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________________ १४२ पद्मपुराणे संयतान्' तत्र पश्यन्तौ भक्षयन्तौ यथेप्सितम् । अनं राजकुले प्राप्तौ हरिणौ परमां धृतिम् ॥८२॥ आयुष्येषः परिक्षीणे लब्धमृत्युः समाधिना । सुरलोकमितोऽन्योऽपि तिर्यक्षु पुनरभ्रमत् ॥ ८३ ॥ ततः कथमपि प्राप कर्मयोगान्मनुष्यताम् । विनोदचरसारङ्गः स्वप्ने राज्यमिवोदितम् ॥ ८४ ॥ जम्बूद्वीपस्य भरते काम्पिल्यनगरे धनी । द्वाविंशतिप्रमाणाभिर्हे मकोटिभिरूर्जितः ॥ ८५ ॥ अमुष्य धनदाह्रस्य वणिजो रमणोऽमरः । च्युतो भूषणनामाऽभूद् वारुण्यां तनयः शुभः ॥ ८६ ॥ नैमित्तेनायमादिष्टः प्रवजिष्यत्ययं ध्रुवम् । श्रुत्वैवं धनदो लोकादभू दुद्विग्नमानसः ॥८७॥ सत्पुत्रप्रेमसक्तेन तेन वेश्म निधापितम् । योग्यं सर्वक्रियायोगे यत्र तिष्ठति भूषणः ॥८८॥ सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्वस्त्राहारविलेपनैः । विविधैर्ललितं चक्रे सुन्दरं तत्र भूषणः ॥ ८६ ॥ नैक्षिष्ट भानुमुद्यन्तं नास्तं यान्तं च नोडुपम् । स्वप्नेऽप्यसौ गतौ भूमिं गृहशैलस्य पञ्चमीम् ॥१०॥ मनोरथशतैर्लब्धः पुत्रोऽसावेक एव हि । पूर्वस्नेहानुबन्धेन दयितो जीवितादपि ॥११॥ धनदः सोदरः पूर्वं भूषणस्य पिताऽभवत् । विचित्रं खलु संसारे प्राणिनां नटचेष्टितम् ॥ ६२ ॥ तावत्क्षपातये श्रुत्वा देवदुन्दुभिनिस्वनम् । दृष्ट्वा देवागमं श्रुत्वा शब्दं चाऽभूद् विबुद्धवान् ॥ ६३॥ स्वभावान्मृदुचेतस्कः सद्धर्माचारतत्परः । महाप्रमोदसम्पन्नः करकुद्मलमस्तकः ॥ ६४ ॥ पास से लेकर उसने उन्हें जिनमन्दिर में रखवा दिया ॥ ८१ ॥ | वहाँ मुनियोंके दर्शन करते और राजदरबारसे इच्छानुकूल भोजन ग्रहण करते हुए दोनों हरिण परम धैर्यको प्राप्त हुए ॥८२॥ उन दोनों हरिणोंमें एक हरिण आयु क्षीण होनेपर समाधिमरणकर स्वर्ग गया और दूसरा निर्यवों में भ्रमण करता रहा ||३|| तदनन्तर विनोदका जीव जो हरिण था उसने कर्मयोगसे किसी तरह मनुष्य पर्याय प्राप्त की मानो स्वप्न में राज्य ही उसे मिल गया हो ॥ ८४ ॥ अथानन्तर जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र में कापिल्य नामक नगर के मध्य बाईस करोड़ दीनारका धनी एक धनद नामका वैश्य रहता था सो रमणका जीव मरकर जो देव हुआ था वह बहाँसे च्युत हो उसकी वारुणी नामक स्त्री से भूषण नामका उत्तम पुत्र हुआ ।।८५-८६ ।। किसी निमित्तज्ञानीने धनद वैश्यसे कहा कि तेरा यह पुत्र निश्चित ही दीक्षा धारण करेगा सो निमित्तज्ञानीके वचन सुन धनद संसार से उद्विग्नचित्त रहने लगा ||८७ ॥ उस उत्तम पुत्रकी प्रीति से युक्त धनद सेठने एक ऐसा घर बनवाया जो सब कार्य करने के योग्य था । उसी घर में उसका भूषण नामा पुत्र रहता था । भावार्थ-उसने सब प्रकार की सुविधाओंसे पूर्ण महल बनवाकर उसमें भूषण नामक पुत्रको इसलिए रक्खा कि कहीं बाहर जानेपर किसी मुनिको देखकर वह दीक्षा न ले ले ॥८८॥ उत्तमोत्तम स्त्रियाँ नाना प्रकार के वस्त्र आहार और विलेपन आदिके द्वारा जिसकी सेवा करती थीं ऐसा भूषण वहाँ सुन्दर चेष्टाएँ करता था ||८६|| वह सदा अपने महलरूपी पर्वतके पाँचवें खण्ड में रहता था इसलिए उसने कभी स्वप्न में भी न तो उदित हुए सूर्यको देखा था और न अस्त होता हुआ चन्द्रमा ही देखा था ||१०|| धनद सेठने सैकड़ों मनोरथोंके बाद यह एक ही पुत्र प्राप्त किया था इसलिए वह उसे पूर्व स्नेहके संस्कारवश प्राणोंसे भी अधिक प्यारा था ॥ ६१ ॥ धनद, पूर्वभव में भूषणका भाई था अब इस भवमें पिता हुआ सो ठीक ही है क्योंकि संसार में प्राणियोंकी चेष्टाएँ नटकी चेष्टाओं के समान विचित्र होती हैं ||२|| तदनन्तर किसी दिन रात्रि समाप्त होते ही भूषणने देव दुन्दुभिका शब्द सुना, देवोंका आगमन देखा और उनका शब्द सुना जिससे वह विबोधको प्राप्त हुआ ||३|| वह भूषण स्वभावसे ही कोमल चित्त था, समीचीन धर्मका आचरण करनेमें तत्पर था, महाहर्षसे युक्त था तथा उसने दोनों हाथ जोड़कर मस्तकसे लगा रक्खे थे ॥६४॥ १. सङ्गतौ म० । २. चन्द्रम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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