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________________ सप्तनवतितमं पर्व शृण्वताऽपि त्वया तत्तत्स्वार्थनाशनकारणम् । पडेनेव न कर्तव्यं हृदये गणभूषण ॥१२॥ तीव्राज्ञोऽपि यथाभूतो जगदावभासनात् । विकारमनु न प्राप्तो भवादित्य इव प्रियः।।१२७॥ भजस्व प्रस्खलं दानः प्रीतियोगैनिजं जनम् । परं च शोलयोगेन मित्रं सद्भावसेवनः ॥१२॥ यथोपपन्नमन्नेन समेतमतिथि गृहम् । साधून समस्तभावेन प्रणामाभ्यर्चनादिभिः ॥१२॥ तान्या क्रोधं मृदरवेन मानं निर्विषयस्थितम् । मायामार्जवयोगेन धृत्या लोभं तनूकुरु ॥१३॥ सर्वशास्त्रप्रवीणस्य नोपदेशस्तव क्षमः । चापलं हृदयस्येदं त्वत्प्रेमग्रहयोगिनः ॥१३॥ कृतं वश्यतया किञ्चित् परिहासेन वा पुनः । मयाऽविनयमीश वं समस्तं तन्तुमर्हसि ॥१३२॥ एतावदर्शनं नूनं भवता सह मे प्रभो । पुनः पुनरतो वच्मि पन्तव्यं साध्वसाधु वा ॥१३३॥ इत्युक्त्वा पूर्वमेवासाववतीर्णा रथोदरात् । पपात धरणीपृष्ठे तृणोपलसमाकुले ॥१३॥ धरण्यां पतिता तस्यां मूछ निश्चेतनीकृता । रराज जानकी यद्वत् पर्यस्ता रत्नसंहतिः ॥१३५॥ नष्टचेष्टां तकां दृष्ट्वा सेनानीरतिदुःखितः । अचिन्तयदियं प्राणान् दुष्करं धारयिष्यति ॥१३॥ अरण्येऽत्र महाभीष्मे व्यालसङ्घातसङ्कुले । विदधाति न धीरोऽपि प्रत्याशा जीवितं प्रति ॥१३॥ मृगाक्षीमेतिकां त्यक्त्वा विपिनेऽस्मिन्नमुत्तमे । स्थानं न तत् प्रपश्यामि यत्र मां शान्तिरेष्यति ॥१३॥ इतो निर्दयताऽत्युग्रा स्काम्याज्ञा निश्चिताऽन्यतः । अहो दुःखमहावर्त्तमध्यं प्राप्तोऽस्मि पापकः ॥१३॥ इस संसारका मुख बन्धन करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥१२५॥ हे गुणभूषण ! यद्यपि आत्महितको नष्ट करनेवाली अनेक बातें आप श्रवण करेंगे तथापि प्रहिल (पागल) के समान उन्हें हृदयमें नहीं धारण करना-विचार पूर्वक ही कार्य करना ।।१२६॥ जिस प्रकार सूर्य यद्यपि अत्यन्त तेजस्वी रहता है तथापि संसारके समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेसे यथाभूत है एवं कभी विकारको प्राप्त नहीं होता इसलिए लोगोंको प्रिय है उसी प्रकार यद्यपि आप तीव्र शासनसे युक्त हो तथापि जगत्के समस्त पदार्थों को ठीक-ठीक जाननेके कारण यथाभूत यथार्थ रूप रहना एवं कभी विकारको प्राप्त नहीं होनेसे सूर्यके समान सबको प्रिय रहना ॥१२७॥ दुष्ट मनुष्यको कुछ देकर वश करना, आत्मीय जनोंको प्रेम दिखाकर अनुकूल रखना, शत्रुको उत्तमशील अथात् निर्दोष आचरणसे वश करना और मित्रको सद्भाव पूर्वक की गई सेवाओंसे अनुकूल रखना ॥१२८।। क्षमासे क्रोधको, मार्दवसे चाहे जहाँ होनेवाले मानको, आर्जवसे मायाको और धैर्यसे लोभको कृश करना ॥१२६-१३०।। हे नाथ ! आप तो समस्त शास्त्रोंमें प्रवीण हो अतः आपको उपदेश देना योग्य नहीं है, यह जो मैंने कहा है वह आपके प्रेम रूपी ग्रहसे संयोग रखनेवाले मेरे हृदयकी चपलता है ॥१३१॥ हे स्वामिन् ! आपके वशीभूत होनेसे अथवा परिहासके कारण यदि मैंने कुछ अविनय किया हो तो उस सबको क्षमा कीजिये ॥१३२।। हे प्रभो ! जान पड़ता है कि आपके साथ मेरा दर्शन इतना ही था इसलिए बार-बार कह रही हूँ कि मेरी प्रवृत्ति उचित हो अथवा अनुचित सब क्षमा करने योग्य है ॥१३३।। जो रथके मध्यसे पहले ही उतर चुकी थी ऐसी सीता इस प्रकार कहकर तृण तथा पत्थरोंसे व्याप्त पृथिवी पर गिर पड़ी ।।१३४|| उस पृथिवी पर पड़ी, मूच्र्छासे निश्चल सीता ऐसी जान पड़ती थी मानो रत्नोंका समूह ही बिखर गया हो ॥१३५॥ चेष्टा हीन सीताको देखकर सेनापतिने अत्यन्त दुःखी हो इस प्रकार विचार किया कि यह प्राणोंको बड़ी कठिनाईसे धारण कर सकेगी ॥१३६।। हिंसक जीवोंके समूहसे भरे हुए इस महा भयंकर वनमें धीर वीर मनुष्य भी जीवित रहनेकी आशा नहीं रख सकता ॥१३७। इस विकट वनमें इस मृगनयनीको छोड़कर मैं वह स्थान नहीं देखता जहाँ मुझे शान्ति प्राप्त हो सकेगी ॥१३८॥ इस ओर अत्यन्त भयंकर निर्दयता है और उस ओर स्वामीकी सुदृढ आज्ञा है। अहो ! मैं पापी १. पडेनेव अहिलेनेव । पडः पहिलः इति श्री० हि० । एडेनेव म० । २. -मतनु म०, ग०, ख० । ३. प्रस्खलं म०। ४. निर्विषया स्थितम् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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