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________________ १०० पद्मपुराणे पुरे तत्रेन्द्रनगरप्रतिमे स्फीतभोगदे । नदीसरस्तटायेषु देशेष्वस्थुनभश्चराः ।।१६।। दिव्यालंकारताम्बूलवस्त्रहारविलेपनाः । चिक्रीडस्तत्र ते स्वेच्छं सस्त्रीकाः स्वर्गिणो यथा ॥१०॥ दिनरत्नकरालीढसितपद्मान्तरयुति । वैदेहीवदनं पश्यन् पद्मस्तृप्तिमियाय न ॥१०॥ विरामरहितं रामस्तयात्यन्ताभिरामया । रामया सहितो रेमे रमणीयासु भूमिषु ।।१०२॥ विशल्यासुन्दरीयुक्तस्तथा नारायणो रतिम् । जगाम चिन्तितप्राप्तसर्ववस्तुसमागमः ॥१०३॥ यातास्मः श्व इति स्वान्तं कृचापि पुनरुत्तमम् । सम्प्राप्य रतिमेतेषां गमनं स्मृतितरतम् ॥१०॥ तयोर्बहूनि वर्षाणि रतिभोगोपयुक्तयोः । गतान्येकदिनौपम्यं भजमानानि सौख्यतः ॥१०५॥ कदाचिदथ संस्मृत्य लचमणश्चारुलक्षणः। पुराणि कूबरादीनि प्रजिघाय विराधितम् ॥१६॥ साभिज्ञानानसौ लेखानुपादाय महर्द्धिकः । कन्याभ्योऽदर्शयद् गत्वा क्रमेण विधिकोविदः॥१७॥ संवादजनितानन्दाः पितृभ्यामनुमोदिताः। आजग्मुरनुरूपेण परिवारेण सङ्गताः॥१०८॥ दसाङ्गभोगनगरस्वामिनः कुलिशश्रुतेः । प्राप्ता रूपवती नाम कन्या रूपवतो परा ॥१०॥ कूबरस्थाननाथस्य वालिखिल्यस्य देहजा । सर्वकल्याणमालाख्या प्राप्ता परमसुन्दरी ॥११०॥ पृथिवीपुरनाथस्य पृथिवीधरभूभृतः । प्रथिता वनमालेति दुहिता समुपागता ॥११॥ क्षेमाअलिपुरेशस्य जितशवोर्महीक्षितः । जितपझेति विख्याता तनया समुपागमत् ॥११२॥ उजयिन्यादितोऽप्येता नगराद् राजकन्यकाः । जन्मान्तरकृतात् पुण्यात् परमापतिमीदशम् ॥११३॥ उन्नत लक्ष्मीको प्राप्त हुए राम-लक्ष्मण लङ्कामें इस प्रकार रहे जिस प्रकार कि स्वर्गकी नगरीमें दो देव रहते हैं ॥६८॥ इन्द्रके नगरके समान अत्यधिक भोगोंको देनेवाले उस नगरमें -विद्याधर लोग, नदियों और तालाबों आदिके तटोंपर आनन्दसे बैठते थे ॥६६॥ दिव्य अलंकार, पान, वसा, हार और विलेपन आदिसे सहित वे सब विद्याधर अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उस लडामें • इच्छानुसार देवोंके समान क्रीड़ा करते थे ॥२०॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सीताका मुख सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त सफेद कमलके भीतरी भागके समान कान्तियुक्त था, उसे देखते हुए श्री राम तृप्तिको प्राप्त नहीं हो रहे थे ॥१०१ उस अत्यन्त सुन्दरी स्त्रीके साथ राम, निरन्तर मनोहर भूमियों में क्रीड़ा करते थे ।।१०२।। जिन्हें इच्छा करते ही सर्व वस्तुओंका समागम प्राप्त हो रहा था ऐसे राम लक्ष्मण विशल्या सुन्दरीके साथ अलग ही प्रीतिको प्राप्त हो रहे थे ।।१०३॥ वे यद्यपि हम कल चले जावेंगे, ऐसा मनमें सङ्कल्प करते थे तथापि विभीषणादिका उत्तम प्रेम पाकर 'जाना' इनकी स्मृतिसे छूट जाता था ।।१०४॥ इस प्रकार रति और भोगोपभोगकी सामग्रीसे युक्त राम लक्ष्मणके सुखसे भोगे जाने वाले अनेक वर्ष एक दिनके समान व्यतीत हो गये ॥२०॥ अथानन्तर किसी दिन सुन्दर लक्षणोंके धारक लक्ष्मणने स्मरण कर विराधितको कूवरादि नगर भेजा ॥१०६।। सो महाविभूतिके धारक, एवं सब प्रकारकी विधि मिलानेमें निपुण विराधितने क्रम-क्रमसे जाकर कन्याओंके लिए परिचायक चिह्नोंके साथ लक्ष्मणके पत्र दिखाये ॥१०७॥ तदनन्तर शुभ-समाचारसे जिन्हें हर्ष उत्पन्न हुआ था और माता-पिताने जिन्हें अनुमति दे रक्खी थी ऐसी वे कन्याएँ अनुकूल परिवारके साथ वहाँ आई ॥१०८॥ कहाँ कहाँ से कौन-कौन कन्याएँ आई थीं इसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है। दशपर नगरके स्वामी राजा वनकर्णकी नामकी अत्यन्त सुन्दरी कन्या आई थी ॥१०६।। कूवर स्थान नगरके राजा वालिखिल्पकी सर्वकल्याणमाला नामकी सुन्दरी पुत्री आई ॥११०॥ पृथिवीपुर नगरके राजा पृथिवीधरकी प्रसिद्ध पुत्री वनमाला आई ॥१११॥ क्षेमाञ्जलिपुरके राजा जितशत्रुकी प्रसिद्ध पुत्री जितपद्मा आई ॥११२॥ इनके सिवाय उज्जयिनी आदि नगरोंसे आई हुई राजकन्याओंने जन्मान्तरमें किये हुए १. विद्या- म० । २. देशांग- म० । ३. श्रुते म । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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