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________________ पञ्चाशीतितमं पर्व निःस्वत्वेनासरत्वे च सति जन्तुर्द्विपात् पशुः । रमणः सम्प्रधायैवं वेदार्थी निःसृतो गृहात् ॥७॥ क्षोणी पर्यटता तेन गुरुवेश्मसु शिक्षिताः । चत्वारः साङ्गका वेदाः प्रस्थितश्च पुनर्गृहम् ॥७॥ मागधं नगरं प्राप्तो भ्रातृदर्शनलालसः । भास्करेऽस्तङ्गते चासो व्योम्नि मेघान्धकारिते ॥७२॥ नगरस्य बहिर्यक्ष निलये वा समाश्रितः । जीर्णोद्यानस्य मध्यस्थे तत्र चेदं प्रवर्तते ॥७३॥ विनोदस्याङ्गना तस्य समिधाख्या कुशीलिका । अशोकदत्तसंकेता तं यक्षालयमागता ॥७॥ अशोकदत्तको मार्गे गृहीतो दण्डपाशिकः । विनोदोऽपि गृहीतासिर्भार्यानुपदमागतः ॥७५।। सद्भावमन्त्रणं श्रुत्वा समिधा क्रोधसंगिना । सायकेन विनोदेन रमणः प्रासुकीकृतः ।।७६॥ विनोदो दयितायुक्तो हृष्टः प्रच्छन्नपापकः । गृहं गतः पुनस्तौ च संसारं पुरुमाटतुः ॥७७॥ महिषत्वमितोऽरण्ये विनोदो रमणः पुनः । ऋक्षो बभूव निश्चक्षुर्दग्धौ शालवने च तौ ॥७॥ जातौ गिरिवने व्याधौ मृतौ च हरिणी पुनः । तयोबन्धुजनस्त्रासादिशो यातो यथायथम् ॥७॥ जीवन्तावेव तावात्तौ निषादैः कान्तलोचनौ । स्वयम्भूतिरथो राजा विमलं बन्दितु गतः ॥८॥ सुरासुरैः समं नत्वा जिनेन्द्र समहर्धिकः । प्रत्यागच्छन्ददर्शतौ स्थापितौ च जिनालये ॥८॥ मरकर राजगृह नगरमें बह्वाश नामक पुरुष और उल्का नामक स्त्रीके विनोद नामका पुत्र हुआ तथा जो मच्छ था वह भी कुछ समय बाद उसी नगरमें तथा उन्हीं दम्पतीके रमण नामका पुत्र हुआ ॥६६॥ दोनों ही अत्यन्त दरिद्र तथा मूर्ख थे इसलिए रमणने विचार किया कि अत्यन्त दरिद्रता अथवा मूर्खताके रहते हुए मनुष्य मानो दो पैर वाला पशु ही है। ऐसा विचारकर वह वेद पढ़नेकी इच्छासे घरसे निकल पड़ा ||७०|तदनन्तर पृथिवीमें घूमते हुए उसने गुरुओंके घर जाकर अङ्गों सहित चारों वेदोंका अध्ययन किया। अध्ययनके बाद वह पुनः अपने घर की ओर चला ॥७१॥ जिसे भाईके दर्शनकी लालसा लग रही थी ऐसा रमण चलता-चलता जब सूर्यास्त हो गया था और आकाशमें मेघोंमें अन्धकार छा रहा था तब राजगृह नगर आया ||७२॥ वहाँ वह नगरके बाहर एक पुराने बगीचामें जो यक्षका मन्दिर था उसमें ठहर गया। वहाँ निम्न प्रकार घटना हुई ॥७३॥ रमणका जो भाई विनोद राजगृह नगरमें रहता था उसकी स्त्रीका नाम समिधा था। यह समिधा दुराचारिणी थी सो अशोकदत्त नामक जारका संकेत पाकर उसी यक्षमन्दिर में पहुंची जहाँ कि रमण ठहरा हुआ था ॥ ७४|| अशोकदत्तको मार्गमें कोतवालने पकड़ लिया इसलिए वह संकेतके अनुसार समिधाके पास नहीं पहुँच सका। इधर समिधाका असली पति विनोद तलवार लेकर उसके पीछे-पीछे गया ॥७५|| वहाँ समिधाके साथ रमणका सद्भावपूर्ण वार्तालाप सुन विनोदने क्रोधित हो रमणको तलवारसे निष्प्राण कर दिया ||७६।। तदनन्तर प्रच्छन्न पापी विनोद हर्षित होता हुआ अपनी स्त्रीके साथ घर आया। उसके बाद वे दोनों दीर्घकाल तक संसारमें भटकते रहे ॥७७॥ तत्पश्चात् विनोदका जीव तो वनमें भैंसा हुआ और रमणका जीव उसी वनमें अन्धा रीछ हुआ सो दोनों ही उस शालवनमें जलकर मरे ॥७८।। तदनन्तर दोनों ही गिरिवनमें व्याध हुए फिर मरकर हरिण हुए। उन हरिणोंके जो माता पिता आदि बन्धुजन थे वे भयके कारण दिशाओं में इधर-उधर भाग गये। दोनों बच्चे अकेले रह गये। उनके नेत्र अन्यन्त सुन्दर थे इसलिए व्याधोंने उन्हें जीवित ही पकड़ लिया। अथानन्तर तीसरा नारायण राजा स्वयंभूति श्रीविमलनाथ स्वामीके दर्शन करनेके लिए गया ॥७६-८०॥ बहुत भारी ऋद्धिको धारण करनेवाला राजा स्वयंभू जब सुरों और असुरोंके साथ जिनेन्द्रदेवकी वन्दना करके लौट रहा था तब उसने उन दोनों हरिणोंको देखा सो व्याधोंके १. पादद्वयधारकः पशुः इत्यर्थः । २. कुशीलकः म० । ३. तौ + आत्तौ इतिच्छेदः । तावत्तौ म० । ४. विषादैः म०, निषादैः व्याधैः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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