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________________ एकनवतितम पर्व १७३ गृहीतदारुभारेण तेनापेनाथ वीक्षितम् । अतिकष्टं क्वणन् खेदादचलो निश्चलः स्थितः ॥२७॥ दारुभारं परित्यज्य तेन तस्यासिकन्यया । आकृष्टः कण्टको दत्त्वा' कटकं चेति भाषितः ॥२८॥ यदि नामाचलं किञ्चिच्छणुयाल्लोकविश्रुतम् । स्वया तस्य ततोऽभ्याशं गन्तव्यं संशयोज्झितम् ॥२६॥ अपो यथोचितं यातो राजपुत्रोऽपि दुःखवान् । कौशाम्बीबाह्यमुद्देशं प्राप्तः सत्वसमुन्नतः ॥३०॥ तवेन्द्रदत्तनामानं कोशावत्ससमुद्भवम् । ययौ कलकलाशब्दात् सेवमानं खरूलिकाम् ॥३१॥ विजित्य विशिखाचार्य लब्धपूजोऽथ भूभृता । प्रवेश्य नगरीमिन्द्रदत्ताख्यां लम्भितः सुताम् ॥३२॥ क्रमेण चानुभावेन चारुणा पूर्वकर्मणा । उपाध्याय इति ख्यातो वीरोऽसौ पार्थिवोऽभवत् ॥३३॥ अङ्गाद्यान् विषयाञ्जित्वा प्रतापी मथुरां श्रितः । बाह्योद्देशे कृतावासः स्थितः कटकसङ्गतः ॥३४॥ चन्द्रभन्दनृपः पुत्रमारोऽयमिति भाषितैः । सामन्ताः सकलास्तस्य भिन्नास्येनार्थसङ्गतैः ॥३५॥ एकाकी चन्द्रभद्गश्च विषादं परमं भजन् । श्यालान् सम्प्रेषयहेवशब्दान्तान् सन्धिवाञ्छया ॥३६॥ दृष्ट्वा ते तं परिज्ञाय विलक्षास्त्रासमागताः । अदृष्टसेवकाः साकं धरायास्तनयः कृताः ॥३७॥ अचलस्य समं मात्रा सञ्जातः परमोत्सवः । राज्यं च प्रणताशेषराजकं गुणपूजितम् ॥३८॥ इसलिए उसने उसे कहीं बाहर भगा दिया। एक दिन अचल तिलक नामक वनमें जा रहा था कि उसके पैर में एक बड़ा भारी काँटा लग गया। काँटा लग जानेके कारण दुःखसे अत्यन्त दुःखदायी शब्द करता हुआ वह उसी तिलक वनमें एक ओर खड़ा हो गया। उसी समय लकड़ियोंका भार लिये हुए अप वहाँसे निकला और उसने अचलको देखा ॥२५-२७।। अपने लकड़ियोंका भार छोड़ छुरीसे उसका काँटा निकाला । इसके बदले अचलने उसे अपने हाथका कड़ा देकर कहा कि यदि तू कभी किसी लोक प्रसिद्ध अचलका नाम सुने तो तुझे संशय छोड़कर उसके पास जाना चाहिए ॥२८-२६॥ तदनन्तर अप यथायोग्य स्थान पर चला गया और राजपुत्र अचल भी दुःखी होता हुआ धैर्यसे युक्त हो कौशाम्बी नगरीके बाह्यप्रदेश में पहुँचा ॥३०॥ वहाँ कौशाम्बीके राजा कोशावत्सका पुत्र इन्द्रदत्त, बाण चलानेके स्थानमें बाण विद्याका अभ्यास कर रहा था सो उसका कलकला शब्द सुन अचल उसके पास चला गया ॥३१॥ वहाँ इन्द्रदत्तके साथ जो उसका विशिखाचार्य अर्थात् शस्त्र विद्या सिखानेवाला गुरु था उसे अचलने पराजित किया था। तदनन्तर जब राजा कोशावत्सको इसका पता चला तब उसने अचलका बहुत सन्मान किया और सम्मानके साथ नगरीमें प्रवेश कराकर उसे अपनी इन्द्रदत्ता नामकी कन्या विवाह दी ॥३२।। तदनन्तर वह क्रम-क्रमसे अपने प्रभाव और पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मसे पहले तो उपाध्याय इस नामसे प्रसिद्ध था और उसके बाद राजा हो गया ॥३३॥ तत्पश्चात् वह प्रतापी अङ्ग आदि देशोंको जीत कर मथुरा आया और उसके बाह्य स्थानमें डेरे देकर सेनाके साथ ठहर गया ॥३४॥ यह चन्द्रभद्र राजा 'पुत्रको मारनेवाला है। ऐसे यथार्थ शब्द कहकर उसने उसके समस्त सामन्तोंको अपनी ओर फोड़ लिया ।।३५।। जिससे चन्द्रभद्र अकेला रह गया। अन्तमें परम विषादको प्राप्त होते हुए उसने सन्धिकी इच्छासे अपने सूर्यदेव, अब्धिदेव और यमुनादेव नामक तीन साले भेजे ॥३६॥ सो वे उसे देख तथा पहिचान कर लज्जित हो भयको प्राप्त हुए और धरा रानीके आठों पुत्रों के साथ-साथ सेवकोंसे रहित हो गये अर्थात् भयसे भाग गये ॥३७॥ अचलको माताके साथ मिलकर बड़ा उल्लास हुआ और जिसमें समस्त राजा नम्रीभूत थे तथा जो गुणोंसे पूजित था ऐसा राज्य उसे प्राप्त हुआ ॥३८॥ १. कण्टकं म० । २. अथो ख० । ३. कोशाम्बात्ससमुद्भवम् म० । कोशावसमयोज्झितम् क० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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