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________________ पद्मपुराणे विरहोदन्वतः कूलं मे मनःपात्रमागतम् । नूनमेष्यति विध्वंसमिति चिन्ताकुलाऽभवत् ॥६॥ किर्तव्यविमूढा सा पादाङ्गुष्ठेन सङ्गता । विलिखन्ती शिति तस्थौ बलदेवसमीपगा ॥६॥ अग्रतोऽवस्थिता तस्य विरेजे जनकात्मजा । पुरन्दरपुरे' जाता लचमोरिव शरीरिणी ॥२॥ ततोऽभ्यधायि रामेण सीते तिष्ठसि किं पुरः । अपसर्प न शक्तोऽस्मि भवतीमभिवीक्षितुम् ॥६३॥ मध्याह्ने दीधितिं सौरीमाशीविषमणेः शिखाम् । वरमुत्सहते चक्षुरीक्षितुं भवतीं तु नो ॥६॥ दशास्यभवने मासान् बहूनन्तः पुरावृता । स्थिता यदाहृता भूयः समस्तं किं ममोचितम् ॥६५॥ ततो जगाद वैदेही निष्ठुरो नास्ति त्वत्समः । तिरस्करोषि मां येन सुविधा प्राकृतो यथा ॥६६॥ दोहलच्छमना नीत्वा वनं कुटिलमानसः । गर्भाधानसमेतां मे त्यक्तु किं सदृशं तव ॥६७॥ असमाधिमृति प्राप्ता तत्र स्यामहकं यदि । ततः किं ते भवेत् सिद्धं मम दुर्गतिदायिनः ॥६८।। अतिस्वल्पोऽपि सद्भावो मय्यस्ति यदि वा कृपा । शान्त्यार्याणां ततः किन नीत्वा वसतिमुज्झिता ॥६६॥ भनाथानामबन्धूनां दरिद्राणां सुदुःखिनाम् । जिनशासनमेतद्धि शरणं परमं मतम् ॥७॥ एवं गतेऽपि पद्माभ प्रसीद किमिहोरुणा । कथितेन प्रयच्छाऽऽज्ञामित्युक्त्वा दुःखिताऽरुदत् ॥७॥ रामो जगाद जानामि देवि शीलं तवानघम् । मदनुवततां चोच्चैर्भावस्य च विशुद्धताम् ॥७२॥ परिवादमिमं किन्तु प्राप्ताऽसि प्रकटं परम् । स्वभावकुटिलस्वान्तामेतां प्रत्यायय प्रजाम् ॥७३॥ लगी कि मैंने विरह रूपी सागर अभी पार नहीं कर पाया है ॥५६॥ विरह रूपी सागरके तटको प्राप्त हुआ मेरा मनरूपी जहाज निश्चित ही विध्वंसको प्राप्त हो जायगा-नष्ट हो जायगा ऐसी चिन्तासे वह व्याकुल हो उठी ॥६०॥ 'क्या करना चाहिए' इस विषयका विचार करनेमें मूढ़ सीता, पैरके अंगूठेसे भूमिको कुरेदती हुई रामके समीप खड़ी थी ॥६॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि उस समय रामके आगे खड़ी सीता ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो शरीरधारिणी स्वर्गकी लक्ष्मी ही हो अथवा इन्द्र के आगे मूर्तिमती लक्ष्मी ही खड़ी हो ।।६।। तदनन्तर रामने कहा कि सीते ! सामने क्यों खड़ी है ? दूर हट, मैं,तुम्हें देखनेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥६३|| मेरे नेत्र मध्याह्नके समय सूर्यको किरणको अथवा आशीविष-सर्पके मणिकी शिखाको देखनेके लिए अच्छी तरह उत्साहित हैं परन्तु तुझे देखनेके लिए नहीं ॥६४।। तू रावणके भवनमें कई मास तक उसके अन्तःपुरसे आवृत्त होकर रही फिर भी मैं तुम्हें ले आया सो यह सब क्या मेरे लिए उचित था ? ॥३॥ तदनन्तर सीताने कहा कि तुम्हारे समान निष्ठुर कोई दूसरा नहीं है। जिस प्रकार एक साधारण मनुष्य उत्तम विद्याका तिरस्कार करता है उसी प्रकार तुम मेरा तिरस्कार कर रहे हो ॥६६।। हे वक्रहृदय ! दोहलाके बहाने वनमें ले जाकर मुझ गर्भिणीको छोड़ना क्या तुम्हें उचित था ? ॥६७॥ यदि मैं वहाँ कुमरणको प्राप्त होती तो इससे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होता ? केवल मेरी ही दुर्गति होती ॥६८॥ यदि मेरे ऊपर आपका थोड़ा भी सद्भाव होता अथवा थोड़ी भी कृपा होती तो मुझे शान्तिपूर्वक आर्यिकाओंकी वसतिके पास ले जाकर क्यों नहीं छोड़ा ॥६६।। यथार्थमें अनाथ, अबन्धु, दरिद्र तथा अत्यन्त दुःखी मनुष्योंका यह जिनशासन ही परम शरण है ।।७०॥ हे राम! यहाँ अधिक कहनेसे क्या ? इस दशामें भी आप प्रसन्न हों और मुझे आ ज्ञा द । इस प्रकार कह कर वह अत्यन्त दुःखी हो रोने लगी ।।७१।।। तदनन्तर रामने कहा कि हे देवि ! मैं तुम्हारे निर्दोष शील, पातिव्रत्यधर्म एवं अभिप्रायकी उत्कृष्ट विशुद्धताको जानता हूँ किन्तु यतश्च तुम लोगोंके द्वारा इस प्रकट भारी अपवादको प्राप्त हुई हो अतः स्वभावसे ही कुटिलचित्तको धारण करनेवाली इस प्रजाको विश्वास दिलाओ। इसकी १. पुरो -म० । २. ते समः ब० । ३. साधारणो जनः । ४. कुटिलमानसः म०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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