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________________ पञ्चोत्तरशतं पर्व २८३ अहो चित्रमहो चित्रमही शीलं सुनिर्मलम् । एवं स्वनः समुत्तस्थौ रोदसी प्राप्य सर्वतः ॥५६॥ ततोऽकृत्रिमसावित्रीस्नेहसम्मग्नमानसौ । तीत्वा ससम्भ्रमौ प्राप्ती जानकी लवणाङ्कुशौ ॥५७॥ स्थितौ च पार्श्वयोः पद्मपुत्रग्रीतिप्रवृद्धया। समाश्वास्य समाघ्रातौ मस्तके प्रणताङ्गको ॥५८॥ जाम्बूनदमयीयष्टिमिव शुद्धां हुताशने । अत्युत्तमप्रभाचक्रपरिवारितविग्रहाम् ॥५६॥ मैथिली राघवो वीच्य कमलालयवासिनीम् । महानुरागरक्तात्मा तदन्तिकमुपागमत् ॥६०॥ जगौ च देवि कल्याणि प्रसीदोत्तमपूजिते । शरतसम्पूर्णचन्द्रास्ये महाद्भुतविचेष्टिते ॥६॥ कदाचिदपि नो भूयः करिष्याम्याग ईदृशम् । दुःखं वा ते ततोऽतीतं दोपं मे साध्वि मर्षय ॥६॥ योपिदष्टसहस्राणामपि त्वं परमेश्वरी । स्थिता मूनि ददस्स्वाज्ञां मय्यपि प्रभुतां कुरु ॥६३।। अज्ञानप्रवणीभूतचेतसा मयकेदृशम् । किंवदन्तीभयात्सृष्टं कष्टं प्राप्ताऽसि यत्सति ॥६४।। सकाननवनामेतां सखेचरजनां महीम् । समुद्रान्तां मया साकं यथेष्टं विचर प्रिये ॥६५॥ पूज्यमाना समस्तेन जगता परमादरम् । त्रिविष्टपसमान् भोगान् भावय स्वमहीतले ॥६६॥ उद्यद्भास्करसङ्काशं पुष्पकं कामगत्वरम् । आरूढा मेरुसानूनि पश्य देवि समं मया ॥६७॥ तेषु तेषु प्रदेशेषु भवतीचित्तहारिषु । क्रियतां रमणं कान्ते मया वचनकारिणा ।।६।। विद्याधरवरस्त्रीभिः सुरस्त्रीभिरिवावृता । मनस्विनि भजैश्वयं सद्यः सिद्धमनीषिता ।।६।। रालको व्याप्त कर उठ रही थी कि श्रीमान् राजा जनककी पुत्री और श्रीमान् बलभद्र श्रीरामकी परम अभ्युदयवती पत्नीकी जय हो ॥५५॥ अहो बड़ा आश्चर्य है, बड़ा आश्चर्य है इसका शील अत्यन्त निर्मल है ।।५५-५६॥ तदनन्तर माताके अकृत्रिम स्नेहमें जिनके हृदय डूब रहे थे ऐसे लबण और अंकुश शीघ्रतासे जलको तैर कर सीताके पास पहुँच गये ॥५७।। पुत्रोंकी प्रीतिसे बढ़ी हुई सीताने आश्वासन देकर जिनके मस्तक पर सूंघा था तथा जिनका शरीर विनयसे नम्रीभूत था ऐसे दोनों पुत्र उसके दोनों ओर खड़े हो गये ॥५८।। अग्निमें शुद्ध हुई स्वर्णमय यष्टिके समान जिसका शरीर अत्यधिक प्रभाके समूहसे व्याप्त था तथा जो कमल रूपी गृहमें निवास कर रही थी ऐसी सीताको देख बहुत भारी अनुरागसे अनुरक्त चित्त होते हुए राम उसके पास गये ।।५६-६०।। और बोले कि हे देवि ! प्रसन्न होओ, तुम कल्याणवती हो, उत्तम मनुष्योंके द्वारा पूजित हो, तुम्हारा मुख शरद् ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान है, तथा तुम अत्यन्त अद्भुत चेष्टाकी करनेवाली हो ॥६१।। अब ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूंगा अथवा अब तुम्हारा दुःख बीत चुका है । हे साध्वि ! मेरा दोष क्षमा करो ॥६२।। तुम आठ हजार स्त्रियोंकी परमेश्वरी हो। उनके मस्तक पर विद्यमान हो, आज्ञा देओ और मेरे ऊपर भी अपनी प्रभुता करो ॥६३।। हे सति ! जिसका चित्त अज्ञानके आधीन था ऐसे मेरे द्वारा लोकापवादके भयसे दिया दुःख तुमने प्राप्त किया है ।।६४॥ हे प्रिये ! अब बन-अटवी सहित तथा विद्याधरोंसे युक्त इस समुद्रान्त पृथिवीमें मेरे साथ इच्छानुसार विचरण करो ॥६५।। समस्त जगत्के द्वारा परम आदर पूर्वक पूजी गई तुम, अपने पृथिवी तल पर देवोंके समान भोगोंको भोगो ॥६६॥ हे देवि ! उदित होते हुए सूर्य के समान तथा इच्छानुसार गमन करनेवाले पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो तुम मेरे साथ सुमेरुके शिखरेको देखो अर्थात् मेरे साथ सर्वत्र भ्रमण करो ॥६७॥ हे काम्ते ! जो जो स्थान तुम्हारे चित्तको हरण करने वाले हैं उन उन स्थानाम मुझ आज्ञाकारी के साथ यथेच्छ क्रीड़ा की जाय ॥६८॥ हे मनस्विनि! देवाङ्गनाआके समान विद्याधरोंको उत्कृष्ट स्त्रियोंसे घिरी रह कर तुम शीघ्र ही ऐश्वर्यका उपभोग करो। तुम्हारे १. प्रबुद्धया म० । २. अपराधम् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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