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________________ त्रिपञ्चाशत्तम पर्व ३३५ ततस्त्वयेति पृष्टेन प्रसन्नमुखशोमिना । आख्यातमिति देव्येते यथा नन्दिगुमा इति ॥१६॥ कर्णकुण्डलनद्याश्च स्थितास्तीरे वयं यदा । तदा संनिहिती जाती मध्याह्ने व्योमगौ मुनी ॥१६॥ त्वया मया च भिक्षार्थ तयोरागतयोस्ततः । अभ्युत्थाय महाश्राद्धं रचितं पूजनं महत् ॥१६२॥ अन्नं च परमं ताभ्यां दत्तं विधिसमन्वितम् । पञ्च चातिशया जातास्तत्प्रभावेन सुन्दराः ॥१६३।। पात्रदानमहोदानं महादानमिति ध्वनिः । अन्तरिक्षेऽमरैश्चक्रे साधु सम्यग्ध्वनिश्रितः ॥१६४|| अदृष्टतनुभिदवर्दुन्दुभिः सध्वनिः कृतः । पपात गगनावृष्टिः कौसुमी भृङ्गनादिता ॥१६५॥ सुखशीतो ववौ वायुः सुगन्धिर्नीरजो मृदुः । मणिरत्नसुवर्णाङ्गा धाराश्रममपूरयत् ॥१६६॥ चूडामणिमिमं चोळू' दृढप्रत्ययकारणम् । दर्शयिष्यसि नाथाय तस्यात्यन्तमयं प्रियः ॥१६७॥ जानामि नाथ ते मावं प्रसादिनमलं मयि । तथापि यत्नतः प्राणाः पाल्याः संगमनाशया ।।१६८॥ प्रमादाद्भवतो जातो वियोगोऽयं मया सह । सांप्रतं त्वयि यत्नस्थे संगमो नौ विसंशयः ॥१६॥ इत्युक्त रुदती सीतां समाश्वास्य प्रयत्नतः । यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा निरैत्सीताप्रदेशतः ।।१७०॥ पाण्यङ्गुलीयकं सीता तदाशक्तशरीरिका । मानसस्य कृताश्वासं मेने पत्युः समागमम् ॥१७१।। अथोद्यानगता नार्यस्वस्तसारङ्गलोचनाः । वायुनन्दनमालोक्य स्मितविस्मितसंगताः ।।१७२।। परस्परं समालापमिति कतु समुद्यताः । अस्य पुष्पनगस्योद्धर्व कोऽप्यहो नरपुङ्गवः ।।१७३॥ अवतीर्णः किमेष स्याद्विग्रही कुसुमायुधः । देवः कोऽपि तु शैलस्य शोभा द्रष्टुं समागतः ॥१७४।। तब इस प्रकार पूछे जानेपर आपने प्रसन्न मुखमुद्रासे सुशोभित हुए कहा कि हे देवि! ये नन्दि वृक्ष हैं ॥१६०॥ एक बार हम सब कर्णकुण्डल नदीके तीरपर ठहरे हुए थे, उसी समय मध्या कालमें दो आकाशगामी मुनि निकट आये थे ॥१६१।। तब आपने और मैंने उठकर, भिक्षाके लिए आये हुए उन मुनियोंकी बड़ी श्रद्धाके साथ विशाल पूजा की थी ।।१६२॥ तथा विधिपूर्वक उन्हें उत्तम आहार दिया था, उसके प्रभावसे वहाँ अत्यन्त सुन्दर पंच आश्चर्य हुए थे ॥१६३।। आकाशमें देवोंने यह मधुर शब्द किये कि अहो ! पात्रदान ही दान है, यही सबसे बड़ा दान है ।।१६४।। जिनका शरीर दीख नहीं रहा था ऐसे देवोंने दुन्दुभि बाजे बजाये, आकाशसे जिसपर भ्रमर शब्द कर रहे थे ऐसी पुष्पवृष्टि हुई ।।१६५।। सुखकारी, शीतल, सुगन्धित एवं धलि रहित कोमल वायु चली थी और मणि, रत्न तथा सुवर्णकी धाराने उस आश्रमको भर दिया था ॥१६६।। हे भाई ! इसके बाद दृढ़ विश्वासका कारण यह उत्तम चूड़ामणि प्राणनाथको दिखाना, क्योंकि यह उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥१६७|| ऊपरसे यह सन्देश कहना कि हे नाथ ! आपका मुझपर अतिशय प्रसन्नतासे भरा जो भाव है उसे मैं यद्यपि जानती हूँ तो भी पुनः समागमकी आशासे प्राण प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने योग्य हैं ।।१६८॥ प्रमादके कारण मेरे साथ आपका यह वियोग हुआ है परन्तु इस समय जबकि आप प्रयत्न कर रहे हैं तब हम दोनोंका समागम निःसन्देह होगा ॥१६९॥ इतना कहकर सीता रोने लगी. तदनन्तर उसे प्रयत्नपूर्वक सान्त्वना देकर और 'जैसी आज्ञा हो' यह कहकर हनुमान्, सीताके उस स्थानसे बाहर निकल आया ॥१७०।। उस समय जिसका शरीर अशक्त हो रहा था ऐसी सीताने अंगूठोको हाथमें पहनकर ऐसा माना था मानो मनको आनन्द देनेवाला पतिका समागम ही प्राप्त हुआ हो ।।१७१।। अथानन्तर उस उद्यानमें भयभीत मृगके समान नेत्रोंको धारण करनेवाली जो स्त्रियाँ थीं वे हनुमान्को देख मन्द मुसकान और आश्चर्य से युक्त हो परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगीं कि अहो ! इस फूलोंके पर्वतके ऊपर यह कोई श्रेष्ठ पुरुष अवतीर्ण हुआ है सो क्या यह शरीरधारी कामदेव है ? अथवा पर्वतको शोभा देखनेके लिए कोई देव आया है ? ॥१७२-१७४॥ १. चोवं म., ख. । २. आवयोः । ३. निरगच्छत् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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