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________________ ध्यशीतितम पर्व १३१ त्रासाकुलेक्षणा नार्यो महासम्भ्रमसङ्गताः । शिश्रियुभरतं त्राणं भानु दीधितयो तथा ॥१६॥ भरताभिमुखं यान्तं जनो वीचय गजोत्तमम् । हाहेति परमं तारं विलापं परितोऽकरोत् ॥१७॥ विह्वला मातरश्वास्य महोद्वेगसमागताः । बभूवुः परमाशङ्काः पुत्रस्नेहपरायणाः ॥११॥ तावत् परिकरं बद्ध्वा पद्माभो लक्ष्मणस्तथा । उपसर्पति सच्छममहाविज्ञानसातः ॥११॥ नभश्वरमहामात्रान् समुत्सायं भयार्दितान् । बलाद् गृहीतुमुद्यक्तो तमिभेन्द्रमलं चलम् ॥१२॥ सरोषमुक्तनिस्वानो दुःप्रेक्ष्यः प्रबलो जवी । नागपाशैरपि गजः संरोधुन सशक्यते ॥१२॥ ततोऽङ्गनाजनान्तस्थं श्रीमन्तं कमलेषणम् । भरतं वीक्ष्य नागोऽसौ व्यतीतं भवमस्मरत् ॥१२२॥ सञ्जातोद्वेगभारश्च कृत्वा प्रशिथिलं करम् । भरतस्याग्रतो नागस्तस्थौ विनयसङ्गतः ॥१२३॥ जगाद भरतश्चैनं परं मधुरया गिरा । अहोऽनेकपनाथ त्वं रोषितः केन हेतुना ॥१२४॥ निशम्य वचनं तस्य संज्ञां सम्प्राप्य वारणः । अत्यर्थशान्तचेतस्को निश्चलः सौस्यदर्शनः ॥२५॥ स्थितमग्रे वरस्त्रीणां स्निग्धं भरतमीक्षते । पुरे वाप्सरसां वृन्दे स्वर्गे गीर्वाणसत्तमम् ॥१२६॥ परिज्ञानी ततो नागश्चिन्तामेवं समाश्रितः । मुक्तात्याऽऽयतनिःश्वासो विकारपरिवर्जितः ॥१२७॥ एषोऽसौ यो महानासीत् कल्पे ब्रह्मोत्तराभिधे । देवः शशाङ्कशुभ्रश्रीर्वयस्यः परमो मम ॥२८॥ च्युतोऽऽयं पुण्यशेषेण जातः पुरुषसत्तमः । कष्टं निन्दितकर्माहं तियंग्योनिमुपागतः ॥१२॥ कार्याकार्यविवेकेन सुदरं परिवजितम् । कथं प्राप्तोऽस्मि हस्तित्वं धिगेतदिति गहितम् ॥१३०॥ ओर भरत विद्यमान था उसी ओर गया ॥११५॥ तदनन्तर जिनके नेत्र भयसे व्याकुल थे और जो बहुत भारी बेचैनीसे युक्त थीं ऐसी समस्त स्त्रियाँ रक्षाके निमित्त भरतके समीप उस प्रकार पहुँची जिस प्रकार कि किरणें सूर्यके समीप पहुँचती हैं ॥११६।। उस गजराजको भरतके सन्मुख जाता देख, लोग चारों ओर 'हाय हाय' इसप्रकार जोरसे विलाप करने लगे ॥११७॥ पुत्रस्नेहमें तत्पर माताएँ भी महा उद्वेगसे सहित, परम शंकासे युक्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठीं ॥११८।। उसी समय छल तथा महाविज्ञानसे युक्त राम और लक्ष्मण, कमर कसकर भयसे पीडित विद्याधर महावतोंको दूर हटा उस अतिशय चपल गजराजको बलपूर्वक पकड़नेके लिए उद्यत हुए ॥११६-१२०।। वह गजराज क्रोधपूर्वक उच्च चिंघाड़ कर रहा था, दुर्दशनीय था, प्रबल था, वेगशाली था और नागपाशोंके द्वारा भी नहीं रोका जा सकता था ॥१२१॥ तदनन्तर स्त्रीजनोंके अन्तमें स्थित श्रीमान् कमललोचन भरतको देखकर उस हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया ॥१२२॥ जिसे बहुत भारी उद्वेग उत्पन्न हुआ था ऐसा वह हाथी सूंडको शिथिलकर भरतके आगे विनयसे बैठ गया ।।१२३।। भरतने मधुर वाणी में उससे कहा कि अहो गजराज ! तुम किस कारण रोषको प्राप्त हुए हो ॥१२४। भरतके उक्त वचन सुन चैतन्यको प्राप्त हुआ गजराज अत्यन्त शान्तचित्त हो गया, उसकी चञ्चलता जाती रही और उसका दर्शन अत्यन्त सौम्य हो गया ॥१२५।। उत्तमोत्तम स्त्रियोंके आगे स्थित स्नेह पूर्ण भरतको वह हाथी इस प्रकार देख रहा था मानो स्वर्गमें अप्सराओंके समूहमें बैठे हुए इन्द्रको ही देख रहा हो ॥१२६॥ - तदनन्तर जो परिज्ञानी था, अत्यन्त दीर्घ उच्छ्रास छोड़ रहा था ऐसा वह विकाररहित हाथी इस प्रकारको चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥१२७॥ वह चिन्ता करने लगा कि यह वही है जो ब्रह्मोत्तर स्वर्गमें चन्द्रमाके समान शुक्ल शोभाको धारण करनेवाला मेरा परम मित्र देव था ॥१२८॥ यह वहाँ से च्युत हो अवशिष्ट पुण्यके कारण उत्तम पुरुष हुआ और खेद है कि मैं निन्दित कार्य करता हुआ इस तिर्यश्च योनिमें उत्पन्न हुआ हूँ ॥१२६॥ मैं कार्य-अकार्यके विवेकसे रहित १. मस्मरन् म० । २. वा सरसां म । ३. परिवर्तितम् म। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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