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________________ पद्मपुराणे एवमुक्तेऽस्त्रसंपूर्णलोचना सहसाभवत् । विदेहापहृतं बालमस्मरच प्रसङ्गतः ॥ १९५ ॥ अतीतागामिशोकाभ्यामभितः पीडितेव सा । चकार वारिनेत्राभ्यां कुररीव कृतस्वना ॥ १९६॥ परिदेवनमेवं च चक्रे विह्वलमानसा । कुर्वती परिवर्गस्य द्रवणं' चेतसामलम् ॥१९७॥ कीदृग्वामं मया नाथ देवस्यापकृतं भवेत् । पुत्रेण यत्र संतुष्टं हर्तुं कन्यां समुद्यतम् || १९८ || स्नेहालम्वनमेकैव बालिकेयं सुचेष्टिता । मम ते बान्धवानां च प्रेमभावो जनस्य च ॥ १९९॥ दुःखस्य यावदेकस्य नान्तं गच्छामि पापिनी । द्वितीयं तावदेतन्मे कृतसन्निधि वर्तते ।।२००|| शोकावर्तनिमग्नां तां करुणं रुदतीमिति । नियम्यासु प्रियोऽवोचदतः शोकसमाकुलः ॥२०५॥ अलं कान्ते रुदित्वा ते ननु कर्मार्जितं पुरा । नर्तयत्यखिलं लोकं नृत्ताचार्यो सौ परः ||२०२ || अथवा मयि विश्वस्ते हृतो दुष्टेन बालकः । अप्रमत्तस्य बालां तु हर्तुं शक्तोऽस्ति को मम || २०३॥ आप्तप्रधारणन्याय मपरित्यजता मया । पृष्टासि दयिते वस्तु जानाम्येतत् सुखावहम् ॥२०४॥ सारैरेवंविधैर्वाक्यैः कान्तेन कृतसान्त्वना" | विदेहा विरलीकृत्य शोकं कृच्छ्रादवस्थिता || २०५॥ ततो धनुर्गृहप्रान्ते विशाला रचितात्रनिः । स्वयंवरार्थमाहूताः पार्थिवाः सकलाः क्षितौ ॥ २०६॥ प्रेषितः कोशलां दूतः 'पद्माद्याः समुपागताः । मातापित्रादिसंयुक्ता जनकेनाभिपूजिताः ॥ २०७॥ कार्यके लिए बीस दिनको अवधि निश्चित की गयी है। इसके बाद यह कन्या जबरदस्ती ले जायी जावेगी । फिर इस बेचारीको हम कहाँ देख सकेंगे ? || १९४ | जनकके ऐसा कहते ही विदेहाके नेत्र सहसा आँसुओं से भर गये और इस प्रसंगसे उसे अपने अपहृत बालकका स्मरण हो आया || १९५ || वह अतीत और आगामी शोकके द्वारा दोनों ओरसे पीड़ित हो रही थी । इसलिए कुररीकी तरह शब्द करती हुई नेत्रोंसे जल बरसाने लगी || १९६ || विह्वल चित्ती धारक विदेहा परिजनोंके चित्तको अत्यन्त द्रवीभूत करती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी कि हे नाथ! मैंने दैवका कैसा उलटा अपकार किया होगा कि जिससे वह पुत्रके द्वारा सन्तुष्ट नहीं हुआ अब कन्याको हरनेके लिए उद्यत हुआ है ॥ १९७ - १९८ || उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली यही एक बालिका मेरे और आपके स्नेहका आलम्बन है तथा भाई - बान्धव एवं परिवार के लोगोंका प्रेमभाजन है || १९९ || मैं पापिनी जबतक एक दुःखका अन्त नहीं प्राप्त कर पाती हूँ तबतक दूसरा दुःख आकर उपस्थित हो जाता है ||२००|| राजा जनक स्वयं शोकसे आकुल था पर जब उसने देखा कि विदेहा शोकरूपी आवर्त में फँसकर करुण रोदन कर रही है तब उसने जिस किसी तरह अपने आँसू रोककर कहा कि हे प्रिये ! तुम्हारा रोना व्यर्थ है निश्चयसे पूर्व जन्म में अर्जित कर्म ही समस्त लोकको नचा रहा है । यही सबसे बड़ा नर्तकाचार्यं है | २०१ - २०२ ।। अथवा मेरे निश्चित असावधान रहनेपर किसी दुष्टके द्वारा बालक हरा गया था पर अब तो मैं सावधान हूँ । देखूं मेरी कन्याको हरनेके लिए कौन समर्थ है ? ||२०३ || हे प्रिये ! 'आप्तजनोंके साथ कार्यका विचार करना चाहिए' इस न्यायको न छोड़ते हुए ही मैंने तुमसे पूछा था। मैं तो जानता हूँ कि यह वस्तु सुखको धारण करनेवाली ही होगी || २०४ || पति के इस प्रकार सारपूर्ण वचनोंसे जिसे सान्त्वना दी गयी थी ऐसी विदेहा बड़े कष्टसे शोकको हलका कर चुप हो रही || २०५ || तदनन्तर जहां धनुष रखा था उसके समीप ही विशाल भूमि बनायी गयी और उसमें स्वयंवर के लिए समस्त राजा बुलाये गये || २०६ || अयोध्याको भी दूत भेजा गया जिससे राम आदि चारों भाई माता-पिता आदिके साथ आये और राजा जनकने उन सबका सन्मान किया || २०७|| ३८ १. द्रविणं म । २. देतस्य म । ३. तावदेवन्मे म । ४. नियम्याश्रुं म । ५. सान्त्वया ज. । ६. रामाद्याः । ७. मातृपित्रा - ज., क., ख., ब. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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