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________________ २२६ पद्मपुराणे विलसद्ध्वजमालाव्यं समुद्तशुभस्वरम् । कर्त्त नृत्तमिवाऽऽसक्तं नगरं तत्प्रमोदवत् ॥१५॥ गोपुरेण समं शाला समारूढमहाजनः । हर्षादिव परां वृद्धि प्राप कोलाहलान्वितः ॥१६॥ अन्तर्बहिश्च तत्स्थानं सीतादर्शनकातिभिः । जङ्गमत्वमिव प्राप्त जनौधः प्रचलात्मकैः ॥१७॥ ततो विविधवादित्रनादेनाऽऽशाभिपूरिणा । शङ्खस्वनविमिश्रेण बन्दिनिःस्वानयोगिना ॥१८॥ विस्मयव्याप्तचित्तेन पौरेण कृतवीक्षणा । विवेश नगरं सीता लचमीरिव सुरालयम् ॥१६॥ उद्यानेन परितिप्तं दीर्घिकाकृतमण्डनम् । मेरुकूटसमाकारं बलदेवसमच्छविम् ॥२०॥ वज्रजङ्घगृहान्तस्थं प्रासादमतिसुन्दरम् । पूज्यमाना नृपस्त्रीभिः प्रविष्टा जनकात्मजा ॥२१॥ बिभ्रता परमं तोषं वज्र जङ्ग्रेन सूरिणा । भ्रात्रा भामण्डलेनेव पूज्यमाना सुचेतसा ॥२२॥ जय जीवाभिनन्देति वर्द्धस्वाऽऽज्ञापयेति च । ईशाने देवते पूज्य स्वामिनीति च शब्दिता ॥२३॥ आज्ञा प्रतीच्छता मूर्ना सम्भ्रमं दधता परम् । प्रबद्धाञ्जलिना सार्दू परिवर्गेण चारुणा ॥२४॥ अवसत्तत्र वैदेही समुद्भूतमनीषिता । कथाभिधर्मसक्ताभिः पद्मभूमिश्च सन्ततम् ॥२५॥ प्राभृतं यावदायाति सामन्तेभ्यो महीपतेः। दत्तेन तेन वैदेही धर्मकार्यमसेवत ॥२६॥ असावपि कृतान्तास्यस्तप्यमानमना भृशम् । स्थूरीपृष्ठान् परिश्रान्तान् खेदवाननुपालयन् ॥२७॥ तोरण खड़े किये गये, द्वारों पर जलसे भरे तथा मुखों पर पल्लवोंसे सुशोभित कलश रखे गये ॥१४॥ जो फहराती हुई ध्वजाओं और मालाओंसे सहित था, तथा जहाँ शुभ शब्द हो रहा ५५ ऐसा वह नगर आनन्द-विभोर हो मानो नृत्य करनेके लिए ही तत्पर था ॥१२॥ गोपुरके साथ साथ जिसपर बहत भारी लोग चढ़कर बैठे हुए थे ऐसा नगरका कोट इस प्रकार जान पड़त था मानो हर्षके कारण कोलाहल करता हुआ परम वृद्धिको ही प्राप्त हो गया हो ॥१६॥ भीतर बाहर सब जगह सीताके दर्शनकी इच्छा करनेवाले चलते-फिरते जन-समूहसे उस नगरका प्रत्येक स्थान ऐसा जान पड़ता था मानो जंगमपनाको हो प्राप्त हो गया हो अर्थात् चलने-फिरने लगा हो ॥१७॥ तदनन्तर शङ्खोंके शब्दसे मिश्रित, एवं वन्दीजनोंके विरद गानसेल नाना प्रकारके वादित्रों का शब्द जब दिगदिगन्तको व्याप्त कर रहा था तब सीताने नगरमें तरह प्रवेश किया जिस तरह कि लक्ष्मी स्वर्ग में प्रवेश करती है। उस समय आश्चर्यसे जिनका चित्त व्याप्त हो रहा था ऐसे नगरवासी लोग सीताका बार-बार दर्शन कर रहे थे ॥१८-१६।। तत्पश्चात् जो उद्यानसे घिरा हुआ था, वापिकाओंसे अलंकृत था, मेरुके शिखरके समान ऊँचा था और बलदेवकी कान्तिके समान सफेद था ऐसे वनजङ्घके घरके समीप स्थित अत्यन्त सुन्दर मलमें राजाकी स्त्रियोंसे पूजित होती हुई सीताने प्रवेश किया ।।२०-२१॥ वहाँ परम सन्तोषको धारण करनेवाला, बुद्धिमान एवं उत्तम हृदयका धारक राजा वनजङ्घ, भाई भामण्डलके समान जिसकी पूजा करता था ॥२२॥ 'हे ईशाने ! हे देवते ! हे पूज्ये ! हे स्वामिनि ! तुम्हारी जय हो, जीवित रहो, आनन्दित होओ, बढ़ती रहो और आज्ञा देओ, इस प्रकार जिसका निरन्तर विरदगान होता रहता था॥२३॥परम संभ्रमके धारक, हाथ जोड़, मस्तक झुका आज्ञा प्राप्त करनेके इच्छुक सुन्दर परिजन सदा जिसके साथ रहते थे, तथा इच्छा करते ही जिसके मनोरथ पूर्ण होते थे ऐसी सीता वहाँ निरन्तर धर्म सम्बन्धी तथा राम सम्बन्धी कथाएँ करती हुई निवास करती थी ।।२४-२५।। राजा वनजनके पास सामन्तों की ओरसे जितनी भेट आती थी। भोरसे जितनी भेट आती थी वह सब सीताके लिए दे देता था और उसीसे वह धर्मकार्यका सेवन करती थी ॥२६।। __ अथानन्तर जिसका मन अत्यन्त सन्तप्त हो रहा था, जो अत्यधिक खेदसे युक्त था, जो १. कृतान्तवक्त्र सेनापतिः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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