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________________ षष्टितम पर्व ३७५ जन्मान्तरार्जितक्रोधकर्मबन्धोदयेन ते । यो परममासक्ता निजजीवितनिस्पृहाः ॥१५॥ क्षपितारिः समाहृतः संक्रोधेन महारुषा । मृगारिदमनो बलिना संहतो बाहुशालिना ॥१६॥ विधिर्वितापिनाऽन्योन्यमेव जाते महाहवे । भटेष्वज्ञातसंज्ञेषु निपतत्सूपलेष्विव ॥१७॥ शालस्ताडितः पूर्व वज्रोदरमताडयत् । सक्रोधं सुचिरं युद्धं क्षपितारिरमारयत् ॥१८॥ विशालद्युतिनामा च शम्भुना विनिपातितः । मृत्यु स्वयंभुवा नीतो विजयो यष्टिताडितः ॥१९॥ वितापिविधिना ध्वस्तो गदाघातेन कृच्छ्रतः । सामन्तैरिति हन्यन्ते सामन्ताः शतशस्तदा ॥२०॥ अवसीदत्ततो दृष्ट्वा स्वं किष्किन्धपतिर्बलम् । परमक्रोधसंभारो यावत्संनद्धमुद्यतः ॥२१॥ अञ्जनातनयस्तावत्तत्स्वसैन्येन युग्महीम् । वारणोढं रथं हेममारूढो योदधुमुद्ययौ ॥२२॥ रक्षःसामन्तसंघातो दृष्दैव पवनात्मजम् । गवामिव गणो भ्रान्तस्त्रस्तः केशरिदर्शनात् ॥२३।। ऊचुश्च राक्षसाः सोऽयं हनूमान् वानरध्वजः । अद्यैव विधवा योषाः परं बह्वीः करिष्यति ॥२४॥ माली तस्याग्रतो भूतो युद्धार्थी राक्षसोत्तमः । समुत्य शरं तस्य पुरो वातिरजायत ॥२५।। तयोरभून्महयुद्धं शरैराकर्णसंहितः । उपात्तसाधुनिस्वानं क्रमेण परमोद्धतम् ॥२६॥ सचिवाः सचिवैः साकं रथिनो रथिभिस्तथा । सादिनो सादिभिः सत्रा लग्ना युक्तरणोद्यताः ॥२७॥ मालिनं नष्टमालोक्य शक्त्या पवनजन्मनः । वज्रोदरोऽभवत्तस्य पुरः परमविक्रमः ॥२८।। चिरंकृतरणोऽथायं वातिना विरथीकृतः । रथमन्यं समारुह्य मारुतिं समधावत ।।२१।। कृत्वा तं विरथं भूयो मारुतिः परमोदयः । उपर्यवाहयत्तस्य रथं मारुतरंहसम् ॥३०॥ यद्ध करने के लिए उद्यत हए ॥१३-१४॥ जन्मान्तरोंमें संचित क्रोध कर्मके तीव्र उदयसे वे अपने जीवनसे निःस्पह हो भयंकर यद्ध करने में जट पडे ॥१५॥ महाक्रोधसे भरे संक्रोधने क्षपितारिको ललकारा, भुजाओंसे सुशोभित बलीने सिंहदमनको बुलाया और वितापिने विधिको पुकारा। इस प्रकार परस्पर महायुद्ध होनेपर जिनके नामोंका पता नहीं था ऐसे अनेक योद्धा मर-मरकर ऐसे गिरने लगे मानो पत्थर हो बरस रहे हों ।।१६-१७|| जिसपर पहले प्रहार किया गया था ऐसे शार्दलने वज्रोदरको मारा। दीर्घकाल तक यद्ध करनेवाले संक्रोधको क्षपितारिने मार डाला ॥१८॥ शम्भुने विशालद्युतिको मार गिराया, स्वयम्भूने यष्टिकी चोटसे विजयको मृत्यु प्राप्त करा दी और विधिने गदाके प्रहारसे वितापिको बड़ी कठिनाईसे मारा था। इस प्रकार उस समय सामन्तोंके द्वारा सैकड़ों सामन्त मारे गये थे ॥१९-२०।। तदनन्तर अपनी सेनाको नष्ट होती देख परमक्रोधसे भरा सुग्रीव जबतक कवच धारण करनेके लिए उद्यत हुआ तबतक अपनी सेनासे पृथिवीको व्याप्त करनेवाला हनुमान् हाथियोंसे जुते स्वर्णमय रथपर सवार हो युद्ध करनेके लिए उठ खड़ा हुआ ॥२१-२२।। जिस प्रकार सिंहको देखकर गायोंका समूह भयभीत हो इधर-उधर भागने लगता है, उसी प्रकार हनुमान्को देख राक्षस-सामन्तोंका समूह भयभीत हो इधर-उधर भागने लगा ॥२३।। राक्षस परस्पर कहने लगे कि यह हनुमान् आज ही अनेक स्त्रियोंको विधवाएँ कर देगा ॥२४॥ तदनन्तर युद्धका अभिलाषी राक्षसोंका शिरोमणि, माली हनुमान्के आगे आया सो हनुमान् भी बाण निकालकर उसके सामने जा पहुँचा ।।२५।। कानों तक खींच-खींचकर चढ़ाये हुए बाणोंसे उन दोनोंका ऐसा महायुद्ध हुआ कि जिसमें क्रम-क्रमसे ठीक-ठीक शब्दका उच्चारण हो रहा था, तथा जो परम उद्धततासे युक्त था ।।२६।। योग्य युद्ध करने में तत्पर सचिव सचिवोंके साथ, रथी रथियोंके साथ और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझ पड़े ।।२७|| हनुमान्की शक्तिसे मालीको नष्ट हुआ देख परम पराक्रमी वज्रोदर उसके सामने आया ।।२८।। चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद हनुमान् ने जब उसे रथरहित कर दिया तब वह दूसरे रथपर सवार हो हनुमान्की ओर दौड़ा ॥२९॥ परम १. संनद्ध ज.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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