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________________ ज्युत्तरशतं पर्व अहो पुण्यवती सीता यस्याः सुतनयाविमौ । अहो धन्यतमा सा स्त्री यानयो रमणी भवेत् ॥८७॥ एवमाद्याः कथास्तत्र मनःश्रोत्रमलिम्लुचाः । प्रवृत्ताः परमस्त्रीणां तदेकगतचक्षुषाम् ॥८८॥ कपोलमतिसङ्घद्दारकुण्डलोरगदंष्ट्रया । न विवेद तदा काचिद् विक्षतं तद्वात्मिका ॥८॥ अन्यनाभुजोत्पीडात्कस्याश्चित्सकचाटके । कञ्चकेऽभ्युनतो रेजे स्तनांशः सघनेन्दुवत् ॥ ६०॥ न विवेद च्युता का काचिन्निक्कणिनीमपि । प्रत्यागमनकाले तु सन्दिता स्खलिताऽभवत् ॥ ६१ ॥ धम्मिल्लमकरीदंष्ट्राकोटिस्फाटितमंशुकम् । महत्तरिकया काचिदृष्टुपत्परिभाषिता ॥६२॥ विभ्रंशिमनसोऽन्यस्य वपुषि ऋथतां गते । वित्रस्तबाहुलतिकावदनात्कटकोऽपतत् ॥ ६३॥ कस्याश्चिदन्यवनिताकर्णाभरणसङ्गतः । विच्छिन्नपतितो हारः कुसुमाञ्जलितां गतः ॥६४॥ बभूवुष्टयस्तासां निमेषपरिवर्जिताः । गतयोरपि कासाञ्चित्तयोर्दूरं तथा स्थिताः ॥ ६५ ॥ मालिनीवृत्तम् इति वरभवनाद्विस्त्रीलतामुक्त पुष्पप्रकरगलित धूली धुसराकाशदेशाः । परमविभवभाजो भूभुजो राघवाद्याः प्रविविशुरतिरम्याः 'मन्दिरं मङ्गलाख्यम् ॥६६॥ द्रुतविलम्बितवृत्तम् अनभिसंहितमीदृशमुत्तमं दयितजंतुसमागमनोत्सवम् । भजति पुण्यरविप्रतिबोधितप्रवरमानसवारिरुहो जनः ॥६७॥ इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामलवणांकुशसमागमाभिधानं नाम त्र्युत्तरशतं पर्व ॥१०३॥ धारण करता है वह लवण है और जो तोताके पङ्खके समान हरे रंग के वस्त्र पहने है वह अंकुश है || ६ || अहो ! सीता बड़ी पुण्यवती है जिसके कि ये दोनों उत्तम पुत्र हैं । अहो ! वह स्त्री अत्यन्त धन्य है जो कि इनकी स्त्री होगी ||७|| इस प्रकार उन्हीं एकमें जिनके नेत्र लग रहे थे ऐसी उत्तमोत्तम स्त्रियों के बीच मन और कानोंको हरण करनेवाली अनेक कथाएँ चल रही थीं || || उनमें जिसका चित्त लग रहा था ऐसी किसी स्त्रीने उस समय अत्यधिक धक्काधूमीके कारण कुण्डल रूपी साँपको दाँढ़से विमान घायल हुए अपने कपोलको नहीं जानती थी ॥८॥ अन्य स्त्रीकी भुजाके उत्पीड़नसे वन्द चोली के भीतर उठा हुआ किसीका स्तन मेघ सहित चन्द्रमाके सुशोभित हो रहा था ॥ ६०॥ किसी एक स्त्रीकी मेखना शब्द करती हुई नीचे गिर गई फिर भी उसे पता नहीं चला किन्तु लौटते समय उसी करधनीसे पैर फँस जानेके कारण वह गिर पड़ी ||११|| किसी खोकी चोटीमें लगी मकरीकी डॉढ़ से फटे हुए वस्त्रको देखकर कोई बड़ी बूढ़ी स्त्री किसीसे कुछ कर रही थी ||१२|| जिसका मन ढीला हो रहा था ऐसे किसी दूसरे मनुष्य के शरीर के शिथिलताको प्राप्त करने पर उसकी नीचेको ओर लटकती हुई बाहुरूपी लता के अग्रभागसे कड़ा नीचे गिर गया || १३|| किसी एक स्त्रीके कर्णाभरणमें उलझा हुआ हार टूटकर गिर गया और ऐसा जान पड़ने लगा मानो फूलोंकी अञ्जलि ही बिखेर दी गई हो || ६४ ॥ उन दोनों कुमारों को देखकर किन्हीं स्त्रियोंके नेत्र निर्निमेष हो गये और उनके दूर चले जाने पर भी वैसे ही निर्निमेष रहे आये ॥६५॥ इस प्रकार उत्तमोत्तम भवनरूपी पर्वतों पर विद्यमान स्त्री रूपी लताओंके द्वारा छोड़े हुए फूलों के समूहसे निकली धूलीसे जिन्होंने आकाश के प्रदेशों को धूसरवर्ण कर दिया था तथा जो परम वैभवको प्राप्त थे ऐसे श्रीराम आदि अत्यन्त सुन्दर राजाओंने मङ्गल से परिपूर्ण महल में प्रवेश किया ||६६|| गौतमस्वामी कहते हैं कि पुण्यरूपी सूर्यके द्वारा जिसका उत्तम मनरूपी कमल विकसित हुआ है ऐसा मनुष्य इस प्रकार के अचिन्तित तथा उत्तम प्रियजनोंके समागमसे उत्पन्न आनन्दको प्रा होता है ॥६७ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राम तथा लवणांकुशके समागमका वर्णन करने वाला एक सौ तीसरा पर्व समाप्त हुआ || १०३ ॥ २६६ १. सङ्घट्टा म० । २. तद्गतात्मिकाः म० । ३. गता क० । ४. मङ्गलं म० । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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