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________________ ३३२ पद्मपुराणे पश्यात्मीयं पतिं युद्ध स्वल्पकैरेव वासरैः । निहतं मम नाथेन जगदुत्कटतेजसा ।।११७॥ एषा गन्तासि वैधव्यं क्रन्दस्येषा चिरोज्झिता । या त्वं पापरतेर्भर्तुरनुकूलत्वमागता ।।११८॥ मयदैत्यात्मजा तीव्रमेवमुक्तातिकोपगा । परमं क्षोममायाता कम्पमानाऽधराधरा ॥१९॥ एका नानासपत्नीनां सहस्रः संभ्रमस्पृशाम् । अष्टादशमिरस्युप्रैः कोपकम्पितमूर्तिमिः ।।१२०॥ समं करतलैर्हन्तुमुद्यता वेगधारिमिः । निर्भर्त्सनमतिरैराक्रोशः कुर्वती भृशम् ।।१२१॥ श्रीमांस्तावन्मरुरपुत्रः समरथाय जवान्वितः । अवस्थितोऽन्तरे तासां सरितामिव भूधरः ॥१२२॥ ता दुःखहेतवः सर्वा वैदेहीं हन्तुमुद्यताः । वेदना इव वैयेन श्रीशैलेन निवारिताः ॥१२३॥ पादताडितभूभागा विभूषादरवर्जिताः । ययुः कराशयाः सर्वा वनितास्ता दशाननम् ॥१२४॥ आञ्जनेन ततः सीता प्रणिपत्य महादरम् । विज्ञापिता सुवाक्येन भोजनं प्रति साधुना ॥१२५।। समर्थितप्रतिज्ञासौ सुनिर्मलमनोरथा । अभ्युपागच्छदाहारं कालदेशज्ञमानसा ॥१२६॥ ससागरा महो देवि रामदेवस्य शासने । वर्तते तेन नैवेदमन्नं सत्यक्तुमर्हसि ।।१२७॥ एवं हि बोधिता तेन वैदेही करुणावनिः । ऐच्छदन्नं यतः साध्वी सर्वाचारविचक्षणा ।।१२८॥ इरा नाम ततस्तेन चोदिता कुलपालिता । यथान्नं प्रवरं श्लाघ्य द्रुतमानीयतामिति ।।१२९।। मुक्ता कन्या स्वशिविरं श्रीशैलेन क्षपाक्षये । भानावभ्युदिते जातो विभीषणसमागमः ॥१३॥ तू कुछ ही दिनोंमें लोकोत्तर तेजके धारक मेरे पतिके द्वारा अपने पतिको युद्ध में मरा हुआ देखेगी॥११७।। जो तू पापमें प्रीति रखनेवाले पतिकी अनुकूलताको प्राप्त हुई है सो इसके फलस्वरूप वैधव्यको प्राप्त होगी और पतिरहित होकर चिरकाल तक रुदन करेगी ॥११८॥ इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर जो अत्यन्त कोपको प्राप्त हो रही थी तथा जो काँपते हुए ओठको धारण कर रही थी ऐसी मन्दोदरी परम क्षोभको प्राप्त हुई ॥११९।। यद्यपि मन्दोदरी एक थी तो भी वह सम्भ्रमको प्राप्त तथा क्रोधसे कम्पित शरीरको धारण करनेवाली अपनी अठारह हजार सपत्नियोंके साथ सीताको वेगशाली करतलोंसे मारनेके लिए उद्यत हुई। वह उस समय अत्यन्त क्रूर अपशब्दोंसे उसका अत्यधिक तिरस्कार कर रही थी ॥१२०-१२१॥ उसी समय लक्ष्मीसे सुशोभित तथा वेगसे युक्त हनुमान् उठकर उन सबके बीचमें उस प्रकार खड़ा हो गया जिस प्रकार कि नदियोंके बीच कोई पर्वत आ खडा होता है ॥१२२।। दःखको कारण, तथा सोताको मारने के लिए उद्यत उन सब स्त्रियोंको हनुमान्ने उस प्रकार रोक दिया जिस प्रकार कि वैद्य वेदनाओंको रोक देता है ॥१२३।। तदनन्तर जो पैरोंसे पृथिवीके प्रदेश ताड़ित कर रही थीं तथा जिन्होंने आभूषण धारण करनेका आदर छोड़ दिया था ऐसी दुष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाली वे सब स्त्रियाँ रावणके पास गयीं ॥१२४॥ तदनन्तर साधु स्वभावके धारक हनुमान्ने बड़े आदरके साथ सीताको प्रणाम कर उत्तम वचनोंके द्वारा भोजन करनेकी प्रार्थना की ॥१२५।। सो जिसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी थी, जिसका मनोरथ निर्मल था और जिसका मन देश कालका ज्ञाता था ऐसी सीताने आहार ग्रहण करना स्वीकृत कर लिया ।।१२६।। प्रार्थना करते समय हनुमान्ने इस प्रकार समझाया था कि हे देवि ! यह समुद्र सहित पृथिवी राम देवके शासन में है इसलिए यहाँका यह अन्न छोड़नेके योग्य नहीं है ।।१२७॥ इस प्रकार समझाये जानेपर दयाकी भूमि सीताने अन्न ग्रहण करनेकी इच्छा की थी, सो ठीक ही है क्योंकि वह पतिव्रता सब प्रकारका आचार जानने में निपुण थी॥१२८॥ तदनन्तर हनुमान्ने इरा नामकी कुलपालितासे कहा कि शीघ्र हो उत्तम तथा प्रशंसनीय अन्न लाओ ॥१२९।। इस प्रकार कहनेपर कन्या अपने शिविर अर्थात डेरे में गयी और रात्रि समाप्त होने तथा सूर्योदय होनेपर हनुमान्का विभीषणके साथ समागम हुआ ॥१३०।। १. गतासि म. । २. स्पृशम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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