ऊर्ध्वलोक कहलाता है ॥१६६॥ ऊर्ध्वलोक में सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार, आनत, प्राणत और आरण, अच्युत ये आठ युगलों में सोलह स्वर्ग हैं ।। १६७ - १६६ ॥ उनके ऊपर ग्रैवेयक कहे गये हैं जिनमें अहमिन्द्र रूपसे उत्कृष्ट देव स्थित हैं । ( नव ग्रैवेयक के आगे नव अनुदिश हैं और उनके ऊपर) विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि ये पाँच अनुत्तर विमान हैं ॥१७० - १७१ ।। इस लोकत्रयके ऊपर उत्तम देदीप्यमान तथा महा आश्चर्य से युक्त सिद्धक्षेत्र है जो कर्म बन्धन से रहित जीवोंका स्थान जानना चाहिए || १७२ || ऊपर ईषत्प्राग्भार नामकी वह शुभ पृथ्वी है, जो ऊपरकी ओर किये हुए धवलछत्रके आकार है, शुभरूप है, और जिसके ऊपर पुनर्भवसे रहित, महासुख सम्पन्न तथा स्वात्मशक्ति से युक्त सिद्धपरमेष्ठी विराजमान रहते हैं ।। १७३ - १७४।। २६१ तदनन्तर इसी बीच में रामने कहा कि हे भगवन् ! उन कर्मरहित जीवांके संसार भाव से रहित तथा दुःखसे दूर कैसा सुख होता है ? || १७५ || इसके उत्तर में केवली भगवान्ते कहा कि इस तीन लोकका जो सुख है वह आकुलतारूप, विनाशात्मक तथा दुरन्त होनेके कारण दुःखरूप ही माना गया है || १७६ ।। आठप्रकार के कर्म से परतन्त्र इस संसारी जीवको कभी रनमात्र भी सुख नहीं होता || १७७ ॥ जिस प्रकार लोहे से वेष्टित सुवर्णपिण्डकी अपनी निजकी कान्ति नष्ट हो जाती है उसी प्रकार कर्मसे वेष्टित जीवकी अपनी निजकी कान्ति बिलकुल ही नष्ट जाती है ॥ १७८ ॥ इस संसार के प्राणी निरन्तर जन्म-जरामरण तथा बीमारी आदिके हजारों एवं मानसिक महादुखोंसे पीडित रहते हैं अतः यहाँ क्या सुख है ? ॥ १७६ ॥ | विषय -जन्यसुख खड्गधारा १. दग्धचन्दन म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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