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________________ अष्टाविंशतितर्म पर्व 'प्राकृता कापि सा नारी कामिनीगुणरिक्तिका । इति या स्मेरसंतप्तं भवन्तं नानुकम्पते ॥१८१॥ नाथ वेदय मे स्थानं येन तामानयामि ते । भवदुःखेन मे दुःखं जनस्य सकलस्य वा ॥१८२॥ उदारे सति सौभाग्ये कथमिष्टोऽसि नो तया । मावमानसया येन ति न लभसे भृशम् ॥१८३॥ उत्तिष्ठ भज निःशेषाः किया राजजनोचिताः । शरीरे सति कामिन्यो भविष्यन्ति मनीषिताः ॥१८४॥ इत्युक्के पार्थिवोऽवोचत् कान्तां प्राणगरीयसीम् । अन्यथा खेदितस्यास्य किं मे चित्तस्य खेद्यते ॥१८५॥ शगु देवि यतोऽवस्थामीदृशीमहमागतः । अपरिज्ञातवृत्तान्ता किमर्थमिति भाषसे ॥१८६॥ तेन गायातुरङ्गेण नीतोऽहं विजयाचलम् । समयेनामुना तत्र मुक्तः पत्या खगामिनाम् ॥१८७॥ वज्रावर्तमधिज्यं चेद्धनुः पौः करिष्यति । ततः स्यात्तस्य कन्येयं तनयस्य ममान्यथा ॥१८८॥ कर्मानुभावतस्तच मया साध्वसतोऽपि वा। प्रतिपन्नमभाग्येन बन्धावस्थामुपेयुषा ॥१८॥ समुद्रावर्तसंज्ञेनं तच्चापेन समन्वितम् । आनीतं वेचरैरुर्बहिःस्थानस्य तिष्ठति ॥६९०॥ मन्ये तस्य सुरेशोऽपि न शक्तोऽधिज्यताकृतौ । वज्रज्वलन तुल्यस्य दुर्निरीक्ष्यस्य तेजसा ॥१९१।। कृतान्तमेव निक्रद्धमनाकृष्टमपि स्वनत् । अनधिज्यमपि स्वैरं भीष्मं तिष्ठत्यनारतम् ॥१९॥ "अधिज्ये न कृते तस्मिन् पद्मन' मदियं ध्रुवम् । हरिष्यते खगैः कन्या मांसपेशीव जम्बुकात् ॥ १९३॥ विंशतिर्वासराणां च वस्तुन्यत्र कृतोऽवधिः । बलानीता वराकीयं भूयोऽस्मामिः क्व वीक्षिता ॥१९॥ जान पड़ता है कि वह कोई पामरी स्त्री है अथवा स्त्रीके योग्य गुणोंसे रिक्त है जो इस तरह कामसे सन्तप्त हुए आपपर दया नहीं करती है ।।१८१।। हे नाथ! आप वह स्थान बतलाइए जिससे मैं उसे ले आऊँ क्योंकि आपके दुःखसे मुझे तथा समस्त लोगोंको दुःख हो रहा है ।।१८२।। उत्कृष्ट सौभाग्यके रहते हुए भी उस पाषाणहृदयाने आपको क्यों नहीं चाहा है जिससे कि आप अत्यन्त अधीर हो रहे हैं ।।१८३।। उठिए और राजाओंके योग्य समस्त क्रियाओंका सेवन कीजिए। यदि शरीर है तो अनेक इच्छित स्त्रियाँ हो जावेंगी॥१८४॥ विदेहाके ऐसा कहनेपर राजाने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय वल्लभासे कहा कि मेरा चित्त दूसरे ही कारणसे खिन्न हो रहा है। उसे इस तरह खेद क्यों पहुंचा रही हो ? ॥१८५॥ हे देवि ! सनो. मैं जिस कारणसे ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुआ है। तुम वृत्तान्तको जाने बिना इस प्रकार क्यों बोल रही हो ? ॥१८६।। मैं उस मायामय अश्वके द्वारा विजयाध पर्वतपर ले जाया गया था। वहाँ विद्याधरोंके राजाने मुझे इस शतंपर छोड़ा है कि यदि राम वज्रावर्त धनुषको डोरी-सहित कर देंगे तो यह कन्या उनकी होगी अन्यथा मेरे पुत्रकी होगी ।।१८७-१८८॥ कर्मके प्रभावसे समझो अथवा भयसे समझा बन्धन अवस्थाको प्राप्त हुए मुझ मन्दभाग्यने उसको वह शतं स्वीकार कर ली ॥१८९|| समुद्रावर्त नामक दूसरे धनुषके साथ उस धनुषको उग्र विद्याधर ले आये हैं और वह नगरके बाहर स्थित है ।।१९०॥ वह धनुष वज्राग्निके समान है तथा तेजके कारण उसकी ओर देखना भी कठिन है। इसलिए मैं तो समझता हूँ कि उसे डोरी-सहित करनेमें इन्द्र भी समर्थ नहीं हो सकेगा ।।१९१।। वह ऐसा जान पड़ता है मानो अत्यन्त क्रुद्ध यमराज ही हो। बिना खींचे भी वह शब्द करता है और बिना डोरीके भी वह अत्यन्त भयंकर है ।।१९२।। यदि राम उस धनुषको डोरोसहित नहीं कर सके तो मेरी इस कन्याको विद्याधर लोग अवश्य ही उसी तरह हरकर ले जावेंगे जिस तरह कि पक्षी किसी शृगालके मुखसे मांसको डलीको हर ले जाते हैं ॥१९३।। इस १. पामरी। २. स्मरसंसक्तं म.। ३. पाषाणवत्कठोरचेतसा । ४. इष्टाः । ५. विजयागिरिम् । ६. रामः । ७. स्वीकृतम्। ८. संख्येन म.। ९. दिज्वालानल- ज., ख., क.। १०. कृतान्तायैव तत्क्रुद्ध- म., ख.। ११. अधिज्येन क्षते यस्मिन् म.। १२. मत् मत्सकाशात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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