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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व २७ ततश्चन्द्रगतिः श्रुत्वा वार्तामेतां समाकुलः । आगत्य कान्तया साकं सुतमेवममाषत ॥५३॥ भज सर्वाः क्रियाः पुत्र सुचेता भोजनादिकाः । अयं वृणोमि तां कन्यां भवतो मनसि स्थिताम् ॥५४॥ परिसान्व्य सुतं कान्तां रहश्चन्द्रायणोऽवदत् । प्रमोदं च विषादं च विस्मयं च वहन्निदम् ॥५५॥ आर्ये विद्याभृतां कन्याः संत्यज्य प्रतिमोज्झिताः । भूगोचरामिसंबन्धः कथमस्मासु युज्यते ॥५६॥ क्ष्मागोचरस्य निलयं गन्तं वा युज्यते कथम् । यदा वा तेन नो दत्ता मुखच्छाया तदा तु का ॥५७॥ तस्मात् केनाप्युपायेन कन्यायाः पितरं प्रियम् । इहैव नाययाम्याशु नान्यः पन्था विराजते ॥५८॥ नाथ युक्तमयुक्तं वा त्वमेव ननु मन्यसे । तथापि तावकं वाक्यं ममापि हृदयंगमम् ॥५९॥ ततश्चपलवेगाख्यं भृत्यमाहूय सादरम् । कर्णजापेन विज्ञातवृत्तान्तमकरोन्नृपः ॥६॥ आज्ञादानेन तुष्टोऽसौ मिथिलां त्वरितो ययौ । हृष्टहंसयुवामोदसूचितामिव पद्मिनीम् ॥६॥ अवतीर्याम्बराच्चारु सप्तिवेषमुपाश्रितः । वित्रासयितुमुद्युक्तो गोमहिष्यश्ववारणान् ॥६२॥ "देशघाते यथा जातः समाक्रन्दस्तदापरः । शुश्राव च जनौघेभ्यो जनकस्त द्विचेष्टितम् ॥६३॥ निर्ययौ च पुराद्युक्तः प्रमोदोद्वेगकौतुकैः । ईक्षांचक्रे च तं सप्तिं नवयौवनसंगतम् ॥६४॥ 'उद्दामानं मनोवेगं मास्वत्प्रवरलक्षणम् । प्रदक्षिणमहावतं तनुवक्त्रोदरं चलम् ॥६५॥ उसके पहले ही इसे धैर्य उत्पन्न करानेके लिए कोई उपाय सोचा जाये ॥५२॥ तदनन्तर चन्द्रगति विद्याधर इस समाचारको सुनकर घबड़ाया हुआ स्त्रीके साथ आकर पुत्रसे इस प्रकार बोला कि हे पुत्र! स्वस्थचित्त होकर भोजनादि समस्त क्रियाएं करो। मैं तुम्हारे मनमें स्थित उस कन्याको वरता हूँ अर्थात् तेरे लिए स्वीकार करता हूँ ॥५३-५४।। इस प्रकार पुत्रको सान्त्वना देकर चन्द्रगति विद्याधर हर्ष, विषाद और विस्मयको धारण करता हुआ एकान्तमें अपनी स्त्रीसे बोला कि ॥५५॥ हे आर्य ! विद्याधरोंकी अनुपम कन्याएं छोड़कर हम लोगोंका भूमिगोचरियोंसे साथ सम्बन्ध करना कैसे ठीक हो सकता है ? ||५६|| इसके सिवाय एक बात यह है कि भूमिगोचरीके घर जाना कैसे ठीक हो सकता है ? याचना करनेपर भी यदि उसने कन्या नहीं दी तो उस समय मुखकी क्या कान्ति होगी? ॥५७|| इसलिए कन्याके प्रिय पिताको किसी उपायसे शीघ्र ही यहीं बुलाता हूँ। इस विषयमें कोई दूसरा मार्ग शोभा नहीं देता ॥५८॥ स्त्रीने उत्तर दिया कि हे नाथ ! उचित और अनुचित तो आप ही जानते हैं पर इतना अवश्य कहती हूँ कि आपकी बात मुझे भी अच्छी लगती है ||५९|| तदनन्तर राजाने चपलवेग नामक भत्यको आदरपूर्वक बलाकर उसके कान में सब वृत्तान्त सूचित कर दिया ॥६०।। तत्पश्चात् स्वामीकी आज्ञासे सन्तुष्ट हुआ चपलवेग शीघ्र ही उस प्रकार मिथिलाकी ओर चला जिस प्रकार कि हर्षसे भरा तरुण हंस सुगन्धिसे सूचित कमलिनीकी ओर चलता है ॥६१।। उसने आकाशसे उतरकर सुन्दर घोड़ेका रूप बनाया और वह गाय, भैंसा, अश्व तथा हाथी आदि पशुओंको भयभीत करनेके लिए उद्यत हुआ ॥६२॥ वह जिस देशके घात करने में प्रवृत्त होता था उसी ओरसे रोनेका प्रबल शब्द उठ खड़ा होता था। राजा जनकने भी जनसमूहसे उस घोड़ेकी चेष्टाएँ सुनीं ॥६३।। सुनी ही नहीं, वह हर्ष, उद्वेग और कौतुकसे युक्त हो उस घोड़ेकी चेष्टाएँ देखनेके लिए नगरसे बाहर भी आया और उसने नवयौवनसे युक्त उस घोड़ेको देखा ॥६४॥ वह घोड़ा अत्यन्त ऊंचा था, मनको अपनी ओर खींचनेवाला था, उसके शरीरमें अच्छे-अच्छे लक्षण देदीप्यमान हो रहे थे, दक्षिण अंगमें महान् आवर्त थी, उसका मुख तथा उदर कृश था, वह अत्यन्त बलवान् था, टापोंके अग्रभागसे वह पृथिवीको ताड़ित कर रहा था। १. परिशान्त्य म. । २. चन्द्रगतिः । ३. नययाम्याशु म. । ४. मन्यते म.। ५. हयवेषम् । ६. महिषाश्व क.ख.। ७. देशघातो ख.। ८. उदमानं म. । उद्दमानं ज.। ९. मनोयोगं म.। १०. बलम म., ज.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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