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________________ ३०० पद्मपुराण अनङ्गकुसुमा कृच्छ्रालम्मिता प्राणसंगमम् । अश्रुसिक्तस्तनी तारं विललापातिदुःखिता ॥१४॥ हा तात क्व प्रयातोऽसि प्रयच्छ वचनं मम । हा भ्रातः किमिदं जातं दीयतां दर्शनं सकृत् ॥१५॥ वनेऽतिमीषणे कष्टं रणाभिमुखतां गतः । भूगोचरैः कथं तात मरणत्वमुपाहृतः ॥१६॥ शोकाकुलजनाकीणे जाते श्रीशैलवेश्मनि । नीतो नर्मदया दूतः प्रदेशं वचनोचितम् ॥१७॥ पितु_तुश्च दुःखेन तप्ता चन्द्रनखात्मजा । कृच्छ्रण शमनं नीता सनिः प्रशमकोविदैः ॥१८॥ जिनमार्गप्रवीणासौ बुद्ध्वा संसारसंस्थितिम् । लोकाचारानुकूलत्वाच्चक्रे प्रेतक्रियाविधिम् ॥१९॥ अन्येधुदूतमाहृय पवनंजयनन्दनः । अपृच्छच्छोकसंस्पृष्टः मौललोकसमावृतः ॥२०॥ निःशेष दूत यवृत्तं तन्नि वेदय सांप्रतम् । इत्युक्त्वा कारणं मृत्योः खरदूषणमस्मरत् ॥२१॥ ततोऽस्य क्रोधसंरुद्ध सर्वाङ्गस्य महायते: । भ्रस्तरङ्गवती रेजे तडिद्रेखेव चञ्चला ॥२२॥ ततस्त्रासपरीताङ्गो मुहुर्दूतः प्रतापवान् । जगाद मधुरं प्राज्ञः कोपविध्वंसकारणम् ॥२३॥ ज्ञातमेव हि देवस्य किष्किन्धाधिपतेः परम् । दयितादु:खमुत्पन्नं तत्समाकारहेतुकम् ॥२४॥ आर्तस्तेन स दुःखेन पद्मं शरणमागमत् । प्रतीक्ष्य सोऽतिविध्वंसं किष्किन्धनगरं गतः ॥२५॥ सुग्रीवाकृतिचौरेण समं तत्र महानभत् । चिरं श्रान्तमहायोधः संग्रामः श्वसुरस्य ते ॥२६॥ उत्थाय पद्मनाभेन ततो भयो महौजसा । तस्याहृतस्य नष्टासी वेताली स्तेयकारणम् ॥२७॥ ततः साहसगत्याख्यः स्वस्वभावं समाश्रितः । विज्ञातो रामनिमुक्तैर्मृत्युं नीतः शिलीमुखैः ॥२८॥ रुदनका शब्द ऐसा उठा मानो वीणाओंके हजारों तार कोणके ताड़नको प्राप्त हो एक साथ शब्द करने लगे हों॥१३॥ तदनन्तर अनंगकुसुमा बड़े कष्टसे प्राणोंके समागमको प्राप्त हुई अर्थात् सचेत हुई। सचेत होनेपर अश्रुओंसे स्तनोंको सिक्त करती तथा अतिशय दुःख प्रकट करती हुई वह जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥१४॥ वह कहने लगी कि हाय तात! तम कहाँ गये; मझे वचन देओ-मुझसे वार्तालाप करो। हाय भाई ! यह क्या हुआ ? एक बार तो दर्शन देओ ॥१५॥ हे तात! अत्यन्त भयंकर वनमें रणके सम्मुख हुए तुम भूमिगोचरियोंके द्वारा मरणको कैसे प्राप्त हो गये ? ॥१६॥ इस प्रकार जब श्रीशेलका भवन शोकाकुल मनुष्योंसे भर गया तब अनंगकुसुमाकी नर्मदा-सखी दूतको बात करने योग्य स्थानपर ले गयी ॥१७॥ पिता और भाईके दुःखसे सन्तप्त चन्द्रनखाकी पुत्री अनंगकुसुमा, सान्त्वना देने में निपुण सत्पुरुषोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे शान्तिको प्राप्त करायी गयो ॥१८॥ जिनमार्गमें प्रवीण अनंगकुसुमाने संसारको स्थिति जानकर लोकाचारके अनुकूल पिताको मरणोत्तर क्रिया की ॥१९॥ अथानन्तर दूसरे दिन शोकसे व्याप्त तथा मन्त्री आदि मौलवर्गसे परिवृत श्रीशैलहनुमान्ने दूतको बुलाकर पूछा कि हे दूत ! खरदूषणकी मृत्युका जो कुछ कारण हुआ है वह सब कहो, यह कहकर हनुमान् खरदूषणका स्मरण करने लगा ॥२०-२१॥ तदनन्तर क्रोधसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था ऐसे महादीप्तिमान् हनुमान्की फड़कती हुई भौंह चंचल बिजली की रेखाके समान जान पड़ती थी ॥२२॥ तत्पश्चात् भयसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था ऐसे महाप्रतापी बुद्धिमान्ने हनुमान्का क्रोध दूर करनेवाले निम्नांकित मधुर वचन कहे ॥२३॥ उसने कहा कि हे देव ! आपको यह तो विदित हो है कि किष्किन्धाके अधिपति सुग्रीवको उसीके समान रूप धारण करनेवाले साहसगति विद्याधरके कारण स्त्रीसम्बन्धी दुःख उपस्थित हुआ था।॥२४॥ दुःखसे दुखो हुआ सुग्रीव रामको शरणमें आया था और राम भी उसका दु:ख नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा कर किष्किन्धनगर गये थे॥२५॥ वहां आपके श्वसुर-सुग्रीवका, उसकी आकृतिके चौरकृत्रिम सुग्रीवके साथ बड़े-बड़े योद्धाओंको थका देनेवाला चिरकाल तक महायुद्ध हुआ ॥२६॥ तदनन्तर महातेजस्वी रामने उठकर उसे ललकारा। उन्हें देखते ही चोरीका कारण जो वेतालोविद्या थी वह नष्ट हो गयी ॥२७॥ तब साहसगति अपने असली स्वरूपको प्राप्त हो गया, सबकी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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