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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व ततो हम्यतले कान्ते स्थिता परमसुन्दी। कन्यासप्तशतान्तस्था सीता शूरभटावृता ॥२०८॥ प्रान्तेषु सर्वसामन्ता वेश्मनोऽस्यावतस्थिरे । कुर्वाणा विविधां लीला महाविमववर्तिनः ॥२०९॥ ततः स्थित्वा पुरस्तस्य कन्चुकी सुबहुश्रुतः । जगाद तारशब्देन हेमवेत्रलताकरः ॥२१०॥ राजपुत्रि परीक्षस्व पद्मोऽसौ पद्मलोचनः । अयोध्याधिपतेराद्यः पुत्रो दशरथश्रुतेः ॥२११॥ लक्ष्मीमान् लक्ष्मणश्चायमनुजोऽस्य महाद्युतिः । मरतोऽयं महाबाहुः शत्रुघ्नोऽयं सुचेष्टितः ॥२१२॥ सुतैर्दशरथोऽमीभिर्गुणसागरमानसैः । वसुधां शास्ति निर्दग्धमयाङ्करसमुद्भवाम् ॥२१३॥ हरिवाहननामायं धीमानेष घनप्रभः । अयं चित्ररथः कान्तो दुर्मुखोऽयं प्रभाववान् ॥२१॥ श्रीसंजयो जयो भानुः सुप्रभो मन्दरो बुधः । विशालः श्रीधरो वीरो बन्धुर्भद्र बलः शिखी ॥२१५॥ एतेऽन्ये च महासत्वा महाशोभासमन्विताः । विशुद्धवंशसंभूताश्चन्द्रनिर्मलकान्तयः ॥२६॥ कुमाराः परमोत्साहा गुणभूषणधारिणः । महाविभवसंपन्ना भूरिविज्ञानकोविदाः ॥२१७॥ गजोऽयमस्य शैलामस्तुरङ्गोऽस्यायमुन्नतः । रथोऽस्यायं महाभोगो मटोऽस्यायं कृताद्भुतः ॥२१८॥ सांकाश्यपुरनाथोऽयमयं रन्ध्रपुराधिपः । गवीधुमदधीशोऽयमयं नन्दनिकाधिपः ॥२१९॥ विभुः सूरपुरस्यायमेष कुण्डपुराधिपः । अयं मगधराजेन्द्रः काम्पिल्यविभुरेष च ॥२२०॥ अयमिक्ष्वाकुसंभूतो नृपोऽयं हरिवंशजः । अयं कुरुकुलानन्दो मोजोऽयं वसुधापतिः ॥२२१॥ इत्यादिवर्णनायुक्ता श्रयन्तेऽमी महागुणाः । इदं त्वदर्थमतेषां समारब्धं परीक्षणम् ॥२२२॥ तदनन्तर परम सुन्दरी सीता सात सौ अन्य कन्याओंके साथ महलकी सुन्दर छतपर बैठी। शूरवीर योद्धा उसे घेरे हुए थे ।।२०८।। उस महलके चारों ओर नाना प्रकारकी लीलाको करते हुए समस्त सामन्त बड़े ठाट-बाटसे अवस्थित थे ।।२०९।। _____ तदनन्तर अनेक शास्त्रों को जाननेवाला तथा हाथमें सुवर्णकी छड़ी धारण करनेवाला कंचकी सीताके सामने खड़ा होकर उच्च स्वरसे बोला कि हे राजपुत्रि ! देखो यह कमल-लोचन, अयोध्याके अधिपति राजा दशरथका आद्य पुत्र पद्म (राम ) है ।।२१०-२११।। यह लक्ष्मीवान् तथा विशाल कान्तिको धारण करनेवाला इसका छोटा भाई लक्ष्मण है। यह बड़ी-बड़ी भुजाओंको धारण करनेवाला भरत है और यह सुन्दर चेष्टाओंको धारण करनेवाला शत्रुघ्न है ॥२१२।। जिनके हृदय गुणोंके सागर हैं ऐसे इन पूत्रोंके द्वारा राजा दशरथ पृथिवीका पालन करते हैं। इनकी पृथिवीमें भयके समस्त अंकुरोंकी उत्पत्ति भस्म कर दी गयी है ॥२१३।। यह अत्यधिक कान्तिको धारण करनेवाला बुद्धिमान् हरिवाहन है, यह सुन्दर चित्ररथ है, यह प्रभावशाली दुर्मुख है ।।२१४॥ यह श्रीसंजय है, यह जय है, यह भानु है, यह सुप्रभ है, यह मन्दर है, यह बुध है, यह विशाल है, यह श्रीधर है, यह वीर है, यह बन्धु है, यह भद्रबल है और यह शिखी अर्थात् मयूरकुमार है ।।२१५।। ये तथा इनके सिवाय और भी राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं। ये सभी महापराक्रमी, महा शोभासे युक्त, विशुद्ध कुल में उत्पन्न, चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिके धारक, परमोत्साही, गुणरूपी आभूषणोंके धारक, महा विभवसे सम्पन्न तथा अत्यधिक विज्ञानमें निपुण हैं ।।२१६-२१७॥ यह पर्वतके समान आभावाला इसका हाथी है, यह इसका ऊँचा घोड़ा है, यह इसका विस्तृत रथ है और आश्चर्यजनक कार्य करनेवाला इसका सुभट-योद्धा है ।।२१८|| यह सांकाश्यपुरका स्वामी है, यह रन्ध्रपुरका अधिपति है, यह गवीधुमद् देशका अधीश है, यह नन्दनिकाका नाथ है ।।२१९।। यह सूरपुरका विभु है । यह कुण्डपुरका अधिप है, यह मगध देशका राजा है, और यह काम्पिल्यपुरका स्वामी है ।।२२०।। यह राजा इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न हुआ है, यह हरिवंशमें उद्भूत हुआ है, यह कुरुकुलका आनन्ददायक है और यह राजा भोज है ।।२२१।। ये सभी १. महाभागो म. । २. रध्रपुराभिधः म. । ३. गत्रीकमद ज. । गवामद म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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