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________________ २९६ पद्मपुराणे एवं च सुचिर स्तुत्वा पुनरेवं बभाषिरे । लक्ष्मीधरं समुद्दिश्य स्थापितैकाग्रमानसाः ॥२१०॥ शिलायामिह ये सिद्धा ये चान्ये हतकिल्विषाः । ते विघ्नसूदनाः सर्वे भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२११४ अर्हन्तो मङ्गलं सन्तु तव सिद्धाश्च मङ्गलम् । मङ्गलं साधवः सर्वे मङ्गलं जिनशासनम् ॥२१२॥ इति मङ्गलनिस्वानैर्विहायस्तलचारिणाम् । शिलामचालयत् क्षिप्रं लक्ष्मणो विमलद्युतिः ॥२१३॥ सा लक्ष्मणकुमारेण नानालंकारभूषणा । केयूरकान्तबाहुभ्यां धृता कुलवधूरिव ॥२१४॥ अथान्तरिक्षे देवानां महाशब्दो महानभूत् । सुग्रीवाद्याश्च राजेन्द्रा विस्मयं परमं ययुः ॥२१५॥ ततः सिद्धान् प्रमोदाल्याः प्रणम्य भयवर्जितान् । सम्मेदशिखरस्थं च जिनेन्द्रं मुनिसुव्रतम् ॥२१६॥ 'निषद्या ऋषमादीनामम्यऱ्या च यथाविधि । सकलं मरतक्षेत्र बभ्रमस्ते प्रदक्षिणम् ॥२१७॥ सायाह्ने सौम्यवपुषो दिव्यैर्यानैमनोजवैः । कृताभिवन्दना शब्दैर्जयनन्दादिमिर्भृशम् ॥२१८॥ परिवार्य महावीयं राम लक्ष्मणसंगतम् । किष्किन्धनगरं प्रापुर्विविशुश्च महर्द्धयः ॥२१९॥ शयिताश्च यथास्थानं विस्मितेनान्तरात्मना । एकीभूय पुनः प्रीता इत्यन्योन्यं बमाषिरे ॥२२०॥ वीक्ष्यध्वं वासरैः स्वल्पैः पृथिव्यां राज्यमेतयोः । निःशेषः कण्टकैर्मक्तं शक्ति धारयतोः पराम् ॥२२॥ सा निर्वाणशिला येन चालयित्वा समुद्धता । उत्सादयत्ययं क्षिप्रं रावणं नात्र संशयः ॥२२२॥ तथापरे वचः प्राहः कैलासो येन भधरः। तदा हुः कैलासो येन भूधरः। तदा समद्दतः सोऽयं शिलोद्धारस्य कि समः ॥२२३॥ आहुरन्ये समुद्धारः कैलासस्य कृतो यदि। विद्याबले यतस्तत्र विस्मयः कस्य जायते ॥२२४॥ एकाग्रचित्तके धारण उन विद्याधरोंने लक्ष्मण को लक्ष्यकर कहा कि इस शिलासे जो सिद्ध हुए हैं तथा अन्य जिन पुरुषोंने पापकर्म नष्ट किये हैं वे सब विघ्न विनाशक तुम्हारे लिए मंगलस्वरूप हों ॥२१०-२११।। अरहन्त भगवान् तुम्हारे लिए मंगलस्वरूप हों, सिद्ध परमेष्ठी मंगलरूप हों। सर्व साधु परमेष्ठी मंगलस्वरूप हों और जिन शासन मंगलरूप हो ॥२१२।। इस प्रकार विद्याधरोंकी मंगलध्वनिके साथ, महातेजको धारण करनेवाले लक्ष्मणने शीघ्र ही उस शिलाको हिला दिया ॥२१३।। तदनन्तर लक्ष्मण कमारने कलवधके समान नाना अलंकारोंसे सुशोभित उस शिलाको बाजबन्दोंसे सुशोभित अपनी भुजाओंसे ऊपर उठा लिया ॥२१४॥ उसी समय आकाशमें देवोंका महाशब्द हुआ और सुग्रीव आदि राजा परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥२१५॥ तदनन्तर हर्षसे भरे सब लोग भयसे रहित सिद्ध परमेष्ठियों, सम्मेद शिखरपर विराजमान श्री मुनिसुव्रत नाथ जिनेन्द्रकी तथा ऋषभ आदि तीर्थंकरोंके निर्वाणस्थान कैलास आदिको विधिपूर्वक पूजा कर समस्त भरत क्षेत्रमें घूमे ॥२१६-२१७॥ तदनन्तर वन्दना करनेके बाद सौम्यशरीरके धारक तथा महावैभवसे सम्पन्न सब लोगोंसे सायंकालके समय मनके समान वेगशाली दिव्य विमानों द्वारा 'जय' 'नन्द' आदि शब्दोंके साथ महापराक्रमी राम-लक्ष्मणको घेरकर किष्किन्धनगरमें प्रवेश किया ॥२१८-२१९।। सबने यथास्थान शयन किया। तदनन्तर आश्चर्यचकित चित्तसे एकत्रित हो सब बड़ी प्रसन्नतासे परस्पर इस प्रकार कहने लगे ॥२२०॥ कि तुम लोग परम शक्तिको धारण करनेवाले इन दोनोंका कुछ ही दिनोंमें पृथिवीपर समस्त कण्टकों अर्थात् शत्रुओंसे रहित राज्य देखोगे ॥२२१।। जिसने उस निर्वाणशिलाको चलाकर उठा लिया ऐसा यह लक्ष्मण शीघ्र ही रावणको मारेगा इसमें संशय नहीं है ॥२२२॥ कुछ लोग इस प्रकार कहने लगे कि उस समय जिसने कैलास उठाया था ऐसा रावण क्या इस शिला उठानेवालेके समान है ? ॥२२३।। कुछ अन्य लोग कहने लगे कि यदि रावणने कैलास पर्वत उठाया था तो इससे १. श्रुत्वा म. । २. स्नानानि । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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