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________________ भशीतितमं पर्व केचिच्छार्दूलपृष्टस्थाः केचित् केसरि पृष्ठगाः । केचिद् रथादिभिर्वीराः प्रस्थिताः खेचरेश्वराः ॥५७॥ नर्तकीनटभण्डाद्यैर्नृत्यद्भिरतिसुन्दरम् । वन्दिवृन्दैश्च ते जग्मुः स्तूयमाना महास्वनैः ॥५८॥ अकाण्डकौमुदीसर्गमण्डितैश्छन्त्रमण्डलैः । नानायुधदलैश्वासन भानुभासस्तिरोहिताः ॥५६॥ दिव्यस्त्रीवदनाम्भोजखण्डनन्दनमुत्तमम् । कुर्वन्तस्ते परिप्राप्ता विभीषणनृपालयम् ॥६॥ विभूति तदा तेषां बभूव शुभलक्षणा। सा परं धनिवासानां विद्यते जनिताद्भुता ॥६१॥ अवतीर्याथ नागेन्द्राद् रत्ना_दिपुरस्कृती। रम्यं विवशतु : सन ससीतौ रामलक्ष्मणौ ॥६२॥ मध्ये महालयस्यास्य रत्नतोरणसङ्गतम् । पद्मप्रभजिनेन्द्रस्य भवनं हेमसनिभम् ॥६३॥ प्रान्तावस्थितहालीपरिवारमनोहरम् । शेषपर्वतमध्यस्थं मन्दरौपम्यमागतम् ॥६॥ हेमस्तम्भसहस्रेण तमुत्तमभासुरम् । पूजितायामविस्तारं नानामणिगणार्चितम् ॥६५॥ बहुरूपधरैर्युक्तं चन्द्राभैबलभीपुटः । गवाक्षप्रान्तसंसक्तैर्मुक्काजालैर्विराजितम् ॥६६॥ अनेकाद्भुतसङ्कीर्णैर्युक्तः प्रतिसरादिभिः । प्रदेशैर्विविधैः कान्तं पापप्रमथनं परम् ॥६७॥ एवंविधे गृहे तस्मिन् पद्मरागमयों प्रभोः । पद्मप्रभजिनेन्द्रस्य प्रतिमा 'प्रतिमोज्झिताम् ॥६॥ भासमम्भोजखण्डानां दिशन्तीं मणिभूमिषु । स्तुत्वा च परिवन्दित्वा यथाऽहं समवस्थिताः॥६६॥ यथायथं ततो याता खेचरेन्द्रा निरूपितम् । समाश्रयं बलं चित्ते विभ्राणाश्चक्रिणां तथा ॥७॥ अथ विद्याधरस्त्रीभिः पद्मलचमणयोः पृथक । सीतायाश्च शरीरस्य क्रियायोगः प्रवर्तितः ॥७॥ पर बैठ कर जा रहे थे, कितने ही सिंहोंकी पीठ पर सवार हो कर चल रहे थे और कितने ही रथ आदि वाहनोंसे प्रस्थान कर रहे थे ॥५७। उनके आगे आगे नर्तकियाँ नट तथा भांड़ आदि सुन्दर नृत्य करते जाते थे तथा चारणोंके समूह बड़ी उच्च ध्वनिमें उनका विरद बखानते जा रहे थे ॥५८॥ असमयमें प्रकट हुई चाँदनीके समान मनोहर छत्रोंके समूहसे तथा नाना शस्त्रोंके समूहसे सूर्यको किरणे आच्छादित हो गई थी ॥५६॥ इस प्रकार सुन्दरी स्त्रियोंके मुख-कमलोंको विकसित करते हुए वे सब विभीषणके राजभवनमें पहुँचे ।।६०|| उस समय राम लक्ष्मण आदिको शुभ-लक्षणोंसे युक्त जो विभूति थी वह देवोंके लिए भी आश्चर्य उत्पन्न करने वाली थीं ॥६१।। अथानन्तर हाथीसे उतरकर, जिनका रत्नोंके अर्ध आदिसे सत्कार किया गया था ऐसे सीता सहित राम लक्ष्मणने विभीषणके सुन्दर भवनमें प्रवेश किया ।।६२॥ विभीषणके विशाल भवनके मध्यमें श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्रका वह मन्दिर था जो रत्नमयी तोरणोंसे सहित था, स्वर्णके समान देदीप्यमान था, समीपमें स्थित महलोंके समूहसे मनोहर था, शेष नामक पर्वतके मध्यमें स्थित था, प्रेमकी उपमाको प्राप्त था, स्वर्णमयी हजार खम्भोंसे युक्त था, उत्तम देदीप्यमान था, योग्य लम्बाई और विस्तारसे सहित था, नाना मणियोंके समूहसे शोभित था, चन्द्रमाके समान चमकती हुई नाना प्रकारको वलभियोंसे युक्त था, झरोखोंके समीप लटकती हुई मोतियोंकी जालीसे सुशोभित था, अनेक अद्भुत रचनाओंसे युक्त प्रतिसर आदि विविध प्रदेशोंसे सुन्दर था, और पापको नष्ट करने वाला था ॥६३-६७॥ इस प्रकारके उस मन्दिरमें श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र की पद्मराग मणि निर्मित वह अनुपम प्रतिमा विराजमान थी। जो अपनी प्रभासे मणिमय भूमिमें कमल-समूह की शोभा प्रकट कर रही थी । सबलोग उस प्रतिमाकी स्तुति-वन्दना कर यथा योग्य बैठ गथे ॥६८-६६।। तदनन्तर विद्याधर राजा, हृदयमें राम और लक्ष्मणको धारण करते हुए जहाँ जिसके लिए जो स्थान बनाया गया था वहाँ यथा योग्य रीतिसे चले गये ।।७०॥ यथानन्तर विद्याधर स्त्रियोंने राम-लक्ष्मण और सीताके स्नानकी पृथक् पृथक् विधि १. उपमारहिताम् । १३-३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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