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________________ १७४ पद्मपुराणे अन्यदा नटरङ्गस्य मध्ये तमपमागतम् । हन्यमानं प्रतीहारैर्दृष्ट्वाऽभिज्ञातवान् नृपः ॥ ३६ ॥ तस्मै संयुक्तमापाद्य श्रावस्ती जन्मभूमिकाम् । कृतापरङ्गसंज्ञाय ददावचलभूपतिः ॥ ४० ॥ aiguri गतौ क्रीडां विधातुं पुरुसम्पदौ । यशः समुद्रमाचार्य दृष्ट्वा नैर्ग्रन्थ्यमाश्रितौ ॥४१॥ संयमं परमं कृत्वा सम्यग्दर्शनभावितौ । मृतौ समाधिना जातौ देवेशौ कमलोत्तरे ॥४२॥ ततश्च्युतः समानोऽसावचलः पुण्यशेषतः । सुप्रजोलोचनानन्दः शत्रुघ्नोऽयमभून्नृपः ॥ ४३ ॥ तेनानेकभवप्राप्तिसम्बन्धेनास्य भूपतेः । बभूव परमप्रीतिर्मथुरां प्रति पार्थिव ॥ ४४ ॥ गृहस्य शाखिनो वाऽपि यस्यच्छायां समाश्रयेत् । स्थीयते दिनमध्येकं प्रीतिस्तत्रापि जायते ॥ ४५ ॥ किं पुनर्यत्र भूयोऽपि जन्मभिः संगतिः कृता । संसारभावयुक्तानां जीवानामीदृशी गतिः ॥ ४६ ॥ परियारङ्गोऽपि पुण्यशेषादभूदसौ । कृतान्तवक्त्र विख्यातः सेनायाः पतिरूर्जितः ॥४७॥ इति 'धर्मार्जनादेतौ प्राप्तौ परमसम्पदः । धर्मेण रहितैर्लभ्यं न हि किञ्चित्सुखावहम् ॥ ४८ ॥ अनेकमपि सञ्चित्य जन्तुर्दुःखमलक्षये । धर्मतीर्थे श्रुते (श्रयेत् ) शुद्धिं जलतीर्थमनर्थकम् ॥ ४६ ॥ आर्या एवं पारम्पर्यादागतमिदमद्भुतं नितान्तमुदारम् । कथितं शत्रुघ्नायनमवबुध्य बुधा भवन्तु धर्मसुरक्ताः ॥ ५० ॥ अथानन्तर किसी एक समय पैरका काँटा निकालनेवाला अप नटोंकी रङ्गभूमिमें आया सो प्रतीहारी लोग उसे मार रहे थे। राजा अचलने उसे देखते ही पहिचान लिया ||३६|| और अपने पास बुलाकर उसका अपरंग नाम रक्खा तथा उसकी जन्मभूमि स्वरूप श्रावस्ती नगरी उसके लिए दे दी ||४०|| ये दोनों ही मित्र साथ-साथ ही रहते थे । परम सम्पदाको धारण करनेवाले दोनों मित्र एक दिन क्रीड़ा करने के लिए उद्यान गये थे सो वहाँ यशःसमुद्र नामक आचार्य के दर्शन कर उनके समीप दोनों ही निर्मन्थ अवस्थाको प्राप्त हो गये || ४१ ॥ सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त दोनों मुनियोंने परम संयम धारण किया और दोनों ही आयुके अन्तमें समाधिमरण कर स्वर्ग में देवेन्द्र हुए || ४२ ॥ सन्मानसे सुशोभित वह अचलका जीव, स्वर्गसे च्युत हो अवशिष्ट पुण्यके प्रभावसे माता सुप्रजाके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाला यह राजा शत्रुघ्न हुआ है ॥४३॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! अनेक भवों में प्राप्तिका सम्बन्ध होनेसे इसकी मथुरा के प्रति परम प्रीति है ॥ ४४ ॥ जिस घर अथवा वृक्षकी छायाका आश्रय लिया जाता है अथवा वहाँ एक दिन भी ठहरा जाता है उसकी उसमें प्रीति हो जाती है ॥४५॥ फिर जहाँ अनेक जन्मोंमें बार-बार रहना पड़ता है उसका क्या कहना है ? यथार्थमें संसार में परिभ्रमण करनेवाले जीवोंकी ऐसी ही गति होती है || ४६ ॥ अपरंगका जीव भी स्वर्गसे च्युत हो पुण्य शेष रहने से कृतान्तवक्त्र नामका प्रसिद्ध एवं बलवान् सेनापति हुआ है ||४७|| इस प्रकार धर्मार्जनके प्रभाव से ये दोनों परम सम्पदाको प्राप्त हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि धर्मसे रहित ग्राणी किसी सुखदायक वस्तुको नहीं प्राप्त कर पाते हैं || ४८ || इस प्राणीने अनेक भवोंमें पापका संचय किया है सो दुःख रूपी मलका क्षय करनेवाले धर्मरूपी तीर्थ में शुद्धिको प्राप्त करना चाहिए इसके लिए जलरूपी तीर्थका आश्रय लेना निरर्थक है ||४६ ॥ इस प्रकार आचार्य परम्परासे आगत, अत्यन्त आश्चर्यकारी एवं उत्कृष्ट शत्रुघ्न के इस चरितको जानकर हे विद्वज्जनो ! सदा धर्म में अनुरक्त १. सुप्रजालोचनानन्दः म० ज० । २. धमाञ्जनादेतौ म० । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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