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________________ ३४१ त्रिपञ्चाशत्तम पर्व स्वयं दुर्मतिना सार्द्धमनेनासन्नमृत्युना । इतो दिनैः कतिपयैक्ष्यामः क्व प्रयास्यथ ।।२४३॥ सौमित्रिः सह पद्मेन बलोत्तङ्गः समापतन् । न मेघ इव संरोधं नगैः शक्यो भवेन्नृपः ॥२४४॥ अतप्तः परमाहारैः कामिकैरमृतोपमैः । याति कश्चिद्यथा नाशमेकेन विषबिन्दना ॥२४५॥ अतृप्तः स्त्रीसहस्रोघेरिन्धनैरिव पावकः । परस्त्रीतृष्णया सोऽयं विनाशं क्षिप्रमेष्यति ॥२४६॥ या येन भाविता बुद्धिः शुभाशुमगता दृढम् ! न सा शक्याऽन्यथाकत्तु पुरन्दरसमरपि ॥२४७॥ निरर्थकं प्रियशतैर्दुमतौ दीयते मतिः । नूनं विहितमस्यैतद्विहितेन हतो हतः ॥२४॥ प्राप्त विनाशकालेऽपि बुद्धिर्जन्तोविनश्यति । विधिना प्रेरितस्तेन कमपाक विचेष्टते ॥२४९॥ मर्त्यधर्मा यथा कश्चित्सुगन्धि मधुरं पयः । प्रमादी विषसन्मिभं पीत्वा ध्वंसं प्रपद्यते ॥२५॥ तथाविधो दशास्य त्वं परस्त्रीसुखलोलुपः । वचनेन विना क्षिप्रं विनाशं प्रतिपत्स्यते ॥२५॥ गुरून् परिजन वृद्धान् मित्राणि प्रियबान्धवान् । मात्रादीनपकण्यं त्वं प्रवृत्तः पापवस्तुनि ॥२५२।। कदाचारसमुद्रे त्वं मदनावर्तमध्यगः । प्राप्तो नरकपातालं कष्टं दुःखमवाप्स्यसि ॥२५३॥ त्वया दशास्य जातेन महारत्नश्रवो नृपात् । अन्वयोऽधमपुत्रेण रक्षसां क्षयमाहृतः ॥२५४॥ अनुपालितमर्यादाः क्षितौ पूजितचेष्टिताः । पुङ्गवा मवतो वंश्यास्त्वं तु तेषां पुलाकवत् ॥२५५॥ इत्युक्तः क्रोधसंरक्तः खड्गमालोक्य रावणः । जगाद दुर्विनीतोऽयं सुदुर्वचननिर्भरः ॥२५६॥ स्यक्तमृत्युभयो बिभ्रत्प्रगल्भत्वं ममाग्रतः । द्राक खलीक्रियतां मध्ये नगरस्य दुरीहितः ॥२५७॥ जिसकी मृत्यु निकट है ऐसे इस दुर्बुद्धि के साथ स्वयं ही यहाँ कुछ दिनोंमें देखेंगे कहाँ जाओगे ॥२४३।। प्रचण्ड बलका धारी लक्ष्मण रामके साथ आ रहा है सो जिस प्रकार पर्वत मेघको नहीं रोक सकते उसी प्रकार राजा उसे नहीं रोक सकते ।।२४४॥ जिस प्रकार इच्छानुसार प्राप्त हुए अमृत तुल्य उत्तम आहारोंसे तृप्त नहीं होनेवाला कोई मनुष्य विषकी एक बूंदसे नाशको प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार जो इंधनोंसे अग्निके समान हजारों स्त्रियोंके समूहसे तृप्त नहीं हुआ ऐसा यह दशानन परस्त्रीकी तृष्णासे शीघ्र ही नाशको प्राप्त होगा ॥२४५-२४६।। जिसने जो शुभ-अशुभ बुद्धि प्राप्त की है उसे इन्द्रके समान पुरुष भी अन्यथा करने के लिए समर्थ नहीं है ।।२४७।। दुर्बुद्धि मनुष्यके लिए सैकड़ों प्रियवचनोंके द्वारा हितका उपदेश व्यर्थ ही दिया जाता है। जान पड़ता है कि इसकी यह होनहार निश्चित ही है अतः वह अपनी होनहारसे ही नष्ट होता है ॥२४८।। विनाशका अवसर प्राप्त होनेपर जीवकी बद्धि नष्ट हो जाती है। सो ठीक है. क्योंकि भवितव्यताके द्वारा प्रेरित हआ यह जीव कर्मोदयके अनुसार चेष्टा करता है ॥२४९।। जिस प्रकार कोई प्रमादी मनुष्य विषमिश्रित सुगन्धित मधुर दुग्ध पीकर विनाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार हे रावण ! तू परस्त्री सुखका लोभी हुआ बिना कुछ कहे ही शीघ्र ही विनाशको प्राप्त होगा ॥२५०-२५१।। गुरु, परिजन, वृद्ध, मित्र, प्रियबन्धु तथा माता आदिको अनसुना कर तू पापकर्ममें प्रवृत्त हुआ है ।।२५२॥ तू दुराचाररूप समुद्रमें कामरूपी भ्रमरके बीच फंसकर नीचे नरकमें जावेगा और वहाँ अतिशय दःख प्राप्त करेगा ॥२५३।। हे दशानन ! महाराजा रत्नश्रवासे उत्पन्न हुए तुझ अधम पुत्रने राक्षसोंका वंश नष्ट कर दिया ॥२५४।। तुम्हारे वंशज पृथिवीपर मर्यादाका पालन करनेवाले प्रशस्त चेष्टाके धारक उत्तम पुरुष हुए परन्तु तू उन सबमें छिलकेके समान निःसार हुआ है ॥२५५।। __इस प्रकार कहनेपर रावण क्रोधसे लाल हो गया। वह कृपाणकी ओर देखकर बोला कि यह उद्दण्ड अत्यधिक दुर्वचनोंसे भरा है तथा मृत्युका भय छोड़कर मेरे सामने बड़प्पन धारण कर रहा है अतः नगरके बीच ले जाकर इस दुष्ट को शीघ्र ही दुर्दशा को जाये ॥२५६-२५७॥ १. सत्यधर्मो म. । २. वमनेन म. । ३. नपकर्मत्वं म. । ४. नु म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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