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________________ सप्तनवतितम पर्व २०३ समुद्रक्रोडपर्यस्ता सगरात्मजनिर्मिताम् । आरसातलगम्भीरां पुलिनैः शोमिता सितैः ॥१॥ फेनमालासमासक्तविशालाव-भैरवाम् । प्रान्तावस्थितसस्वानशकुन्तगणराजिताम् ॥१०॥ अश्वास्ते तां समुत्तीर्णाः पवनोपमरंहसः । सम्यक्त्वसारयोगेन संसृति साधवो यथा ॥११॥ ततो मेरुवदक्षोभ्यचित्तोऽपि सततं भवन् । सेनानीः परमं प्राप विषादं सदयस्तदा ॥१०२॥ किञ्चिद्वक्तमशक्तात्मा महादुःखसमाहृतः । नियन्तुमक्षमः स्थातुं प्रबलायातवाष्पकः ॥१०३॥ विश्त्य स्यन्दनं लग्नः कतं क्रन्दनमुत्कटम् । निधाय मस्तके हस्तौ स्रस्ताङ्गो विगतद्युतिः ॥१०॥ ततो जगाद वैदेही प्रभ्रष्टहृदया सती । कृतान्तवक्त्र कस्मात्त्वं विरोषीदं सुदुःखिवत् ॥१०५॥ प्रस्तावेऽन्यन्तहर्षस्य विषादयसि मामपि । विजनेऽस्मिन् महारण्ये कस्मादाश्रितरोदनः ॥१०६॥ स्वाम्यादेशस्य कृत्यत्वाद्वक्तव्यत्वान्नियोगतः । कथञ्चिद्रोदनं कृत्वा यथावत्स न्यवेदयत् ॥१०७॥ विपानिशस्त्रसदृशं शुभे दुर्जनभाषितम् । श्रुत्वा देवेन दुष्कीर्तिः परमं भयमीयुषा ॥१०॥ सन्त्यज्य दुस्त्यजं स्नेहं दोहदानां नियोगतः । त्यक्तासि देवि रामेण श्रमणेन रतियथा ॥१०॥ स्वामिन्यस्ति प्रकारोऽसौ नैव येन स विष्णुना । अनुनीतस्तवार्थेन न तथाप्यत्यजद् ग्रहम् ॥११॥ तस्मिन् स्वामिनि नीरागे शरणं तेऽस्ति न क्वचित् । धर्मसम्बन्धमुक्ताया जीवे सौख्यस्थितेरिव ॥११॥ किनारे पर स्थित ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको जड़से उखाड़ डाला है, कहीं इसके वेगने बड़े-बड़े पर्वतोंकी चट्टानोंके समूहको विदारित कर दिया है ।।१८।। यह समुद्रकी गोद में फैली है, राजा सगरके पुत्रों द्वारा निर्मित है, रसातल तक गहरी है, सफेद पुलिनोंसे शोभित है ।।६६ फेनके समूहसे सहित बड़ी-बड़ी भँवरोंसे भयंकर है, और समीपमें स्थित पक्षियोंके समूहसे सुशोभित है ॥१०॥ पवनके समान वेगशाली वे घोड़े उस गङ्गानदीको उस तरह पार कर गये जिस तरह कि साधु सम्यग्दर्शनके सार पूर्ण योगसे संसारको पार कर जाते हैं ।।१०१॥ तदनन्तर कृतान्तवक्त्र सेनापति यद्यपि मेरुके समान सदा निश्चल चिंत्त रहता था तथापि उस समय वह दया सहित होता हुआ परम विषादको प्राप्त हो गया ॥१०२।। कुछ भी कहनेके लिए जिसकी आत्मा अशक्त थी, जो महादुःखसे ताड़ित हो रहा था, तथा जिसके बलात् आँसू निकल रहे थे ऐसा कृतान्तवक्त्र अपने आप पर नियन्त्रण करने तथा खड़े होनेके लिए असमर्थ हो गया ||१०३।। तदनन्तर जिसका समस्त शरीर ढीला पड़ गया था और जिसकी कान्ति नष्ट हो गई थी ऐसा सेनापति रथ खड़ा कर और मस्तक पर दोनों हाथ रखकर जोर-जोरसे रुदन करने लगा ।।१०४।। तत्पश्चात् जिसका हृदय टूट रहा था ऐसी सती सीताने कहा कि हे कृतान्तवक्त्र ! तू अत्यन्त दुःखी मनुष्य के समान इस तरह क्यों रो रहा है ? ॥१०५।। तू इस अत्यधिक हर्षके अवसरमें मुझे भी विषाद युक्त कर रहा है। बता तो सही कि तू इस निर्जन महावनमें क्यों रो रहा है ॥१०६।। स्वामीका आदेश पालन करना चाहिए अथवा अपने नियोगके अनुसार यथार्थ बात अवश्य कहना चाहिए इन दो कारणोंसे जिस किसी तरह रोना रोक कर उसने यथार्थ बातका निरूपण किया ॥१०७। उसने कहा कि हे शुभे ! विष अग्नि अथवा शस्त्रके समान दुर्जनोंका कथन सुनकर जो अपकीर्तिसे अत्यधिक भयभीत हो गये थे ऐसे श्रीरामने दुःखसे छूटने योग्य स्नेह छोड़कर दोहलोंके बहाने हे देवि ! तुम्हें उस तरह छोड़ दिया है जिस तरह कि मुनि रतिको छोड़ देते हैं ।।१०८-१०६।। हे स्वामिनि! यद्यपि ऐसा कोई प्रकार नहीं रहा जिससे कि लक्ष्मणने आपके विषयमें उन्हें समझाया नहीं हो तथापि उन्होंने अपनी हठ नहीं छोड़ी ॥११०।। जिस प्रकार धर्मके सम्बन्धसे रहित जीवकी सुखस्थितिको कहीं शरण नहीं प्राप्त होता उसी प्रकार १. सम्यक् संसारयोगेन (?) म० । २. दुःकीर्तिः म० । ३. देव म० । Jain Education International७-२ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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