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________________ पद्मपुराणे औदारिकं शरीरं तु वैक्रियाऽऽहारके तथा । तैजसं कामणं चैव विद्धि सूचमं परं परम् ॥१५२।। असइख्येयं प्रदेशेन गुणतोऽनन्तके परे। आदिसम्बन्धमुक्ते च चतुर्णामेककालता ।।१५३।। जम्बूद्वीपमुखा द्वीपा लवणाद्याश्च सागराः । प्रकीर्तिताः शुभा नाम संख्यानपरिवर्जिताः ।।१५४।। पूर्वाद द्विगुणविष्कम्भाः पूर्वविक्षेपवर्तिनः । वलयाकृतयो मध्ये जम्बूद्वीपः प्रकीर्तितः ।।१५५।। मेरुनाभिरसौ वृत्तो लक्षयोजनमानभृत् । त्रिगुणं तत्परिक्षेपादधिकं परिकीर्तितम् ।।१५६।। पूर्वापरायतास्तत्र विज्ञेयाः कुलपर्वताः । हिमांश्च महाज्ञेयो निषधो नील एव च ।।१५७।। रुक्मी च शिखरी चेति समुद्रगजलसङ्गताः । वाम्यान्येभिर्विभक्तानि जम्बूद्वीपगतानि च ॥१५॥ भरताख्यमिदं क्षेत्रं ततो हैमवतं हरिः। विदेहो रम्यकाख्यं च हैरण्यवतमेव च ॥१५॥ ऐरावतं च विज्ञेयं गङ्गाद्याश्चापि निन्नगाः । प्रोक्तं द्विर्धातकीखण्डे पुष्कराद्धे च पूर्वकम् ।।१६०॥ आर्या म्लेच्छा मनुष्याश्व मानुषाचलतोऽपरे । विज्ञेयास्तत्प्रभेदाश्च संख्यानपरिवर्जिताः ।।१६।। विदेहे कर्मणो भूमिभरतैरावते तथा । देवोत्तरकुरुर्भोगक्षेत्रं शेषाश्च भूमयः ।।१६२॥ त्रिपल्यान्तमुहतं तु स्थिती नृणां परावरे । मनुष्याणामिव ज्ञेया तिर्यग्योनिमुपेयुषाम् ।।१६३।। अष्टभेदजुषो वेद्या व्यन्तराः किन्नरादयः । तेषां क्रीडनकावासा यथायोग्यमुदाहृताः ॥१६॥ तीन भेद हैं परन्तु तीव्र दुःखोंसे सहित योनियाँ अनेक प्रकारकी कही गई हैं ॥१५१॥ औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं। ये शरीर आगे-आगे सूक्ष्म-सूक्ष्म हैं ऐसा जानना चाहिए ॥१५२॥ औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ये तीन शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर असंख्यात गुणित है तथा तेजस और कामेण ये दो शरीर उत्तरोत्तर अनन्त गुणित हैं। तैजस और कार्मण ये दो शरीर आदि सम्बन्धसे युक्त हैं अर्थात् जीवके साथ अनादि कालसे लगे हुए हैं और उपर्युक्त पाँच शरीरोंमेंसे एक साथ चार शरीर तक हो सकते हैं ॥१५३॥ ___मध्यम लोकमें जम्बूद्वीपको आदि लेकर शुभ नामवाले असंख्यात द्वीप और लवण समुद्रको आदि लेकर असंख्यात समुद्र कहे गये हैं ॥१५४॥ ये द्वीप-समुद्र पूर्वके द्वीप-समुद्रसे दूने विस्तार वाले हैं, पूर्व-पूर्वको घेरे हुए हैं तथा वलयके आकार हैं। सबके बीचमें जम्बूद्वीप कहा गया है ॥१५५।। जम्बूद्वीप मेरु पर्वतरूपी नाभिसे सहित है, गोलाकार है तथा एक लाख योजन विस्तार वाला है, इसकी परिधि तिगुनीसे कुछ अधिक कही गई है ।।१५६॥ उस जम्बूद्वीपमें पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हिमवान् , महाहिमवान् , निषध, नील, रुक्मी और शिखरी ये छह कुलाचल हैं । ये सभी समुद्रके जलसे मिले हैं तथा इन्हींके द्वारा जम्बूद्वीप सम्बन्धी क्षेत्रोंका विभाग हुआ है ॥१५७-१५८।। यह भरत क्षेत्र है इसके आगे हैमवत, उसके आगे हरि, उसके आगे विदेह, उसके आगे रम्यक, उसके आगे हैरण्यवत और उसके आगे ऐरावत-ये सात क्षेत्र जम्बूद्वीपमें हैं । इसी जम्बूद्वीपमें गङ्गा, सिन्धु आदि चौदह नदियाँ हैं। धातकीखण्ड तथा पुष्करार्धमें जम्बूद्वीपसे दूनी-दूनी रचना है ।।१५६-१६०।। मनुष्य, मानुषोत्तर पर्वतके इसी ओर रहते हैं, इनके आर्य और म्लेच्छकी अपेक्षा मूलमें दो भेद हैं तथा इनके उत्तर भेद असंख्यात हैं ।।१६१॥ देवकुरु, उत्तरकुरु रहित विदेह क्षेत्र, तथा भरत और ऐरावत इन तीन क्षेत्रों में कर्मभूमि है और देवकुरु, उत्तर कुरु तथा अन्य क्षेत्र भोगभूमिके क्षेत्र हैं ॥१६२॥ मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्यकी और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्तकी है। तिर्यञ्चोंकी उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति मनुष्योंके समान तीन पल्य और अन्तर्मुहूर्तकी है ॥१६३॥ व्यन्तर देवोंके किन्नर आदि आठ भेद जानना चाहिए। इन सबके क्रीड़ाके स्थान यथा १. आदिसम्बन्धमुक्तश्च म०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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