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________________ त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व ३३७ ततस्तमुद्यदादित्यमण्डलप्रतिमविषम् । प्रदष्टाधरमालोक्य विशीर्णाः किङ्करा गणाः ॥१९॥ ततः किलापरैः करैः प्रख्यातैः किङ्कराधिपः । तस्किङ्करबलं गच्छदितश्चेतश्च धारितम् ।।१९१॥ शक्तितोमरचक्रासिगदाकार्मुकपाणयः । सर्वतो वास्तृणन्नेतं मुखराः किङ्करास्ततः ॥१९२।। मुमुचुश्च धनं शस्त्रं ज्येष्ठवाता यथा वुसम् । अदृष्टमास्करोद्योताः परं संघातवर्तिनः ॥१९३।। उत्पाट्य वायुपुत्रोऽपि निःशस्त्रो धीरपुङ्गवः । संघातं तुङ्गवृक्षाणां शिलानां वारमक्षिपत् ॥१९॥ भीममोगिमहद्भोगभास्वगुजजवेरितैः । पादपादिभिराहिंसन् कालमेघ इवोन्नतः ।।१९५॥ अश्वत्थान शालन्यग्रोधान्नन्दिचम्पककेसरान् । नीपाशोककदम्बांश्च पुन्नागानर्जनान् धवान् ॥१९६॥ आम्रानाम्रातकालोध्रां (स्तृणराजान् ) स्थवीयसः । विशालान् पनसाद्यांश्च चिक्षेप क्षेपवर्जितः ॥१९७॥ बमा त्वरितं कांश्चिदपरानुदमूलयत् । मुष्टिपादप्रहारेण पिपेषान्यान् महाबलः ।।१९८॥ आकृपारसमं तेन सैन्यमेकेन तस्कृतम् । समाकुलं गतं क्वापि क्षणेन प्रियजीवितम् ॥१९९॥ सहायैर्मृगराजस्य कुर्वतो मृगशासनम् । कियद्भिरपरैः कृत्यं त्यक्त्वा सत्त्वं सहोदभवम् ॥२०॥ पुष्पारवतीर्णस्य ककुब्वलयरोधनम् । भूयो युद्धमभूदुग्रं प्रान्तविध्वस्तकिङ्करम् ॥२०॥ हए लम्बे वस्त्रको धारण करनेवाला हनुमान् जब उद्यानके उस प्रदेशसे नीचे उतर रहा था तब किंकरोंने उसे देखा ॥१८९।। उस समय क्रोधके कारण हनुमान्की कान्ति उदित होते हुए सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान हो रही थी तथा वह अपना ओठ चबा रहा था। उसे देख किंकरोंके झुण्ड भाग खड़े हुए ।।१९०।। तदनन्तर जो किंकरोंमें प्रधान क्रूर एवं प्रसिद्ध दूसरे किंकर थे उन्होंने इधर-उधर भागते हुए किंकरोंके दलको इकट्ठा किया ।।१९१।। तदनन्तर जिनके हाथमें शक्ति, तोमर, चक्र, खड्ग, गदा और धनुष थे ऐसे उन किंकरोंने चिल्लाकर सब ओरसे हनुमान्को घेर लिया ।।१९२॥ __ वे किंकर इतनी अधिक भीड़ इकट्ठी कर विद्यमान थे कि उनके कारण सूर्यका प्रकाश भी अदृष्ट हो रहा था । तदनन्तर जिस प्रकार जेठ मासकी वायु भूसा उड़ाती है उसी प्रकार वे अत्यधिक शस्त्र छोड़ने लगे ॥१९३॥ धीरशिरोमणि पवन-पुत्र हनुमान् यद्यपि शस्त्र रहित था परन्तु तो भी उसने बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओंके समूह उखाड़-उखाड़कर फेंके ॥१९४॥ भयंकर शेषनागके शरीरके समान सुशोभित भुजाओंके वेगसे फेंके हुए वृक्ष आदिसे प्रहार करता हुआ हनुमान् उस समय प्रलयकालके उन्नत मेघके समान जान पड़ता था ॥१९५।। हनुमान् बिना किसी विलम्बके पीपल, सागौन, वट, नन्दी, चम्पक, बकुल, नीम, अशोक, कदम्ब, नागकेसर, कोहा, धवा, आम, मिलमा, लोध्र, खजूर तथा कटहल आदिके बड़े मोटे तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उखाड़कर फेंक रहा था ॥१९६-१९७।। उस महाबलवान्ने ही लोगोंको शीघ्र ही खण्डित कर दिया, कितने ही योधाओंको उखाड डाला-पैर पकड़कर पछाड़ दिया और कितने ही किंकरोंको लात तथा घुसोंके प्रहारसे पीस डाला ॥१९८|| उस अकेलेने ही समुद्रके समान भारी सेनाकी वह दशा की कि जिससे वह व्याकुल हो क्षण भरमें प्राण बचाकर कहीं भाग गयी ॥१९९|| गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मृगोंपर शासन करनेवाले मृगराज-सिंहको अन्य सहायकोंकी क्या आवश्यकता है ? और जो स्वाभाविक तेजको छोड़ चुके हैं उन्हें दूसरे सहायकोंसे क्या लाभ है-निस्तेज मनुष्यका अन्य सहायक क्या भला कर सकते हैं ? ॥२०॥ तदनन्तर पुष्पगिरिसे नीचे उतरे हुए हनुमान्का दिङ्मण्डलको रोकनेवाला तथा जिसमें १. वावृणन्नेतं म. । २. यथाम्बुदम् म. । ३. अतिस्थूलान् । ४. सागरसदृशम् । ५. चक्रुर्वलयरोधनम् म. । २-४३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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