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________________ ३३४ पद्मपुराणे ततोऽअलिपुटं बद्ध्वा रुदती जनकात्मजा । जगादादरसंयुक्ता विचिन्तितयथास्थितिः ॥१४५॥ 'अन्तरेण प्रमोराज्ञां गमनं मे न युज्यते । इत्यवस्थां गता दास्ये तस्मै किमहमुत्तरम् ॥१४६॥ प्रत्येति नाधुना लोकः शुद्धिं मे मृत्युना विना । नाथ एव ततः कृत्यं मम ज्ञास्यति सांप्रतम् ॥१४७॥ यावन्नोपद्वः कश्चिज्जायते दशवक्त्रकात् । तावद्वज द्रुतं भ्रातर्नालम्बनमिह क्षणम् ॥१४॥ त्वया मद्वचनाद् वाच्यः सम्यक् प्राणमहेश्वरः । अभिधानैरिमैमूनि निधाय करकुड्मलम् ॥१४९॥ तस्मिन् देव मया सार्द्ध मुन्यो व्योमचारिणः । वन्दिताः परमं मक्त्या त्वया स्तवनकारिणा ॥१५॥ विमलाम्भसि पग्रिन्या नितरामुपशोभिते । सरसि क्रीडतां स्वेच्छमस्माकमतिसुन्दरम् ॥१५॥ आरण्यकस्तदा हस्ती समायातो मयंकरः । ततो मया समाहूतस्त्वमुन्मग्नो जलान्तरात् ॥१५२॥ उहामाऽसौ महानागश्चारुकीडनकारिणा । समस्तं त्याजितो दर्प भवता निश्चलीकृतः ॥१५३॥ आसीच्च नन्दनच्छाये वने पुष्पमरानते । शाखां पल्लवलोभेन नमयन्ती प्रयासिनी ॥१५४॥ भ्रमद्भिश्चञ्चलै ऑरभिभूता ससंभ्रमा । भुजाभ्यां भवताश्लिष्य जनिताकुलतोज्झिता ॥१५५॥ उद्यन्तमन्यदा मार्नु माहेन्द्रीदिग्विभूषणम् । अहमम्मोजषण्डस्य त्वया सह तटे स्थिता ॥१५६॥ अशंसिषं ततः किंचिदीारसमुपेयुषा । बालेनोत्पलनालेन मधुरं ताडिता त्वया ॥१५७॥ अन्यदा रतिशैलस्य प्राग्भारस्य मया प्रिय । पृष्टस्त्वमिति बिभ्रत्या कौतुकं परशोभया ॥१५८॥ एतस्मिन् कुसुमैः पूर्णा विपुला स्निग्धताजुषः । किंनामानो द्रुमा नाथ मनोहरणकोविदाः ॥१५९॥ समागमसे उत्पन्न होनेवाले हर्षका अनुभव करें ॥१४४॥ तदनन्तर सब स्थितिका यथायोग्य विचार करनेवाली एवं आदरसे संयुक्त सीताने हाथ जोड़कर रोती हुई यह कहा कि स्वामीकी आज्ञाके बिना मेरा जाना योग्य नहीं है । इस अवस्थामें पड़ी हुई मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगी ॥१४५-१४६।। इस समय लोग मृत्युके बिना मेरी शुद्धिका प्रत्यय नहीं करेंगे, इसलिए प्राणनाथ ही आकर मेरे कार्यको योग्य जानेंगे ॥१४७।। हे भाई! जबतक रावणकी ओरसे कोई उपद्रव नहीं होता है तबतक तू शीघ्र ही यहाँसे चला जा । यहाँ क्षणभर भी विलम्ब मत कर ॥१४८|| तू हाथ जोड़ मस्तकसे लगा, इन परिचायक कथानकोंके साथ-साथ मेरे वचनोंमें प्राणनाथसे अच्छी तरह कहना कि हे देव ! उस वनमें एक दिन स्तवन करते हुए आपने मेरे साथ बड़ी भक्तिसे आकाशगामी मुनियोंकी वन्दना की थी ॥१४९-१५०॥ एक बार निर्मल जलसे युक्त तथा कमलिनियोंसे सुशोभित सरोवरमें हम लोग इच्छानुसार सुन्दर क्रीड़ा कर रहे थे कि इतने में एक भयंकर जंगली हाथी वहाँ आ गया था, उस समय मैंने आपको पुकारा था सो आप जलके मध्यसे तत्काल ऊपर निकल आये थे ।।१५१-१५२॥ और सुन्दर क्रीड़ा करते हुए आपने उस उद्दण्ड महाहस्तीका सब गवं छुड़ाकर कर दिया था ॥१५३॥ एक बार नन्दनवनके समान सुन्दर तथा फलोंके भारसे झके हुए वनमें, मैं नूतन पत्रोंके लोभसे प्रयत्नपूर्वक वृक्षकी एक शाखाको झुका रही थी। तब उड़ते हुए चंचल भ्रमरोंने धावा बोलकर मुझे आकुल कर दिया था, उस समय मुझ घबड़ायी हुईको आपने अपनी मुजाओंसे आलिंगन कर छुड़ाया था ॥१५४-१५५।। एक बार मैं आपके साथ कमलवनके तटपर बैठी थी उसी समय पूर्व दिशाके आभूषणस्वरूप सूर्यको उदित होता देख मैंने उसकी प्रशंसा की थी तब आपने कुछ ईर्ष्यारसको प्राप्त हो मुझे नीलकमलकी एक छोटो-सी दण्डीसे मधुर रीतिसे ताडित किया ॥१५६-१५७। एक बार रतिगिरिके शिखरपर अत्यधिक शोभाके कारण कौतुकको धारण करती हुई मैंने आपसे पूछा था कि हे प्रिय ! इधर फूलोंसे परिपूर्ण, विशाल, स्निग्धताको धारण करनेवाले एवं मनके हरण करनेमें निपुण ये कौन-से वृक्ष हैं ? ॥१५८-१५९|| १. विना । २. समाहृतः म. । ३. उद्दामोऽसो म. । ४. रतिभूता म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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