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________________ एकोनपञ्चाशत्तमं पर्व तच्छ्रुत्वा विगतक्रोधो जातः पवननन्दनः । पुनरुक्तं जगौ तुष्टः विकसम्मुखपङ्कजः ॥२९॥ कृतं कृतमहो साधु प्रियं पद्मेन नः परम् । यत्सुग्रीवकुलं मज्जदकीतौ क्षिप्रमुष्टतम् ॥३०॥ हेमकुम्मोपमं गोत्रं अयशःकूपगह्वरे । निमज्जद्गुणहस्तेन तेन सन्मतिनोद्धृतम् ॥३१॥ एवमादिपरं भूरि प्रशंसन् रामलक्ष्मणौ । कस्मिन्नपि ममज्जासौ सारसौख्य महार्णवे ॥३२॥ श्रुत्वा पङ्कजरागायाः पितुः शोकपरिक्षयम् । उत्सवः सुमहान् जातो दानपूजादिसंस्तुतः ॥ ३३ ॥ उद्वेगानन्दसंपन्नं हतच्छायसमुज्ज्वलम् । श्रीशैलभवनं जातं रसद्वयसमुत्कटम् ॥३४॥ एवं विषमतां प्राप्ते स्वजने पावनंजयिः । किंचित्समत्वमाधाय किष्किन्धाभिमुखं ययौ ||३५|| ऋध्याभिगच्छतस्तस्य बलेनात्यर्थ भूरिणा । जगद्न्यदिवोद्भूतमाकाश परिवर्जितम् ||३६|| विमानं सुमहत्तस्य मणिरत्नसमुज्ज्वलम् । प्रभां दिवसरत्नस्य जहार स्वमरीचिभिः ||३७|| गच्छन्तं तं महाभाग्यं शतशो बन्धुपार्थिवाः । अनुजग्मुः सुनासीरं यथा त्रिदशपुंगवाः ||३८|| अग्रतः पृष्ठतश्चास्य पार्श्वतश्च जयस्वनैः । गच्छतां खेचरेन्द्राणामासीच्छब्दमयं नमः ||३९|| चित्रमासीद्यदश्वानां विहायस्तलगामिनाम् । मनोहारी गजानां च विलासः स्वतनूचितः ||४०|| महातुरङ्गसंयुक्तैः रथैरुच्छ्रितकेतुभिः । विहायसस्तलं जातं मन्ये कल्पनगाकुलम् ॥४१॥ सितानामातपत्राणां गण्डलेन महीयसा । जातं कुमुदखण्डानामिव पूर्ण वियत्तलम् ||१२|| 3 पहचान में आया और रामके द्वारा छोड़े हुए वाणोंसे मृत्युको प्राप्त हुआ ||२८|| यह सुनकर हनुमान् क्रोधरहित हो गया । प्रसन्नतासे उसका मुखकमल खिल उठा और सन्तुष्ट होकर उसने बार-बार कहा कि अहो ! रामने बहुत अच्छा किया, मुझे बहुत अच्छा लगा जो उन्होंने अपकीर्तिमें डूबते हुए सुग्रीव कुलका शीघ्र ही उद्धार कर लिया ॥ २९-३० ॥ स्वर्णकलशके समान सुग्रीवका कुल अपयशरूपी कूपके गर्तमें पड़कर डूब रहा था सो उत्तम बुद्धिके धारक रामने गुणरूपी रस्सी हाथ में ले उसे निकाला है ||३१|| इस प्रकार रामलक्ष्मणकी अत्यधिक प्रशंसा करता हुआ हनुमान् किसी अद्भुत श्रेष्ठ सुखरूपी सागर में निमग्न हो गया ||३२|| हनुमान की दूसरी स्त्री सुग्रीवकी पुत्री पद्मरागा थी सो पिताके शोकका क्षय सुनकर उसे बड़ा हर्ष हुआ । उसने दान-पूजा आदिके द्वारा महाउत्सव किया ||३३|| उस समय हनुमान् के भवनमें एक ओर तो शोक मनाया जा रहा था और दूसरी ओर हर्ष प्रकट किया जा रहा था । वह एक ओर तो कान्तिसे शून्य हो रहा था और दूसरी ओर देदीप्यमान हो रहा था । इस प्रकार दो स्त्रियोंके कारण वह दो प्रकारके रससे युक्त था ||३४|| इस प्रकार जब कुटुम्ब के लोग विषमताको प्राप्त हो रहे थे तब हनुमान् कुछ-कुछ मध्यस्थताको धारण कर किष्किन्धानगरकी ओर चला ||३५|| वैभवके साथ जाते हुए हनुमान की बहुत बड़ी सेनासे उस समय संसार आकाशसे रहित होने के कारण ऐसा जान पड़ता था मानो दूसरा ही उत्पन्न हुआ हो ||३६|| मणियों और रत्नोंसे जगमगाता हुआ उसका बड़ा भारी विमान, अपनी किरणोंसे सूर्यकी प्रभाको हर रहा था ||३७|| जाते हुए उस महाभाग्यशालीके पीछे सैकड़ों मित्रराजा उस प्रकार चल रहे थे जिस प्रकार कि इन्द्रके पीछे उत्तमोत्तम देव चलते हैं ||३८|| उसके आगे-पीछे और दोनों ओर चलनेवाले विद्याधर राजाओंकी जयध्वनिसे आकाश शब्दमय हो गया था ||३९|| आकाशतलमें चलनेवाले उसके घोड़ोंसे आश्चर्यं उत्पन्न हो रहा था तथा हाथियोंकी अपने शरीरके अनुरूप मनोहारी चेष्टा प्रकट हो रही थी ||४०|| जिनमें बड़े-बड़े घोड़े जुते हुए थे तथा जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं ऐसे रथोंसे उस समय आकाशतल ऐसा जान पड़ता था मानो कल्पवृक्षोंसे व्याप्त ही हो ॥४१॥ धवल छत्रोंके विशाल समूहसे आकाशतल ऐसा जान पड़ता था मानो कुमुदोंके समूहसे ही व्याप्त १. सुमहत् तस्य । २. सूर्यस्य । ३. च कुन्द म. । Jain Education International ३०१ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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