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________________ ६ पद्मपुराणे भवत्येव हि शोकेन सङ्गो बन्धुवियोगिनः । बलादिव विशालेन स्मृतिविभ्रंशकारिणा ॥४२॥ तथाऽप्यनादिकेऽमुष्मिन्संसारे भ्रमतो मम । केन बान्धवतां प्राप्ता इति ज्ञात्वा सुगुह्यताम् ॥४३॥ यथा शक्त्या जिनेन्द्राणां भवध्वंसविधायिनाम् । विधाय शासने चित्तमात्मा स्वार्थे नियुज्यताम् ॥४॥ एवमादिभिरालापैर्मधुरैहृदयङ्गमैः । परिसान्त्व्य समाधाय बन्धून् कृत्ये गृहं गतः ॥४५॥ अग्रां देवीसहस्रस्य व्यवहारविचक्षणाम् । 'प्रजिघाय विदग्धाख्यां महिषी हलिनोऽन्तिकम् ॥४६॥ आगत्य साभिजातेन प्रणामेन कृतार्थताम् । ससीतौ भ्रातरौ वाक्यमिदं क्रमविदब्रवीत् ॥४७॥ अस्मत्स्वामिगृहं देव स्वगृहाशयलक्षितम् । कतुं पादतलासङ्गान्महानुग्रहमर्हसि ॥४८॥ वर्तते सलथा यावत्तेषां वार्तासमुद्भवा । स्वयं बिभीषणस्तावत्प्राप्तोश्यन्तमहादरः॥४६॥ उत्तष्टित ग्रहं यामः प्रसादः क्रियतामिति । तेनोक्तः सानुगः पस्तद्गृहं गन्तुमुद्यतः ॥५०॥ यानैर्नानाविधैस्तुङ्गैर्गजैरम्बुदसन्निभैः । तरङ्गञ्चचलैरश्वै रथैः प्रासादशोभिभिः ॥५॥ विधाय कृतसंस्कारं राजमार्ग निरन्तरम् । विभीषणगृहं तेन प्रस्थितास्ते यथाक्रमम् ॥५२॥ प्रलयाम्बुदनिर्घोषास्तूर्यशब्दाः समुद्रताः । शङ्खकोटिरवोन्मिश्रा गह्वरप्रतिनादिनः ॥५३॥ भम्भाभेरीमृदङ्गानां पटहानां सहस्रशः । लम्पाककाहलाधुनधुदुन्दुभीनां च निःस्वनैः ॥५४॥ झल्लाम्लातकढकानां हैकानां च निरन्तरम् । गुञ्जाहुकारसुन्दानां तथा पूरितमम्बरम् ॥५५॥ स्फीतैहलहलाशब्दैरट्टहासैश्च सन्ततैः । नानावाहननादैश्च दिगन्ता बधिरीकृताः ॥५६॥ अनुभूत और दृष्ट पदार्थ सत् पुरुषोंके मनको एक क्षण ही सन्ताप देते हैं अधिक नहीं ॥४॥ जिसका बन्धु-जनोंके साथ वियोग होता है यद्यपि उसका स्मृतिको नष्ट करनेवाले विशाल शोकके साथ समागम मानो बल पूर्वक ही होता है तथापि इस अनादि संसारमें भ्रमण करते हुए मेरे कौन-कौन लोग बन्धु नहीं हए हैं ऐसा विचार कर उस शोकको छिपाना चाहिए ॥४२-४३|| इसलिए संसारको नष्ट करनेवाले श्री जिनेन्द्रदेवके शासनमें यथाशक्ति मन लगाकर आत्माको आत्माके हितमें लगाइए ॥४४॥ इत्यादि हृदयको लगने वाले मधुर वचनोंसे सबकों काममें लगाकर विभीषण अपने घर गया ॥४५| __ घर आकर उसने एक हजार स्त्रियों में प्रधान तथा सब व्यवहारमें विचक्षण विदग्धा नामक रानीको श्री रामके समीप भेजा ॥४६॥ तदनन्तर क्रमको जानने वाली विदग्धाने आकर प्रथम ही सीता सहित राम-लक्ष्मणको कुलके योग्य प्रणाम किया। तत्पश्चात् यह वचन कहे कि हे देव ! हमारे स्वामीके घरको अपना घर समझ चरण-तलके संसर्गसे पवित्र कीजिए ॥४७-४८।। जब तक उन सबके बीचमें यह वार्ता हो रही थी तब तक महा आदरसे भरा विभीषण स्वयं आ पहुँचा ।।४ा आते ही उसने कहा कि उठिए, घर चले प्रसन्नता कीजिए। इस प्रकार विभीषणके कहने पर राम, अपने अनुगामियोंके साथ उसके घर जाने के लिए उद्यत हो गये ॥५०॥ राज मार्ग की अविरल सजावट की गई और उससे वे नाना प्रकारके वाहनों, मेघ समान ऊँचे हाथियों, लहरों के समान चञ्चल घोंड़ों और महलोंके समान सुशोभित रथों पर यथाक्रमसे सवार हो विभीषणके घरकी ओर चले ॥५१-५२।। प्रलय कालीन मेघों की गर्जनाके समान जिनका विशाल शब्द था जिनमें करोड़ों शङ्खोंका शब्द मिल रहा था तथा गुफाओंमें जिनकी प्रतिध्वनि पड़ रही थी ऐसे तुरहीके विशाल शब्द उत्पन्न हुए ॥५३।। भंभा, भेरी, मृदङ्ग, हजारों पटह, लंपाक, काहला, धुन्धु, दुन्दुभि, झांझ, अम्लातक, ढक्का, हैका, गुंजा, हुंकार और सुन्द नामक वादित्रोंके शब्दसे आकाश भर गया ॥५४-५५|| अत्यन्त विस्तारको प्राप्त हुआ हल हला शब्द, बहुत भारी अट्टहास और नाना वाहनोंके शब्दोंसे दिशाएँ बहिरी हो गई ॥५६॥ कितने ही विद्याधर व्याघ्रोंकी पीठ १. प्रतिघाय म० । २. प्रलम्बाम्बुद -ख.। ३. प्रतिवादिनः मः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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