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________________ अष्टचत्वारिंशत्तम पर्व २९७ एके च वचनं प्रोचुः किं विवादैरिमर्मुधा । जगद्धिताय संध्यर्थ किं नोपायो निरूप्यते ॥२२५॥ तस्मादानीयतां सीतां समभ्यय॑ दशाननम् । राघवायार्पयिष्यामि विग्रहे किं प्रयोजनम् ॥२२६।। संग्रामे तारको नष्टो मेरुकश्च महाबलः । कृतवीर्यसुताधाश्च महासैन्यसमन्विताः ॥२२७॥ एते खण्डग्रयाधीशा महाभागा महौजसः । अन्ये हि बहवो नष्टा रणे सामन्ततः परम् ॥२२८॥ अन्योन्यममिमन्त्र्यैवं विद्याविधिविशारदाः । राघवं विनयोपेताः संभूय ययुरादरात् ॥२२९॥ सुग्रीवाद्याः समासीना नयनानन्दकारिणम् । विरेजुः परितो रामममरेन्द्र मिवामराः ॥२३०॥ पद्मनाभस्ततोऽवोचत् किमद्याप्यवलम्ब्यते । मया विनान्तरे द्वीपे दुःखं तिष्ठति मैथिली ॥२३॥ दीर्घसूत्रत्वमुत्सृज्य क्षिप्रमद्यैव सर्वथा । त्रिकूटगमने सद्भिः क्रियते न किमुद्यमः ॥२३२॥ तमुचुमन्त्रिणो वृद्धा नयविस्तरकोविदाः । संशयेनात्र किं देव कथ्यतामेकनिश्चयः ॥२३३॥ किं त्वमिच्छसि वैदेहीं विरोधमथ रक्षसाम् । विजयः प्राप्यते दुःखं नायं सदृशविग्रहः ॥२३॥ भरतस्य त्रिखण्डस्य प्रतिपक्षोज्झितः प्रभुः । सागरद्वीपविख्यात एक एव दशाननः ॥२३५।। शङ्कितो धातकीद्वीपो द्योतिषामपि भीतिदः । जाम्बूद्वीपे परं प्राप्तो महिमानं खगाधिपः ॥२३६॥ शल्यभूतोऽस्य विश्वस्य कृतानेकाद्भुतक्रियः। ईदृशो राक्षसो राम कथं संसाध्यते त्वया ॥२३७॥ तस्माद्बुद्धिं रणे त्यक्त्वा यद् वयं संवदामहे । प्रसीद क्रियतां देव तदेवोद्यच्छ शान्तये ॥२३८॥ मा भूत्तस्मिन् कृतक्रोधे जगदेतन्महाभयम् । विध्वस्तग्राणिसंघातं नष्टनिःशेषससि क्या हुआ क्योंकि विद्याबलके रहते हुए उसके इस कार्यमें किसे आश्चर्य हो सकता है ? ॥२२४॥ कुछ लोग यह भी कहने लगे कि इन व्यर्थके विवादोंसे क्या लाभ है ? जगत्का कल्याण करनेके लिए सन्धिका उपाय क्यों नहीं बताया जाता है ? ॥२२५॥ इसलिए रावणकी पूजा कर सीताको लाया जावे उसे हम रामके लिये सौंप देंगे फिर युद्धका क्या प्रयोजन है ॥२२६॥ संग्राममें तारक, महाबलवान् मेरुक और बड़ी-बड़ी सेनाओंसे सहित कृतवीर्यके पुत्र आदि मारे गये हैं ॥२२७॥ ये सभी तीन खण्डके स्वामी महाभागवान् तथा महाप्रतापी थे। इनके सिवाय और भी अनेक राजा रणमें सब ओर नष्ट हुए हैं ॥२२८।। इस प्रकार विद्याओंके प्रयोग करने में निपुण सब लोग परस्पर सलाह कर विनय सहित आदरपूर्वक मिलकर रामके पास आये ॥२२९।। नेत्रोंको आनन्द उत्पन्न करनेवाले रामके चारों ओर बैठे हुए सुग्रीव आदि राजा उस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि अमरेन्द्रके चारों ओर देव सुशोभित होते हैं ॥२३०॥ तदनन्तर रामने कहा कि अब और किसकी अपेक्षा की जा रही है ? दूसरे द्वीपमें सोता मेरे बिना दुःखी होती होगी ॥२३१॥ शीघ्र ही दीर्घसूत्रताको छोड़कर आज ही आप लोग त्रिकूटाचलपर चलनेके लिए उद्यम क्यों नहीं करते हैं?॥२३२॥ तब नीतिके विस्तारमें निपुण वृद्ध मन्त्रियोंने कहा कि हे देव ! इस विषयमें संशयको क्या बात है ? निश्चय बताइए कि॥२३३॥ आप सीताको चाहते हैं या राक्षसोंके साथ युद्ध ? यदि युद्ध चाहते हैं तो विजय कठिनाईसे प्राप्त होगी क्योंकि राक्षसोंका और आपका यह युद्ध सदृश युद्ध-बराबरीवालोंका युद्ध नहीं है ॥२३४।। क्योंकि रावण द्वीप और सागरोंमें प्रसिद्ध, तीन खण्ड भरतका शत्रुरहित एक-अद्वितीय ही प्रभु है ।।२३५।। धातकीखण्ड नामा दूसरा द्वीप भी उससे शंकित रहता है, वह ज्योतिषी देवोंको भी भय उत्पन्न करनेवाला है तथा जम्बूद्वीपमें परम महिमाको प्राप्त अद्वितीय विद्याधरोंका स्वामी है ॥२३६।। जो समस्त संसारके लिए शल्य स्वरूप है, तथा जिसने अनेक अद्भत कार्य किये हैं ऐसा राक्षस हे राम! तुम्हारे द्वारा कैसे जीता जा सकता है ? ॥२३७।। इसलिए हे देव! रणकी भावना छोड़ हम लोग जो कह रहे हैं वही कीजिए, प्रसन्न होइए और शान्तिके लिए उद्योग कीजिए ॥२३८॥ उसके कुपित होनेपर यह संसार महाभयसे युक्त न हो, १. दीर्घस्तत्र त्व म. । २. शिल्पीभूतोऽस्य म. । ३. सक्रियम् म. । २-३८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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