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________________ २०६ पद्मपुराणे सहकारसमासक्ता कचित् सुन्दरमाधवी । वेश्येव चपलासक्तमशोकम भिलष्यति ॥५॥ महापादपसङ्घातः कचिद्दावविनाशितः। न भाति हृदयं साधोः खलवाक्याहतं यथा ॥८६॥ सुपल्लवलताजालेः क्वचिन् मन्दानिलेरितैः । नृत्यं वसन्तपत्नीव वनराजी निषेवते ॥७॥ क्वचित् पुलिन्दसङ्घातमहाकलकलारवैः । उद्भ्रान्त विहगा दूरं गता सारङ्गसंहतिः ॥८॥ क्वचिदुनतशैलाग्रं पश्यन्ती चोर्ध्वमस्तका। विचित्रधातुनिर्माणैर्नयनैः कौतुकान्वितैः ॥८॥ क्वचिदच्छाल्पनीराभिः सरिद्भिः प्रोषितप्रिया। नारीवाश्रप्रपूर्णाक्षा भाति सन्तापशोभिता ॥१०॥ नानाशकुन्तनादेन जल्पतीव मनोहरम् । करोतीव क्वचिद्वीध्रनिराहसं मुदा ॥११॥ मकरन्दातिलुब्धाभिभृङ्गीभिर्मदमन्थरम् । क्वचित संस्तूयमानेव शोभते नमिता फलः ॥१२॥ सत्पल्लवमहाशाखैवृक्षायुविधूर्णितः । उपचारप्रसक्तव पुष्पवृष्टिं विमुञ्चते ॥१३॥ एवमादिक्रियासकामटवीं श्वापदाकुलाम् । पश्यन्ती याति वैदेही पभाभापतिमानसा ॥१४॥ तावच मधुरं श्रत्वा स्वनमत्यन्तमांसलम् । दध्यौ किन्वेष रामस्य दुन्दुभिध्वनिरायतः ॥१५॥ इति प्रतकमापना दृष्टा भागीरथीमसौ। एतद्घोषप्रतिस्वानं जानात्यन्यदिशि श्रुतम् ॥१६॥ अन्तनक्रमषग्राहमकरादिविघट्टिताम् । उद्घतोर्मिसमासङ्गात् क्वचिस्कम्पितपङ्कजाम् ॥१७॥ समूलोन्मूलितोत्तङ्गरोधोगतमहीरुहाम् । विदारितमहाशैलग्रावसङ्घातरंहसम् ॥१८॥ जिसकी जड़े विरली विरली थी, तथा जो छाया (पक्षमें कान्ति) से रहित थी ऐसी कुलीन विधवाके समान अटवीको देखती जाती थी ॥८४॥ उसने देखा कि कहीं आम्रवृक्षसे लिपटी सुन्दर माधवी लता, चपल वेश्याके समान निकटवर्ती अशोक वृक्षपर अभिलाषा कर रही है ॥८॥ उसने देखा कि कहीं दावानलसे नाशको प्राप्त हए बड़े बड़े वृक्षोंका समह दर्जनके वाक्योंसे ताड़ित साधुके हृदयके समान सुशोभित नहीं हो रहा है ।।८६॥ कहीं उसने देखा कि मन्द मन्द वायुसे हिलते हुए उत्तम पल्लवों वाली लताओंके समूहसे वनराजी ऐसी सुशोभित हो रही है • मानो वसन्तकी पत्नी नृत्य ही कर रही हो ॥८७॥ कहीं उसने देखा कि भीलोंके समूहकी तीव्र कल-कल ध्वनिसे जिसने पक्षियोंको उड़ा दिया है ऐसी हरिणोंकी श्रेणी बहुत दूर आगे निकल गई है ॥८॥ वह कहीं विचित्र धातुओंसे निर्मित, कौतुकपूर्ण नेत्रोंसे, मस्तक ऊपर उठा पर्वतकी ऊँची चोटीको देख रही थी ॥८६॥ कहीं उसने देखा कि स्वच्छ तथा अल्प जल वाली नदियोंसे यह अटवी उस संतापवती विरहिणी स्त्रीके समान जान पड़ती है कि जिसका पति परदेश गया है और जिसके नेत्र आसुओंसे परिपूर्ण हैं ॥६०ll यह अटवी कहीं तो ऐसी जान पड़ती है मानो नाना पक्षियोंके शब्दके बहाने मनोहर वार्तालाप ही कर रही हो और कहीं उज्ज्वल निझरों से युक्त होनेके कारण ऐसी विदित होती है मानो हर्षसे अट्टहास ही कर रही हो ।।६१।। कहीं मक न्दकी लोभी भ्रमरियोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो मदसे मन्थर ध्वनिमें भ्रमरियाँ उसकी स्तुति ही कर रही हों और फलोंके भारसे वह संकोचवश नम्र हई जा रही हो ॥१२॥ कहीं उसने । देखा कि वायुसे हिलते हुए उत्तमोत्तम पल्लवों और महाशाखाओंसे युक्त वृक्षोंके द्वारा यह अटवी विनय प्रदर्शित करनेमें संलग्न की तरह पुष्पवृष्टि छोड़ रही है ॥६३|| जिसका मन रामकी अपेक्षा कर रहा था ऐसी सीता उपर्युक्त क्रियाओंमें आसक्त एवं वन्य पशुओंसे युक्त अटवीको देखती हुई आगे जा रही थी ॥४॥ तदनन्तर उसी समय अत्यन्त पुष्ट मधुर शब्द सुनकर वह विचार करने लगी कि क्या यह रामके दुन्दुभिका विशाल शब्द है ? ॥६।। इस प्रकारका तर्क कर तथा आगे गङ्गा नदीको देखकर उसने जान लिया कि यह अन्य दिशामें सुनाई देनेवाला इसीका शब्द है ॥६६॥ उसने देखा कि यह गङ्गानदी कहीं तो भीतर क्रीड़ा करनेवाले नाके, मच्छ तथा मकर आदिसे विघट्टित है, कहीं उठती हुई बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके संसर्गसे इसमें कमल कम्पित हो रहे हैं ॥१७॥ कहीं इसने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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