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________________ त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व आहारो वायुपुत्रेण तत्र भुक्तो मनोहरः । एवं कर्तव्ययोगेा मुहूर्तास्ते त्रयो गताः ॥५३१॥ मुहूर्तेऽथ चतुर्थे नु समानीतमिरास्त्रिया । आहारं मैथिलीभुक्तमिति जानन्ति कोविदाः ॥१३२॥ चन्दनादिभिरालिप्ते भूतले दर्पणप्रभे । पुष्पोपकारसपन्ने नलिनीपत्रशोभिनि ॥१३३।। सद्गन्धं विपुलं स्वच्छं पथ्यं पेयादिपूर्वकम् । स्थाल्यादिभिर्महापात्रः सौवर्णादिभिराहृतम् ॥१३॥ घृतसूपादिभिः काश्चित्पान्यो राजन्ति पूरिताः । कुन्दपुष्पसमच्छायैः शालीनां काश्चिदोदनैः ।।१३५॥ षडरसैरुपदंशैश्च काश्चिद्रोचनकारिमिः । व्यञ्जनस्तरलैः काश्चि पिण्डीबन्धोचितैस्तथा ॥१३६॥ पयसा संस्कृतैः काश्चिदन्याः परमदाधिकैः । लेयः काश्चिन्महास्वादैरन्याः पश्चान्निषेवितैः ॥१३७॥ एवं परममाहारमिरा परिजनान्विता । हनूमन्तं पुरस्कृत्य भ्रातृभावेन वत्सला ॥१३८॥ महाश्रद्धान्वितस्वान्ता प्रणिपत्य जिनेश्वरान् । समाप्य नियमं धीरा ध्यातातिथिसमागमा ॥१३॥ निधाय हृदये रामममिरामं पतिव्रता । पवित्राङ्गा दिने भुइनके साधुलोकप्रपूजितम् ॥१४॥ रविरश्मिकृतोद्योतं सुपवित्रं मनोहरम् । पुण्यवर्धनमारोग्यं दिवाभुक्तं प्रशस्यते ॥१४१॥ निवृत्तभोजनविधिः किंचिद्विश्रब्धतां गता । विज्ञापितेति भूयोऽपि सीता पवनसूनुना ॥१४२॥ आरोह देवि मे स्कन्धे पवित्रे गुणभूषणे । समुल्लङ्घय नदीनाथं नेष्यामि भवती क्षणात् ॥१४३॥ 'पश्य तं विमवैर्युक्तं राघवं त्वत्परायणम् । भवद्योगसमानन्दं जनोऽनुभवतु प्रियः ॥१४॥ हनुमान्ने विभीषणके घर ही मनोहर आहार ग्रहण किया। इस प्रकार कर्तव्य कार्य करते हुए तीन मुहूर्त निकल गये ॥१३१॥ तदनन्तर चतुर्थ मूहूर्तमें इरा, सीताके भोजनके योग्य आहार ले आयी ।।१३२॥ वहाँकी भूमि चन्दनादिसे लीपकर दर्पणके समान स्वच्छ की गयो, फूलोंके उपकारसे सजायी गयी जिससे वह कमलिनी पत्रके समान सुशोभित हो उठी ॥१३३॥ स्वर्ण आदिसे बने हुए स्थाली आदि बड़े-बड़े पात्रों में सुगन्धित, अत्यधिक, स्वच्छ और हितकारी पेय आदि पदार्थ लाये गये ॥१३४।। वहाँ कितनी हो थालियाँ दाल आदिसे भरी हुई सुशोभित हो रही थीं, कितनी ही कुन्दके फूलके समान उज्ज्वल धानके भातसे युक्त थीं ॥१३५।। कितनी ही थालियाँ रुचि बढ़ानेवाले षट्रसके भोजनोंसे परिपूर्ण थीं, कितनी ही पतली तथा कितनी ही पिण्ड बंधनेके योग्य व्यंजनोंसे यक्त थीं ॥१३६॥ कितनी ही धसे निर्मित. कितनी ही दहीसे निर्मित पदा थीं, कितनी ही चाटनेके योग्य रबड़ी आदिसे, कितनी ही महास्वादिष्ट भोजनोंसे तथा कितनी ही भोजनके बाद सेवन करने योग्य पदार्थोंसे परिपूर्ण थीं ॥१३७।। इस प्रकार इरा अपने परिजनके साथ उत्तम आहार ले आयी, सो हनुमान्को आगे कर जिसके भाईका स्नेह उमड़ रहा था, ऐसी सीताने हृदयमें महाश्रद्धा धारण कर जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार किया. 'जबतक पतिका समाचार नहीं मिलेगा तबतक आहार नहीं लूंगी' यह जो नियम लिया था उसको बड़ी धीरतासे समाप्त किया। अतिथियोंके समागमका विचार किया, स्नानादिकसे शरीरको पवित्र किया। तदनन्तर अभिराम ( मनोहर ) रामको हृदयमें धारण कर उस पतिव्रताने दिनके समय साधुजनोंके द्वारा प्रशंसित उत्तम आहार ग्रहण किया, सो ठोक ही है क्योंकि जो सूर्यको किरणोंसे प्रकाशित है, अतिशय पवित्र है, मनोहर है, पुण्यको बढ़ानेवाला है, आरोग्यदायक है और दिनमें ही ग्रहण किया जाता है ऐसा भोजन ही प्रशंसनीय माना गया है ॥१३८-१४१।। ___ तदनन्तर भोजन करनेके बाद जब सीता कुछ विश्रामको प्राप्त हो चुकी तब हनुमान्ने जाकर उससे पुनः इस प्रकार निवेदन किया कि हे देवि ! हे पवित्रे! हे गुणभूषणे! मेरे कन्धेपर ढो मैं समद्रको लाँघकर अभी क्षण-भरमें आपको ले चलँगा ॥१४२-१४३॥ तम वैभवसे यक्त एवं तुम्हारे ध्यानमें तत्पर रहनेवाले रामके दर्शन करो तथा प्रेमी जन-मित्रगण आप दोनोंके १. घृतप्पादि म. । २. शालीनः म. । ३. रन्यः म.। ४. पश्यन्तं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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