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________________ पद्मपुराणे सुशफार्मृदङ्गानां कुर्वाणमिव ताडनम् । पृथग्जनैर्दुरारोहं दधतं 'प्रोथवेपथुम् ॥६६॥ ततः शुद्धप्रमोदः सन् जगाद जनको मुहुः । ज्ञायतामेष कस्याश्वः प्राप्तो निर्दामतामिति ॥६७॥ ततो द्विजगणा उचुः प्रियोद्योद्यतचेतसः । राजन्नस्य न नाकेऽपि तुरङ्गो विद्यते समः ॥६॥ कैव वार्ता पृथिव्यां ने राज्ञामीदृग् मवेदिति । अथवा किं न कालेन नृप दृष्टस्त्वयेयता ॥६९॥ रथे दिवाकरस्यापि श्रुतिविभ्रमगोचरः । विद्यते नेति जानीमः स्थूरीपृष्ठोऽमुना समः ॥७॥ नूनं भवन्तमुद्दिश्य कृतवन्तं परं तपः : सृष्टोऽयं विधिना सप्तिरतः स्वीक्रियतां प्रमो ॥७१॥ ततोऽसौ विनयी निन्ये प्रग्रहद्वयसंयुतः । मन्दुरां कुङ्कमार्दाङ्गः प्रवलच्चारुचामरः ॥७२॥ 'संवृत्तो मासमात्रोऽस्य ययौ कालो गृहीतितः । उपचारैरलंयोग्यैः सेव्यमानस्य संततम् ॥७३॥ पाशकोऽत्रान्तरे नत्वा जनकाय न्यवेदयत् । नाथ नागस्य "सद्देशे ग्रहणं दृश्यतामिति ॥७॥ ततोऽसौ मुदितस्तुङ्गमारुह्य वरवारणम् । उद्दिष्टपादविस्तेन विवेश सुमहद्वनम् ॥७५॥ दूरे च सरसो दुर्गे स्थितं दृष्ट्वा वरं द्विपम् । जगादानय तरिक्षप्रं कंचिदश्वं महाजवम् ॥७६॥ ढौकितश्च स मायाश्वः सद्यः स्फुरितविग्रहः । आरुरोह स तं यातश्चोत्पत्य तुरगो नभः ॥७७।। हाहाकारं नृपाः कृत्वा वहन्तः शोकमुद्धतम् । निवृत्ताः सहसा भीता विस्मयव्याप्तमानसाः ॥७८॥ उससे ऐसा जान पड़ता था मानो मृदंग ही बजा रहा हो। साधारण व्यक्ति उसपर चढ़ने में असमर्थ थे तथा उसका नथना कम्पित हो रहा था ॥६५-६६॥ तदनन्तर विशुद्ध हर्षको धारण करनेवाले राजा जनकने बार-बार उपस्थित लोगोंसे कहा कि मालूम किया जाये कि यह किसका घोड़ा बन्धनमुक्त हो गया है ? ॥६७॥ तत्पश्चात् प्रिय वचन कहने में जिनका चित्त उत्कण्ठित हो रहा था ऐसे ब्राह्मणोंने कहा कि हे राजन् ! इस घोड़ेके समान कोई दूसरा घोड़ा नहीं है ॥६८॥ यहाँ को बात जाने दीजिए समस्त पृथिवीमें जितने राजा हैं उनमें किसीके ऐसा घोड़ा नहीं होगा। अथवा हे राजन् ! आपने भी इतने समय तक क्या कभी ऐसा घोड़ा देखा ? ॥६९॥ हम तो समझते हैं कि सूर्यके रथमें भी इस घोड़ेकी समानता करनेवाला घोड़ा नहीं होगा ॥७०।। ऐसा जान पड़ता है कि परम तपस्या करनेवाले आपको लक्ष्य कर ही विधाताने यह घोड़ा बनाया है सो है प्रभो ! इसे आप स्वीकार करो ॥७१|| तदनन्तर उस विनयवान् घोड़ेको दुहरी रस्सीसे बांधकर घुड़शालमें ले जाया गया। उस समय उसका शरीर केशरके विलेपनसे गीला हो रहा था और उसपर सुन्दर चमर हिल रहे थे ।।७२।। घुड़शालमें निरन्तर योग्य उपचारोंसे इसकी सेवा होती थी। इस तरह जिस दिनसे घोड़ा पकड़कर लाया गया था उस दिनसे एक मासका समय व्यतीत हो गया ||७३|| इस बीचमें वनके एक कर्मचारीने नमस्कार कर राजा जनकसे निवेदन किया कि हे नाथ ! अपने देशमें हाथी कैसे पकड़ा जाता है यह देखिए ? |७४।। तदनन्तर प्रसन्नतासे भरे राजा जनक उत्तुंग गजराजपर सवार होकर चले । वनका कर्मचारी उन्हें मार्ग बताता जाता था। इस तरह राजा जनक किसी बड़े वनमें प्रविष्ट हुए ॥७५॥ वहां उन्होंने सरोवरके दूसरी ओर दुर्गम स्थानमें खड़े हुए उत्तम हाथीको देखकर सारथीसे कहा कि शीघ्र ही किसी वेगशाली घोड़ेको लाओ ॥७६॥ कहनेकी देर थी कि जिसका शरीर फड़क रहा था ऐसा वह मायामय घोड़ा लाकर राजा जनकके समीप खड़ा कर दिया गया। राजा जनक उसपर सवार हुए नहीं कि वह घोड़ा उन्हें लेकर आकाशमें उड़ गया ॥७७॥ यह देख जो सहसा भयभीत हो गये थे तथा जिनमें चित्त आश्चर्यसे व्याप्त १. प्रोथ म.। २. शुद्धः प्रमोदः ज., म.। ३. प्रियभाषणपरमानसाः। ४. न ना कोऽपि म. । ५. तू म.। ६. अश्वः स्थूलीपृष्ठोऽ ज.। ७. विनयैनिन्ये ब.। ८. मन्दुराकुङ्कमााङ्गप्रचलच्चारुचामरः म.। ९. संवृतो म.। १०. गृहीततः ब.। ११. सदेशे म., क. । संदेशे ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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