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________________ ३४० पद्मपुराणे अपराधानिमान् श्रुत्वा रावणः कोपमागतः । अबन्धयत्तमाय विनागं लोहशृङ्कलैः ॥२२९॥ उपविष्टोऽकसंकाशो दशास्यः सिंहविष्टरे । पूजायोग्यं पुरा वातिमाकोशदिति निदयम् ।।२३०॥ उवृत्तोऽयमसौ पापः निरपेक्षत्रपोज्झितः। अधुनैतस्य का छाया धिगेतेनेक्षितेन किम् ।।२३१।। व्यापाद्यतेन किं दुष्टः कर्ता नानागसामयम् । कथं न गणितं पूर्व मम दाक्षिण्यमुन्नतम् ॥२३२॥ ततस्तन्मण्डलप्रान्तस्थिताः प्रवरविभ्रमाः । महाभाग्या विलासिन्यो नवयौवनपूजिताः ॥२३३।। कोपस्मितसमायुक्ता निमीलितविलोचनाः । विधाय शिरसः कम्पमेवमुचुरनादरात् ॥२३४॥ प्रसादाद्यस्य यातोऽसि प्रभुतां क्षितिमण्डले । पृथिव्यां विचरन् स्वेच्छं समस्त बलवर्जितः ॥२३५॥ एतत्तत्स्वामिनः प्रीतेर्भवता दर्शितं फलम् । भूमिगोचरदूतत्वं यत्प्राप्तोऽस्यतिनिन्दितम् ।।२३६।। सुकृतं दशवक्त्रस्य कथमाधाय पृष्ठतः । वसुधाहिण्डनक्लिष्टौ भवता तो पुरस्कृतौ ॥२३७॥ पवनस्य सुतो न त्वं जातोऽस्यन्येन केनचित् । अदृष्टमकुलीनस्य निवेदयति चेष्टितम् ॥२३८॥ चिह्वानि विटजातस्य सन्ति नाङ्गेषु कानिचित् । अनार्यमाचरन् किंचिजायते नीचगोचरः ।।२३९।। मत्ताः केसरिणोऽरण्ये शृगालानाश्रयन्ति किम् । नहि नीचं समाश्रित्य जीवन्ति कुलजा नराः॥२४॥ सर्वस्वेनापि यः पूज्यो यद्यप्यसकृदागतः। सुचिरादागतो द्रोही त्वं निग्राह्यस्तु वर्तसे ॥२४॥ इमैर्निगदितैः क्रोधात् प्रहस्योवाच मारुतिः । को जानाति विना पुण्यनिग्राह्यः को विधेरिति ॥२४२॥ श्मशानके वृक्षोंके समान जान पड़ने लगी हैं ॥२२८।। हनुमान्के इन अपराधोंको सुनकर रावण क्रोधको प्राप्त हुआ तथा विशिष्ट प्रकारके नागपाशसे वेष्टित हुए उसे समीपमें बुलाकर लोहेकी साँकलोंसे बंधवा दिया ॥२२९।।। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा, सूर्यके समान देदीप्यमान रावण, पहले जिसकी पूजा करता था ऐसे हनुमान्के प्रति निर्दयताके साथ इस प्रकार कठोर वचन बकने लगा ॥२३०।। कि यह दुराचारी है, पापी है, निरपेक्ष है, निर्लज्ज है, अब इसकी क्या शोभा है ? इसे धिक्कार है, इसके देखनेसे क्या लाभ है ? ॥२३१।। नाना अपराधोंको करनेवाला यह दुष्ट क्यों नहीं मारा जाय ? अरे ! मैंने पहले इसके साथ जो अत्यन्त उदारताका व्यवहार किया इसने उसे कुछ भी नहीं गिना ॥२३२।। तदनन्तर रावणके समीप ही उत्तम चेष्टाओंसे युक्त महाभाग्यशाली एवं नवयौवनसे सुशोभित जो विलासिनी स्त्रियाँ खड़ी थीं वे क्रोध तथा मन्द हास्यसे युक्त हो नेत्र बन्द करती तथा शिर हिलाती हुई अनादरसे इस प्रकार कहने लगी कि हे हनुमान् ! तू जिसके प्रसादसे पृथिवीमण्डलपर प्रभुताको प्राप्त हुआ है तथा समस्त प्रकारके बलसे रहित होकर भी पृथिवीपर इच्छानुसार सर्वत्र भ्रमण करता है ॥२३३-२३५।। उस स्वामीकी प्रसन्नताका तूने यह फल दिखाया है कि भूमिगोचरियोंकी दनीय दतताको प्राप्त हुआ है ॥२३६॥ रावणके द्वारा किये हए उपकारको पीछे कर तुमने पृथिवीपर परिभ्रमण करनेसे खेदको प्राप्त हुए राम-लक्ष्मणको कैसे आगे किया ॥२३७।। जान पड़ता है कि तू पवनंजयका पुत्र नहीं है, किसी अन्यके द्वारा उत्पन्न हुआ है, क्योंकि अकुलोन मनुष्यकी चेष्टा ही उसके अदृष्ट कार्यको सूचित कर देती है ।।२३८|| जारसे उत्पन्न हुए मनुष्यके शरीरपर कोई चिह्न नहीं होते, किन्तु जब वह खोटा आचरण करता है तभी नीच जान पड़ता है ॥२३९।। वनमें क्या मदोन्मत्त सिंह सियारोंकी सेवा करते हैं ? ठीक ही कहा है कि कुलीन मनुष्य नीचका आश्रय लेकर जीवित नहीं रहते ॥२४०|| तू यद्यपि पहले अनेक बार आया फिर भी सर्वस्वके द्वारा पूज्य रहा परन्तु अबकी बार बहुत काल बाद आया और राजद्रोही बनकर आया अतः निग्रह करनेके योग्य है ।।२४१।। इन वचनोंसे हनुमान्को क्रोध आ गया जिससे वह हँस कर बोला कि कौन जानता है पुण्यके बिना विधाताका निग्राह्य-दण्ड देने योग्य कौन है ।।२४२।। १. व्यापादितेन म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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