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________________ ३३६ पपुराणे तासामाकुलिका काचिन्निधाय शिरसि स्रजम् । उपवीणनमारेभे कतु किन्नरनिस्वना ।।१७५।। काचिदिन्दुमुखी वामे हस्तेऽवस्थाप्य दर्पणम् । दिदृक्षन्ती समालोक्य तं बभूवान्यथामनाः ॥१७६।। ईषरकाचिदमिज्ञाय वधूरिदमचिन्तयत् । अलब्धद्वारसंमानः कुतो मारुतिरागतः ।।१७७।। वरस्त्रीजनमुद्याने कृरवा संभ्रान्तमानसम् । हारमाल्याम्बरधरो मास्वान् वह्निकुमारवत् ।।१७८॥ निसर्गकान्तया गत्या प्रदेशं किंचिदभ्यगात् । तथाविधां च तां वा मशृणोद्राक्षसाधिपः ।।१७९।। क्रोधसंस्पृष्टचित्तेन निरपेक्षत्वमीयुषा । तावदाज्ञापिताः शूरा रावणेनोऽग्रकिङ्कराः ॥१८॥ विचारेण न वः कृत्यं पुष्पोद्यानान्निरेति यः । मद्रोही कोऽप्ययं क्षिप्रं नीयतामन्तमायुषः ।।१८१॥ अमी ततः समागत्य दध्युर्विस्मयमागताः । किमिन्द्रजिन्नरेशः स्याद्भास्करः श्रवणोऽथवा ।।१२। पश्यामस्तावदित्युक्त्वा तैरित्युक्तं समन्ततः । मो भो शृणुत निःशेषा उद्यानस्याभिरक्षकाः ।।१८३।। किं तिष्ठत सुविश्रब्धाः किङ्कराः कृतितां श्रिताः । किमिति श्रुतमस्माभिः कथ्यमानमिदं बहिः ।।१८४॥ कोऽप्युद्दामतयोद्यानं प्रविष्टो दुष्टखेचरः । स क्षिप्रं मार्यतामेष गृह्यतां दुविनीतकः ॥१८५।। धावध्वमसकौ कोऽसौ सोऽयमेव यतः कुतः । कस्य कस्तादृशः क्वेति किकरध्वनिरुद्गतः ॥१८६॥ ततः कामुकिकान् दृष्टा शाक्तिकान् गदिकांश्च तान् । खगिकान् कौन्तिकान् बद्धसंघातानायतो बहून् ।१८७ किंचित् संभ्रान्तधीर्वातिभृगाधिपपराक्रमः । रत्नशाखामृगच्छायासमुद्दीपितपुष्करः ॥१८॥ अवरोहंस्ततो देशात्तैरदृश्यत किङ्करैः । आकुलस्वविनिर्मुक्तः प्रलम्बं बिभ्रदम्बरम् ।।१८९॥ उन स्त्रियोंमें कामसे आकुल होकर कोई स्त्री सिरपर माला रख किन्नरके समान मधुर स्वरसे वीणा बजाने लगी ॥१७५।। कोई चन्द्रमुखो बायें हाथमें दर्पण रख उसमें हनुमान्का प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छा करती हुई अन्यथा चित्त हो गयी ।।१७६|| कोई स्त्री कुछ-कुछ पहचानकर यह विचार करने लगी कि जिसे द्वारपर सम्मान प्राप्त नहीं हुआ ऐसा यह हनुमान् यहाँ कहाँ आ गया ? ॥१७७।। इस प्रकार वनमें स्थित उत्तम स्त्रियोंको सम्भ्रान्त चित्त कर हार, माला तथा उत्तम वस्त्रोंको धारण करनेवाला एवं अग्निकुमारके समान देदीप्यमान हनुमान्, अपनो स्वभावसुन्दर चालसे किसी स्थानकी ओर जा रहा था कि रावणने यह सब समाचार सुना ।।१७८-१७९।। सुनते ही जिसका चित्त आगबबला हो गया था तथा जो निरपेक्ष भावको प्राप्त हो चका था-सब प्रकारका स्नेह भुला चुका था ऐसे रावणने उसी समय अपने शूरवीर प्रधान किंकरोंको आज्ञा दो कि तुम लोगोंको विचार करनेसे प्रयोजन नहीं है। पुष्पोद्यानसे जो पुरुष बाहर निकल रहा है वह कोई द्रोही है उसे शीघ्र ही आयुका अन्त कराया जाये-मारा जाये ॥१८०-१८१॥ तदनन्तर किंकर आकर आश्चर्यको प्राप्त हो इस प्रकार विचार करने लगे कि क्या यह इन्द्रको जीतनेवाला कोई राजा है, या सूर्य है अथवा श्रवण नक्षत्र है ? ॥१८२।। अथवा कुछ भी हो चलकर देखते हैं इस प्रकार कहकर उन्होंने सब ओर आवाज लगायी कि हे उद्यानके समस्त रक्षको! सुनो, तुम लोग निश्चिन्त होकर क्यों बैठे हो ? हमने उद्यानके बाहर चर्चा सुनी है कि कोई एक दुष्ट विद्याधर आनी उद्दण्डतासे उद्यानमें प्रविष्ट हुआ है सो यह क्या बात है ? उस दुविनीतको शीघ्र ही मारा जाये अथवा पकड़ा जाये ॥१८३-१८५।। रावणके प्रधान किंकरोंकी बात सुनकर उद्यानके किंकरोंने 'दौड़ो, कौन है वह, यहीं कहीं होगा, वह किसका कौन है ? उसके समान कौन कहाँ ?' इस प्रकारका हल्ला मचाया ।।१८६।। उन किंकरोंमें कोई धनुष लिये हुए थे, कोई शक्ति धारण कर रहे थे, कोई गदाके धारक थे, कोई तलवारोंसे युक्त थे, कोई भाले संभाले हए थे, और कोई झण्ड-के-झण्ड बनाकर बहसंख्या में आ रहे थे। उन सबको देख हनुमानके मन में कुछ सम्भ्रम उत्पन्न हुआ परन्तु वह तो सिंहके समान पराक्रमी था उसने रत्नमयी बानर-जैसो कान्तिसे आकाशको देदीप्यमान कर दिया ।।१८७-१८८।। तदनन्तर आकुलतासे रहित एवं लटकते १. अल धदार -म., ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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