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________________ २१२ पद्मपुराणे धिग भृत्यता.जगन्निन्द्यां यत् किञ्चन विधायिनीम् । परायत्तीकृतात्मानं क्षुद्रमानवसेविताम् ॥१४०॥ यन्त्रचेष्टिततुल्यस्य दुःखेकनिहितात्मनः । भृत्यस्य जीवितारं वरं कुक्कुरजीवितम् ॥१४॥ 'नरेन्द्रशक्तिवश्यः स निन्द्यनामा पिशाचवत् । विदधाति न किं भृत्यः किं वा न परिभाषते ॥१४२॥ चित्रचापसमानस्य निःकृत्यगुणधारिणः। नित्यनम्रशरीरस्य निन्द्यं भृत्यस्य जीवितम् ॥१४३॥ सङ्कारकूटकस्येव पश्चानिवृत्तचेतसः । निर्माल्यवाहिनो धिग्धिग्भृत्यनाम्नोऽसुधारणम् ॥१४४॥ पश्चात् कृतगुरुत्वस्य तोयार्थमपि नामिनः । तुलायन्त्रसमानस्य धिग्भृत्यस्याऽसुधारणम् ॥१४५॥ उन्नत्या त्रपया दीप्तया वर्जितस्य निजेच्छया । मा स्म भूजन्म भृत्यस्य पुस्तकर्मसमात्मनः॥१४६॥ विमानस्यापि मुक्तस्य गत्या गुरुतया समम् । अधस्ताद्गच्छतो नित्यं धिग्भृत्यस्यासुधारणम् ॥१७॥ निःसत्त्वस्य महामांसविक्रयं कुर्वतः सदा। निर्मदस्यास्वतन्त्रस्य धिग्भृत्यस्यासुधारणम् ॥१४८॥ भृत्यताकरणीयेन कर्मणाऽस्मि वशीकृतः । एतां यन्न विमुञ्चामि प्रस्तावेऽप्यत्र दारुणे ॥१४॥ इति विमृश्य सन्त्यज्य सीतां धर्मधियं यथा । अयोध्याऽभिमुखोऽयासीत्सेनानीः सत्रपात्मकः ॥१५॥ इतराऽपि परिप्राप्तसंज्ञा परमदुःखिता। यूथभ्रष्टेव सारङ्गी बालाऽक्रन्दं समाश्रिता ॥१५॥ दुःख रूपी महाआवर्तके बीच आ पड़ा हूँ॥१३६॥ जिसमें इच्छाके विरुद्ध चाहे जो करना पड़ता है, आत्मा परतन्त्र हो जाती है, और क्षुद्र मनुष्य ही जिसकी सेवा करते हैं ऐसी लोकनिन्। दासवृत्तिको धिक्कार है ॥१४०।। जो यन्त्रकी चेष्टाओंके समान है तथा जिसकी आत्मा निरन्तर दुःख ही उठाती है ऐसे सेवकके जीवनकी अपेक्षा कुक्कुर का जीवन बहुत अच्छा है ॥१४१॥ जो नरेन्द्र अर्थात राजा (पक्षमें मान्त्रिक ) की शक्तिके आधीन है तथा निन्द्य नामका धारक है ऐसा सेवक पिशाचके समान क्या नहीं करता है ? और क्या नहीं बोलता है ? ॥१४२।। जो चित्र लिखित धनुषके समान है, जो कार्य रहित गुण अर्थात् डोरी ( पक्षमें ज्ञानादि ) से सहित है तथा जिसका शरीर निरन्तर नम्र रहता है ऐसे भृत्यका जीवन निन्द्य जीवन है ॥१४३॥ सेवक कचड़ा घरके समान है । जिस प्रकार लोग कचड़ा घरमें कचड़ा डालकर पीछे उससे अपना चित्त दूर हटा लेते हैं उसी प्रकार लोग सेवकसे काम लेकर पीछे उससे चित्त हटा लेते हैं-उसके गौरवको भूल जाते हैं, जिस प्रकार कचड़ाघर निर्माल्य अर्थात् उपभुक्त वस्तुओंको धारण करता है उसी प्रकार सेवक भी स्वामीकी उपभुक्त वस्तुआको धारण करता है। इस प्रकार सेवक नामको धारण करनेवाले मनुष्यके जीवित रहनेको बार-बार धिक्कार है ॥१४४॥ जो अपने गौरवको पीछ कर देता है तथा पानी प्राप्त करनेके लिए भी जिसे झुकना पड़ता है इस प्रकार तुला यन्त्रकी तुल्यताको धारण करनेवाले भृत्यका जीवित रहना धिक्कार पूर्ण है ।।१४५॥ जो उन्नति, लज्जा, दीप्ति और स्वयं निजकी इच्छासे रहित है तथा जिसका स्वरूप मिट्टीके पुतलेके समान क्रियाहीन है ऐसे सेवकका जीवन किसीको प्राप्त न हो ॥१४६।। जो विमान अर्थात् व्योमयान (पक्षम मान रहित ) होकर भी गति से रहित है तथा जो गुरुताके साथ-साथ निरन्तर नीचे जाता है ऐसे भृत्यके जीवनको धिक्कार है ॥१४७॥ जो स्वयं शक्तिसे रहित है, अपना मांस भी वेचता है, सदा मदसे शून्य है और परतन्त्र है ऐसे भृत्यके जीवनको धिक्कार है ।।१४८॥ जिसके उदयमें भृत्यता करनी पड़तो है ऐसे कर्मसे मैं विवश हो रहा हूँ इसीलिए तो इस दारुण अवसरके समय भी इस भृत्यताको नहीं छोड़ रहा हूँ ॥१४६।। इस प्रकार विचार कर धर्म बुद्धिके समान सीताको छोड़कर सेनापति लज्जित होता हुआ अयोध्याके सम्मुख चला गया ॥१५॥ तदनन्तर इधर जिसे चेतना प्राप्त हुई थी ऐसी सीता अत्यन्त दुःखी होती हुई यूथसे १. राजा मन्त्रवादी च । २. सत्कार म । संसार व० । संकारः कचारा इति श्रीदत्त टि०। ३. येन म०, क०, ख०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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