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________________ ११. पद्मपुराणे न सवित्री न च भ्राता न च बान्धवसंहतिः। आश्रयस्तेऽधुना देवि मृगाकुलमिदं वनम् ॥११२॥ ततस्तवचनं श्रुत्वा वज्रेणेवाभिताडिता । हृदये दुःखसम्भारव्याप्ता मोहमुपागता ॥१३॥ संज्ञां प्राप्य च कृच्छ्रेण स्खलितोद्गतवर्णगीः । जगादापृच्छनं कतै सकृन्मे नाथमीक्षय ॥११॥ सोऽवोचहेवि दूरं सा नगरी रहिताऽधुना । कुतः पश्यसि पमाभं परमं चण्डशासनम् ॥११५॥ ततोऽश्रजलधाराभिः शालयन्त्यास्यपङ्कजम् । तथापि निर्भरस्नेहरसाक्रान्ता जगाविदम् ॥११६॥ सेनापते त्वया वाच्यो रामो मद्वचनादिदम् । यथा मत्यागजः कार्यो न विषादस्त्वया प्रभो ॥११७॥ अवलम्ब्य परं धैर्य महापुरुष सर्वथा । सदा रक्ष प्रजां सम्यपितेव न्यायवत्सलः ॥११॥ परिप्राप्तकलापारं नृपमाहादकारणम् । शरच्चन्द्रमसं यद्वदिच्छन्ति सततं प्रजाः ॥११॥ संसाराद् दुःखनि?रान्मुच्यन्ते येन देहिनः । भव्यास्तदर्शनं सम्यगाराधयितुमर्हसि ॥२०॥ साम्राज्यादपि पद्माभ तदेव बहु मन्यते । नश्यत्येव पुना राज्यं दर्शन स्थिरसौख्यदम् ॥१२१॥ तदभव्यजुगप्सातो भीतेन पुरुषोत्तम । न कथञ्चित्वया त्याज्यं नितान्तं तद्धि दुर्लभम् ॥१२२॥ रत्नं पाणितलं प्राप्तं परिभ्रष्टं महोदधौ । उपायेन पुनः केन सङ्गति प्रतिपद्यते ॥१२३॥ क्षिप्वामृतफलं कूपे महाऽऽपत्तिभयङ्करे। परं प्रपद्यते दुःखं पश्चात्तापहतः शिशः ॥१२४॥ यस्य यत्सदृशं तस्य प्रवदत्वनिवारितः । को ह्यस्य जगतः कर्तुं शक्नोति मुखबन्धनम् ।।१२५।। उन स्वामीके निःस्नेह होने पर आपके लिए कहीं कोई शरण नहीं जान पड़ता ॥१११।। हे देवि ! तेरे लिए न माता शरण है, न भाई शरण है, और न कुटुम्बीजनोंका समूह ही शरण है। इस समय तो तेरे लिए मृगोंसे व्याप्त यह वन ही शरण है ॥११२।। तदनन्तर सीता उसके वचन सुन हृदय में वज्रसे ताड़ितके समान अत्यधिक दुःखसे व्याप्त होती हुई मोहको प्राप्त हो गई ॥११३॥ बड़ी कठिनाईसे चेतना प्राप्त कर उसने लड़खड़ाते अक्षरों वाली वाणीमें कहा कि कुछ पूछनेके लिए मुझे एक बार स्वामीके दर्शन करा दो ॥११४॥ इसके उत्तरमें कृतान्तवक्त्रने कहा कि हे देवि ! इस समय तो वह नगरी बहुत दूर रह गई है अतः अत्यधिक कठोर आज्ञा देनेवाले स्वामी-रामको किस प्रकार देख सकती हो ? ॥११५॥ तदनन्तर सीता यद्यपि अश्रजलकी धारामें मुखकमलका प्रक्षालन कर रही थी तथापि अत्यधिक स्नेह रूपी रससे आक्रान्त हो उसने यह कहा कि ॥११६॥ हे सेनापते ! तुम मेरी ओरसे रामसे यह कहना कि हे प्रभो ! आपको मेरे त्यागसे उत्पन्न हुआ विषाद नहीं करना चाहिए ॥११७॥ हे महापुरुष ! परम धैर्यका अवलम्बन कर सदा पिताके समान न्यायवत्सल हो प्रजाकी अच्छी तरह रक्षा करना ॥११॥ क्योंकि जिस प्रकार प्रजा पूर्ण कलाओंको प्राप्त करनेवाले शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी सदा इच्छा करती है-उसे चाहती है उसी प्रकार कलाओंके पारको प्राप्त करनेवाले एवं आह्लादके कारण भूत राजाकी प्रजा सदा इच्छा करती है-उसे चाहती है ।।११६॥ जिस सम्यग्दर्शनके द्वारा भव्य जीव दुःखोंसे भयंकर संसारसे छूट जाते हैं उस सम्यग्दर्शनकी अच्छी तरह आराधना करनेके योग्य हो ॥१२०।। हे राम ! साम्राज्यकी अपेक्षा वह सम्यग्दर्शन ही अधिक माना जाता है क्योंकि साम्राज्य तो नष्ट हो जाता है परन्तु सम्यग्दर्शन स्थिर सुखको देनेवाला है ॥१२१॥ हे पुरुषोत्तम ! अभव्योंके द्वारा की हुई जुगुप्सासे भयभीत होकर तुम्हें वह सम्यग्दर्शन किसी भी तरह नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वह अत्यन्त दुर्लभ है ।।१२२।। हथेलीमें आया रत्न यदि महासागरमें गिर जाता है तो फिर वह किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? ॥१२३॥ अमृतफलको महा आपत्तिसे भयंकर कुँएमें फेंककर पश्चात्तापसे पीड़ित बालक परम दुःखको प्राप्त होता है॥१२४॥ जिसके अनुरूप जो होता है वह उसे विना किसी प्रतिवन्धके कहता ही है क्योंकि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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