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________________ चतुरुतरशतं पर्व अहोरूपमहो धैर्यमहो सचमहो द्युतिः । अहो महानुभावत्वमहो गाम्भीर्यमुत्तमम् ॥४५॥ अहोsस्या वीतपङ्कत्वं समागमनसूचितम् । श्रीमजनकराजस्य सुतायाः सितकर्मणः ॥ ४६ ॥ एवमुष्टषिताङ्गानां नराणां सहयोषिताम् । वदनेभ्यो विनिश्चेरुवचो व्याप्तदिगन्तराः ॥४७॥ गगने खेचरो लोको धरण्यां धरणीचरः । उदात्तकौतुकस्तस्थौ निमेषरहितेक्षणः ॥ ४८ ॥ प्रजातसम्मदाः केचित्पुरुषाः प्रमदास्तथा । अभीक्षाञ्चक्रिरे रामं सङ्क्रन्दनमिवामराः ॥ ४६ ॥ पार्श्वस्थ व रामस्य केचिच्च लवणांकुशौ । जगदुः सदृशावस्य सुकुमाराविमाविति ॥ ५० ॥ लक्ष्मणं केचिदैचन्त प्रतिपक्षक्षयतमम् । शत्रुघ्नसुन्दरं केचिदेके जनकनन्दनम् ॥ ५१ ॥ ख्यातं केचिद्धनूमन्तं त्रिकूटाधिपतिं परे । अन्ये विराधितं केचित्किष्किधन गरेश्वरम् ॥५२॥ केचिज्जनकराजस्य सुतां विस्मितचेतसः । वसतिः सा हि नेत्राणां क्षणमात्रान्यचारिणाम् ॥ ५३ ॥ उपसृत्य ततो रामं दृष्ट्वा व्याकुलमानसा । वियोगसागरस्यान्तं प्राप्तं जानत्र्यमन्यत ॥ ५४ ॥ प्राप्तायाः पद्मभार्यांया लक्ष्मणोऽर्घ ददौ ततः । प्रणामं चक्रिरे भूपाः सम्भ्रान्ता रामपार्श्वगाः ॥ ५५॥ ततोऽभिमुखमायन्तीं वीक्ष्य तां रभसान्विताम् । राघवोऽक्षोभ्यसवोऽपि सकम्पहृदयोऽभवत् ॥ ५६ ॥ अचिन्तयच्च मुक्ताऽपि वने व्यालसमाकुले । मम लोचनचौरीयं कथं भूयः समागता ॥ ५१ ॥ अहो विगतलजेयं महासत्वसमन्विता । यैवं निर्वास्यमानापि विरागं न प्रपद्यते ॥ ५८ ॥ ततस्तदिङ्गितं ज्ञात्वा वितानीभूतमानसा । विरहो न मयोतीर्ण इति साऽभद्विषादिनी ॥ ५६ ॥ हर्ष और क्षोभसे सहित मनुष्योंका अपार सागर बार-बार यह शब्द कह रहा था कि वृद्धिको प्राप्त होओ, जयवन्त होओ और समृद्धिसे सम्पन्न होओ ||४४ ॥ अहो ! उज्ज्वल कार्य करनेवाली श्रीमान् राजा जनककी पुत्री सीताका रूप धन्य है ? धैर्य धन्य है, पराक्रम धन्य है, उसकी कान्ति धन्य है, महानुभावता धन्य है, और समागमसे सूचित होनेवाली इसकी निष्कलंकता धन्य है ॥४५-४६ ॥ इस प्रकार उल्लसित शरीरोंको धारण करनेवाले मनुष्यों और स्त्रियों के मुखों से दिदिगन्तको व्याप्त करनेवाले शब्द निकल रहे थे ||४७ || आकाशमें विद्याधर और पृथिवी में भूमिगोचरी मनुष्य, अत्यधिक कौतुक और टिमकार रहित नेत्रोंसे युक्त थे ||४८ || अत्यधिक हर्षसे सम्पन्न कितनी ही स्त्रियाँ तथा कितने ही मनुष्य रामको टकटकी लगाये हुए उस प्रकार देख रहे थे जिस प्रकार कि देव इन्द्रको देखते हैं ||४६ || कितने ही लोग रामके समीपमें स्थित लवण और अंकुशको देखकर यह कह रहे थे कि अहो ! ये दोनों सुकुमार कुमार इनके ही सदृश हैं ||३०|| कितने ही लोग शत्रुका क्षय करने में समर्थ लक्ष्मणको, कितने ही शत्रुघ्नको, कितने ही भामण्डलको, कितने ही हनुमान्को, कितने ही विभीषणको, कितने ही विराधितको और कितने ही सुग्रीवको देख रहे थे ॥५१-५२॥ कितने ही आश्चर्य से चकित होते हुए जनकसुता को देख रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि वह क्षण मात्र में अन्यत्र विचरण करनेवाले नेत्रोंकी मानो वसति ही थी ॥५३॥ तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त आकुल हो रहा था ऐसी सीताके पास जाकर तथा रामको देख कर माना था कि अब वियोगरूपी सागरका अन्त आ गया है ||१४|| आई हुई सीता के लिए लक्ष्मणने अर्घ दिया तथा रामके समीप बैठे हुए राजाओंने हड़बड़ा कर उसे प्रणाम किया ||२५|| तदनन्तर वेग से सामने आती हुई सीताको देख कर यद्यपि राम अक्षोभ्य पराक्रमके धारक थे तथापि उनका हृदय कांपने लगा || ५६ || वे विचार करने लगे कि मैंने तो इसे हिंसक जन्तुओं से भरे वनमें छोड़ दिया था फिर मेरे नेत्रोंको चुरानेवाली यह यहाँ कैसे आ गई ? || ५७|| अहो ! यह बड़ो निर्लज्ज है तथा महाशक्तिसे सम्पन्न है जो इस तरह निकाली जाने पर भी विरागको प्राप्त नहीं होती ॥ ५८ ॥ तदनन्तर रामकी चेष्टा देख, शून्यहृदया सीता यह सोचकर विषाद करने १. वन्द्यमानेष्वमाना च म० । २७३ Jain Education Internatio३५-३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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