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________________ पद्मपुराणे स्यन्दनोद्वाहिनागांहिचूर्णितः स रणाजिरे । अमुञ्चत दुतं प्राणान् हुङ्कारेणापि वर्जितः ||३१|| ततोऽस्यामिमुखं तस्थौ स्वपक्षवधकोपितः । जम्बूमालीति विख्यातो रावणस्य सुतो बली ॥३२॥ असावुत्थितमात्रश्च ध्वजं वानरलान्छनम् । चिच्छेद वायुपुत्रस्य चन्द्रार्द्धसदृशेषुणा ||३३|| केतुकल्पनहष्टेन तस्य मारुतिना धनुः । कवचं च ततो नीतं पुराणनृणशीर्णताम् ||३४|| "ततस्तनूदरीसूनुर्वध्वान्यं कवचं दृढम् । अताडयन्मरुत्सूनुं तीक्ष्णैर्वक्षसि सायकैः ||३५|| बालनीलोत्पलम्लाननालस्पर्शसमुद्भवैः । असेवत स तैः सौख्यं धरणीधरधीरधीः ||३६|| अथास्य वायुपुत्रेण रथयुक्तं महोद्धृतम् । मुक्तं सिंहशतं षष्ठीचन्द्र वक्रेण पत्रिणा ||३७|| दंष्ट्राकरालवदनैः स्फुरल्लोहितलोचनैः । तैरुत्पस्य निजं सैन्यं सकलं विह्वलीकृतम् ||३८|| महाकल्लोलसंकाशास्तस्य सैन्यार्णवस्य ते । क्रूरनक्रसमाना वा जाताः प्रबलमूर्तयः ||३९|| चण्डसौदामिनीदण्डमण्डलाकारहारिणः । सैन्यमेघसमूहं ते परमं क्षोभमानयन् ॥४०॥ रणसंसारचक्रेऽसौ सैन्यलोकः समन्ततः । सिंहकर्मभिरत्यर्थ महादुःखवशीकृतः ॥४१॥ वाजिनो वारणा मत्ता रथारोहाश्च विह्वलाः । रणव्यापारनिर्मुक्तार्नेशुर्दश दिशस्ततः ||१२|| ततो नष्टेषु सर्वेषु सामन्तेषु यथायथम् । अपश्यद्वावणं वातिदूरेऽवस्थितमग्रतः ||४३|| - आरुह्य च रथं सिंहैर्युक्तं परमभासुरैः । अधावद्वाणमुत्य विंशत्यर्द्धमुखं प्रति ॥ ४४ ॥ ३७६ अभ्युदयके धारक हनुमान् ने उसे पुनः रथरहित कर दिया और उसके ऊपर वायुके समान वेगशाली अपना रथ चढ़ा दिया ||३०|| जिससे रथको खींचनेवाले हाथियोंके पैरोंसे चूर-चूर होकर उसने रणांगण में शीघ्र ही प्राण छोड़ दिये । अब हुँकार से भी रहित हो गया ||३१|| तदनन्तर रावणका जम्बूमाली नामका प्रसिद्ध बलवान् पुत्र, अपने पक्ष के लोगों की मृत्युसे कुपित हो हनुमान के सामने खड़ा हुआ ||३२|| इसने खड़े होते ही, अर्धचन्द्र सदृश बाणके द्वारा हनुमान् की वानरचिह्नित ध्वजा छेद डाली ||३३|| तदनन्तर ध्वजाके छेदसे हर्षित हुए हनुमान्ने उसके धनुष और कवचको जीर्ण तृणके समान जर्जरताको प्राप्त करा दी अर्थात् उसका धनुष और कवच दोनों ही तोड़ दिये ||३४|| तदनन्तर मन्दोदरीके पुत्र जम्बूमालीने तत्काल ही दूसरा मजबूत कवच धारण कर तीक्ष्ण बाणों द्वारा हनुमान् के वक्षःस्थलपर प्रहार किया ||३५|| सो पहाड़ के समान अत्यन्त धीर बुद्धिको धारण करनेवाले हनुमान्ने उन बाणोंसे ऐसे सुखका अनुभव किया मानो बाल नीलकमलके मुरझाये हुए नालोंके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुखका ही अनुभव कर रहा हो ||३६|| तदनन्तर हनुमान्ने षष्ठी चन्द्रमाके समान कुटिल बाणके द्वारा जम्बूमालीके रथमें जुते हुए महा उद्धत सौ सिंह छोड़ दिये अर्थात् एक ऐसा बाण चलाया कि उससे जम्बूमालीके में जुते सो सिंह छूट गये ||३७|| जिनके मुख दाढ़ोंसे भयंकर थे तथा लाल-लाल आँखें चमक रही थीं ऐसे उन सिहोंने उछलकर अपनी समस्त सेनाको विह्वल कर दिया ||३८|| उस सेनारूपी सागर के मध्य में वे सिंह बड़ी-बड़ी तरंगों के समान जान पड़ते थे अथवा अतिशय बलवान् क्रूर मगरमच्छों के समान दिखाई देते थे || ३९ || चमकते हुए विद्युद्दण्डके समूहका आकार धारण करनेवाले उन सिंहोंने सेनारूपी मेघोंके समूहको अत्यन्त क्षोभ प्राप्त कराया था ||४०|| युद्धरूपी संसारचक्र के बीच में सैनिकरूपी प्राणी, सिंहरूपी कर्मोंके द्वारा सब ओरसे अत्यन्त दुःखी किये गये थे ॥४१॥ घोड़े, मदोन्मत्त हाथी और रथोंके सवार - सभी लोग विह्वल हो युद्ध सम्बन्धी कार्य छोड़ दशों दिशाओं में भागने लगे ॥४२॥ तदनन्तर यथायोग्य रीति से सब सामन्तोंके भाग जानेपर हनुमान्ने कुछ दूर सामने स्थित रावणको देखा || ४३ ॥ तदनन्तर वह अत्यन्त देदीप्यमान सिंहोंसे युक्त रथपर सवार हो बाण खींचकर रावणकी १. मन्दोदरीपुत्रः । २. तीक्ष्णं म । ३. शतैः म । ४ इत्यर्थमहादुःख - म. 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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