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________________ सप्तनवतितमं पर्व १०७ एवं तदुक्तितः पत्युरनादेशाच्च योषितः । शेषा विहरणे बुद्धिं न चक्रुश्वारुभाषिताः ॥७॥ ततः सिद्धान्नमस्कृत्य प्रमोदं परमं श्रिता | प्रसन्नवदना सीता रथमारोहदुज्ज्वलम् ॥७२॥ सा तं रथं समारूढा रत्नकाञ्चनकल्पितम् । रेजे सुरवधूर्यद्वद्विमानं रत्नमालिनी ॥७३॥ रथः कृतान्तवक्त्रेण चोदितो वरवाजियुक् । ययौ भरतनिर्मुक्तो नाराच इव वेगवान् ॥७॥ शुष्कद्रमसमारूढो वायसोऽत्यन्तमाकुलः । रराट विरसंधुन्वन्नसकृत्पक्षमस्तकम् ॥७५॥ सुमहाशोकसन्तप्ता धृतमुक्तशिरोरुहा । रुरोदाभिमुखं नारी कुर्वती परिदेवनम् ॥७६॥ पश्यन्त्यप्येवमादीनि दुनिमित्तानि जानकी । व्रजत्येव जिनासक्तमानसा स्थिरनिश्चया ॥७॥ महीभृच्छिखरश्वभ्रकन्दरावनगह्वरम् । निमेषेण समुल्लध्य योजनं यात्यसौ रथः ॥७८॥ ताच्यवेगाश्वसंयुक्तः सितकेतुविराजितः । भादित्यरथसङ्काशो रथो यात्यनिवारितः ॥७॥ रामशक्रप्रियारूढो मनोरथजवो रथः । कृतान्तमातलिक्षिप्रनुशाश्वः शोभतेतराम् ॥८॥ तत्रापाश्रयसंयुक्ततनुः सुपरमासना।। याति सीता सुखं क्षोणी पश्यन्ती विविधामिति ॥८॥ कचिग्रामे पुरेऽरण्ये सरांसि कमलादिभिः । कुसुमैरतिरम्याणि तयाऽदृश्यन्त सोत्सुकम् ॥२॥ कचिद्धनपटच्छमनभोरात्रितमः समम् । दुरालचयपृथग्भावं विशालं वृक्षगहरम् ॥३॥ च्युतपुष्पफला तन्वी विपत्रा विरलोहिपा । अटवी क्वचिदच्छाया विधवा कुलजा यथा ॥८॥ करना योग्य है ॥६६-७०।। इस प्रकार सीताके कहने से तथा पतिका आदेश नहीं होनेसे सुन्दर भाषण करनेवाली अन्य स्त्रियोंने उसके साथ जानेको इच्छा नहीं की थी॥७२॥ तदनदन्तर परम प्रमोदको प्राप्त, प्रसन्नमुखी सीता, सिद्धोंकी नमस्कार कर उज्ज्वल रथ पर आरूढ़ हो गई ॥७२॥ रत्न तथा सुवर्ण निर्मित रथ पर आरूढ़ हुई सीता उस समय इस तरह सुशोभित हो रही थी जिस तरह कि विमान पर आरूढ़ हुई रत्नमालासे अलंकृत देवाङ्गना सुशोभित होती है ॥७३॥ कृतान्तवक्त्र सेनापतिके द्वारा प्रेरित, उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ वह . रथ भरत चक्रवर्तीके द्वारा छोड़े हुए बाणके समान बड़े वेगसे जा रहा था ॥७४॥ उस समय सूखे वृक्ष पर अत्यन्त व्याकुल कौआ, पङ्ख तथा मस्तकको बार-बार कॅगगता हुआ विरस शब्द ; कर रहा था ॥७५।। जो महाशोकसे संतप्त थी, जिसने अपने बाल कम्पित कर छोड़ दिये थे, तथा जो विलाप कर रही थी ऐसी एक स्त्री सामने आकर रोने लगी ।।७६।। यद्यपि सीता इन सब अशकुनोंको देख रही थी तथापि जिनेन्द्र भगवान में आसक्त चित्त होनेके कारण वह दृढ़ निश्चयके साथ आगे चली जा रही थी ॥७७॥ पर्वतोंके शिखर, गड़े, गुफाएँ और वन इन सब से ऊँची नीची भूमिको उल्लंघन कर वह रथ निमेष मात्रमें एक योजन आगे बढ़ जाता था ॥७८।। जिसमें गरुड़के समान वेगशाली घोड़े जुते थे, जो सफेद पताकाओंसे सुशोभित तथा जो कान्तिमें सूर्यके रथके समान था ऐसा वह रथ विना किसी रोक-टोकके आगे बढ़ता जाता था |७|| जिस पर रामरूपी इन्द्रको प्रिया-इन्द्राणी आरूढ़ थी, जिसका वेग मनोरथके समान तीव्र था, और जिसके घोड़े कृतान्तवक्त्ररूपी मातलिके द्वारा प्रेरित थे ऐसा वह रथ अत्यधिक शोभित हो रहा था ॥८॥ वहाँ जो तकियाके सहारे उत्तम आसनसे बैठी थी ऐसी सीता नाना प्रकारको भूमिको इस प्रकार देखती हुई जा रही थी॥१।। वह कहीं गाँवमें, कहीं नगरमें और कहीं जंगल में कमल आदिके फूलोंसे अत्यन्त मनोहर तालाबोंको बड़ी उत्सुकतासे देखती जाती थी ॥२।। वह कहीं वृक्षोंकी उस विशाल मुरमुटको देखती जाती थी जहाँ मेघ रूपी पटसे आच्छादित आकाशवाली रात्रिके समान सघन अन्धकार था और जिसका पृथकपना बड़ी कठिनाईसे दिखाई पड़ता था ।।८३॥ कहीं जिसके फल फूल और पत्ते गिर गये थे, जो कृश थी १. धूतमुक्ता शिरोरुहा म० । २. बिरला ह्रिया म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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