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________________ सप्तनवतितमं पर्व २१३ रुदत्याः करुणं तस्याः पुष्पमोक्षापदेशतः । वनस्पतिसमूहेन नूनं रुदितमेव तत् ॥१५२॥ निसर्गरमगीयेन स्वरेण परिदेवनम् । ततोऽसौ कर्त्त मारब्धा महाशोकवशीकृता ॥१५३॥ हा पभेक्षण हा पद्म हा नरोत्तम हा प्रभो । यच्छ प्रतिवचो देव कुरु साधारणं मम ॥१५॥ सततं साधुचेष्टस्य सद्गुणस्य सचेतसः । न तेऽस्ति दोषगन्धोऽपि महापुरुषतायुजः ॥१५५॥ पुरा स्वयंकृतस्येदं प्राप्तं मे कर्मणः फलम् । अवश्यं परिभोक्तव्यं व्यसनं परमोत्कटम् ॥१५६॥ किं करोतु प्रियोऽपत्यो जनकः पुरुषोत्तमः । किं वा बान्धवलोको मे स्वकर्मण्युदयस्थिते ॥१५७॥ नूनं जन्मनि पूर्वस्मिनसत्पुण्यमुपार्जितम् । मन्दभाग्याजनेऽरण्ये दुखं प्राप्ताऽस्मि यस्परम् ॥१५॥ अवर्णवचनं नूनं मया गोष्ठीप्वनुष्टितम् । यस्योदयेन सम्प्राप्तमिदं व्यसनमीदृशम् ॥१५॥ गुरोः समक्षमादाय नूनमन्यत्र जन्मनि । व्रतं मया पुनर्भग्नं यस्येदं फलमीदृशम् ॥१६॥ अथवा परुपैर्वाक्यः कश्चित् विषफलोपमैः । निर्भसितो भवेऽन्यस्मिन् जातं यदुःखमीदृशम् ॥१६१॥ अन्यत्र जनने मन्ये पद्मखण्डस्थितं मया । चक्रायुगलं भिन्नं स्वामिना रहितास्मि यत् ॥१६२॥ किं वा सरसि पद्मादिभूपिते रचितालयम् । पुरुषाणामुदाराणां गतिलीलाविलम्बकम् ॥१६३॥ जल्पितेन परस्त्रीणां सौन्दर्येण कृतोपमम् । सौमित्रिसौधसच्छायं पनारुणमुखक्रमम् ॥१६॥ वियोजितं भवेऽन्यस्मिन्हंसयुग्मं कुचेष्टया । प्राप्ताऽस्मि वासनं घोरं येनेदृक्षं हताशिका ॥१६५॥ गुलाफलाद्धवर्णाक्षमन्योन्यापितमानसम् । कृष्णागुरुभवात्यन्तधनोद्यद्धृमधूसरम् ॥१६६॥ बिछुड़ी हरिणीके समान रोदन करने लगी ॥१५१॥ करुण रोदन करनेवाली सीताके दुःखसे दुःखी होकर वृक्षोंके समूहने भी मानो पुष्प छोड़नेके बहाने हीरोदन किया था ।।१५२॥ तदनन्तर महा महा शोकसे वशीभूत सीता स्वभाव सुन्दर स्वरसे विलाप करने लगी ॥१५३।। वह कहने लगी कि हे कमललोचन ! हा पद्म ! हा नरोत्तम ! हा प्रभो ! हा देव ! उत्तर देओ मुझे सान्त्वना करो ॥१५४॥ आप निरन्तर उत्तम चेष्टाके धारक हैं, सद्गुणोंसे सहित हैं, सहृदय हैं और महापुरुषतासे युक्त हैं। मेरे त्यागमें आपका लेश मात्र भी दोष नहीं है ॥१५॥ मैंने पूर्व भवमें जो स्वयं कर्म किया था उसीका यह फल प्राप्त हुआ है अतः यह बहुत भारी दुःख मुझे अवश्य भोगना चाहिए ।।१५६।। जब मेरा अपना किया कर्म उदयमें आ रहा है तब पति, पुत्र, पिता, नारायण अथवा अन्य परिवार के लोग क्या कर सकते हैं ॥१५७॥ निश्चित ही मैंने पूर्व भवमें पापका उपार्जन किया होगा इसीलिए तो मैं अभागिनी निर्जन वनमें परम दुःखको प्राप्त हुई हूँ ॥१५८॥ निश्चित ही मैंने गोष्ठियों में किसीका मिथ्या दोष कहा होगा जिसके उदयसे मुझे यह ऐसा संकट प्राप्त हुआ है ॥१५६।। निश्चित ही मैंने अन्य जन्ममें गुरुके समक्ष व्रत लेकर भग्न किया होगा जिसका यह ऐसा फल प्राप्त हुआ है ॥१६०॥ अथवा अन्य भवमें मैंने विष फलके समान कठोर वचनासे किसीका तिरस्कार किया होगा इसीलिए नुझे ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है ॥१६१॥ जान पड़ता है कि मैंने अन्य जन्ममें कमलवनमें स्थित चकवा चकवीके युगलको अलग किया होगा इसीलिए तो मैं भर्तासे रहित हुई हूँ।।१६२॥ अथवा जो कमल आदिसे विभूषित सरोवरमें निवास करता था, जो उत्तम पुरुषोंकी गमन सम्बन्धी लीलामें विलम्ब उत्पन्न करनेवाला था, जो अपने कल-कूजन और सौन्दर्यमें स्त्रियोंकी उपमा प्राप्त करता था, जो लक्ष्मणके महलके समान उत्तम कांतिसे युक्त था, और जिसके मुख तथा चरण कमलके समान लाल थे ऐसे हंस-हंसियोंके युगलको मैंने पूर्वभवमें अपनी कुचेष्टासे जुदा-जुदा किया होगा इसीलिए तो मैं अभागिनी इस घोर निष्कासनको प्राप्त हुई हूँ-घरसे अलग की गई हूँ ॥१६३-१६५॥ अथवा गुंजाफलके अर्ध भाग के समान जिसके नेत्र थे, परस्पर एक दूसरेके लिए जिसने अपना हृदय सौंप रक्खा था,जो काला १. फलविषोपमैः म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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