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________________ नवनवतितमं पर्व २२७ समन्तान्नृपलोकेन पूर्यमाणस्त्वरावता । जगाम रामदेवस्य समीपं विनताननः ॥२८॥ अबीच प्रभो! सीता गर्भमात्रसहागिका । मया त्वद्वचनादीमे कान्तारे स्थापिता नृप ॥२६॥ नानातिघोरनिःस्वानश्वापदौघनिषेविते । वेताला जालान्धकारिते ॥३०॥ निसर्गद्वेषसंसक्तयुद्वयाघ्रमहिषाधिके । निबद्धदुन्दुभिध्वाने मरुता कोटरश्रिता ॥३१॥ कन्दरोदरसम्मूर्छासिंहनादप्रतिध्वनौ । दारुक्रकचजस्वानभीमसुप्तशयुस्वने ॥३२॥ तृष्यत्तरिक्षुविध्वस्तसारङ्गात्रस्तपुस्तिके । धातकीस्तवकालेहिशोणिताशङ्किसिंहके ॥३३॥ कृतान्तस्यापि भीभारसमुद्भवनपण्डिते । अरण्ये देव त्वद्वाक्या द्वैदेही रहिता मया ॥३४॥ अश्रुदुर्दिनवक्त्राया दीपिताया महाशुचा । सन्देशं देव सीताया निबोध कथयाम्यहम् ॥३५॥ स्वामाह मैथिली देवी यदीच्छस्यात्मने हितम् । जिनेन्द्र मा मुचो भक्तिं यथा त्यक्ताऽहमीदृशी ॥३६।। स्नेहानुरागसंसक्तो मानी यो मां विमुञ्चति । नूनं जिनेऽप्यसौ भक्ति परित्यजति पार्थिवः ॥३७॥ वाग्बली यस्य यत् किञ्चित् परिवादं जनः खलः । अविचार्य वदत्येव तद्विचार्य मनीषिणा ॥३८॥ निर्दोपाया जनो दोषं न तथा मम भाषते । यथा सद्धर्मरत्नस्य सम्यग्बोधबहिःकृतः ॥३४॥ को दोषो यदहं त्यक्ता भीषणे विजने वने। सम्यग्दर्शनसंशुद्धिं राम न त्यक्तुमर्हसि ॥४०॥ . .. निरन्तर युथ थके हुए घोड़ोंको विश्राम देनेवाला था और जिसे शीघ्रता करनेवाले राजाओंने सब ओरसे घेर लिया था ऐसा कृतान्तवक्त्र सेनापति, मुखको नीचा किये हुए श्रीरामदेवके समीप गया॥२७-२८।। और बोला कि हे प्रभो ! हे राजन् ! आपके कहनेसे मैं एक गर्भ ही जिसका सहायक था ऐसी सीताको भयंकर वनमें ठहरा आया हूँ ॥२६॥ हे देव ! आपके कहनेसे मैं सीताको उस वनमें छोड़ आया हूँ जो नाना प्रकारके अत्यन्त भयंकर शब्द करनेवाले वन्य पशुओंके समूहसे सेवित है, वेतालोंका आकार धारण करनेवाले दुर्दश्य वृक्षोंके समूहसे जहाँ घोर अन्धकार व्याप्त है, जहाँ स्वाभाविक द्वेषसे निरन्तर युद्ध करनेवाले व्याघ्र और जंगली भैंसा अधिक हैं, जहाँ कोटरमें टकरानेवाली वायुसे निरन्तर दुन्दुभिका शब्द होता रहता है, जहाँ गुफाओंके भीतर सिंहोंके शब्दको प्रतिध्वनि बढ़ती रहती है, जहाँ सोये हुए अजगरोंका शब्द लकड़ीपर चलनेवाली करोंतसे उत्पन्न शब्दके समान भयंकर है, जहाँ प्यासे भेड़ियोंके द्वारा हरिणों के लटकते हुए पोते नष्ट कर डाले गये हैं । जहाँ रुधिरको आशंका करनेवाले सिंह धातकी वृक्षके गुच्छोंको चाटते रहते हैं और जो यमराजके लिए भी भयका समूह उत्पन्न करने में निपुण है ॥३०-३४॥ हे देव ! जिसका मुख अश्रुओंकी वर्षासे दुर्दिनके समान हो रहा था तथा जो महाशोकसे अत्यन्त प्रज्वलित थी ऐसा सीताका संदेश मैं कहता हूँ सो सुनो ॥३५॥ सीता देवीने आपसे कहा है कि यदि अपना हित चाहते हों तो जिस प्रकार मुझे छोड़ दिया है उस प्रकार जिनेन्द्रदेवमें भक्तिको नहीं छोड़ना ।।३६।। स्नेह तथा अनुरागसे युक्त जो मानी राजा मुझे छोड़ सकता है निश्चय ही वह जिनेन्द्रदेवमें भक्ति भी छोड़ सकता है ॥३७॥ वचन बलको धारण करनेवाला दुष्ट मनुष्य विना विचारे चाहे जिसके विषयमें चाहे जो निन्दाकी बात कह देता है परन्तु बुद्धिमान मनुष्यको उसका विचार करना चाहिए ॥३८॥ साधारण मनुष्य मुझ निर्दोषके दोष उस प्रकार नहीं कहते जिस प्रकार कि सम्यग्ज्ञानसे रहित मनुष्य सद्धर्म रूपी रत्नके दोष कहते फिरते हैं। भावार्थ--दूसरेके कहनेसे जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है उस प्रकार सद्धर्म रूपी रत्नको नहीं छोड़ देना क्योंकि मेरी अपेक्षा सद्धर्म रूपी रत्नकी निन्दा करनेवाले अधिक हैं ॥३॥ हे राम! आपने मुझे भयंकर निर्जन वनमें छोड़ दिया है सो इसमें क्या दोष है ? परन्तु इस तरह १. गर्भमात्रं सहायो यस्या सा । २. दारुकीचकनिःस्वान ब०। ३. शयुरजगरः। ४. नृत्यतरिक्ष म०। ५. पुत्रिके म०, ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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