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________________ अष्टचत्वारिंशत्तम पर्व २९१ अत्रान्तरे तमुद्देशं दिग्मूढः प्रच्युतः पथः । आजगाम भ्रमन खिन्नः क्षुद्रोऽपश्यच्च तं तरुम् ॥३४२॥ घनच्छायाकृतश्रद्धस्तस्याधश्च जगाम सः । वणितं वाशृणोन्मन्दमुन्मुखश्च व्यलोकयत् ॥१४३।। यावत्पश्यति तं बद्धं निविडं दृढरजभिः । अत्यन्ततुङ्गशाखाग्रे निश्चेष्टीकृतविग्रहम् ॥१४४।। आरुह्य तेन मुक्तः सोऽनुकम्पासक्तचेतसा । गतो विनयदत्तस्तु स्वं तेनैव समाश्रयम् ।।३४५।। स्वजनस्योत्पवे 'जातो महानन्दसमत्कटः । विशालभूतिरालोक्य तं च दूरात्पलायितः ।।१४६।। क्षद् स्याथ शिखो जातु शिखिपत्रमयोऽन्यथा । रमणो वात्यया नीतः संप्राप्तो राजसूनुना ॥१४७॥ तनिमित्तं महाशोकः क्षुद्रो मित्रमभाषत । मां चेदिच्छसि जीवन्तं यच्छ तन्मे मयूरकम् ॥१४८॥ बद्धस्तथाविधो वृक्षे मया त्वं परिमोचितः । अस्योपकारमुख्यस्य प्रतिदानं प्रयच्छ मे ॥१४९॥ ततो विनयदत्तस्तमुवाचान्यमयूरकम् । गृहाण मणिरत्नं वा कुतस्तं ते ददाम्यहम् ॥१५०॥ सोऽवोचद्दीयतां मह्यं स एवेति पुनः पुनः । मूढस्तथाविधी जातो मवानपि नरोत्तमः ॥१५॥ राजपुत्रकरं प्राप्ता कृत्रिमासौ मयूरिका । कथं लभ्या वधो यस्माल्लभ्यते यत्र तत्परैः ॥१५२॥ त्रिवर्णाम्मोजनेत्राणां कन्यानां कनकत्विषास् । पीवरस्तनकुम्मानां विशालजघनश्रियाम् ॥१५३॥ वक्त्रकान्तिजितेन्दूनां पूर्णानां चारुभिर्गुणैः । पतिर्भव महाभोग प्रसीद रघुनन्दन ॥१५॥ कृतकृत्यकी तरह आनन्दसे रहने लगा तथा पूछनेपर विनयदत्तके विषयमें कुछ इधर-उधरका उत्तर देकर चुप हो जाता ।।१४१।। इसी बीचमें क्षुद्र नामका एक मनुष्य दिशा भूलकर मार्गसे च्युत हो भ्रमण करता हुआ खेदखिन्न हो वहाँसे निकला और उसने उस वृक्षको देखा ॥१४२।। वृक्षकी सघन छाया देखकर विश्राम करनेकी इच्छासे वह वृक्षके नीचे गया। वहाँ उसने विनयदत्तके कराहनेका मन्द-मन्द शब्द सुन ऊपरको मुख उठाकर देखा ॥१४३।। तो उसे अत्यन्त ऊंची शाखाके अग्रभागपर मजबूत रस्सियोंसे बँधा हुआ निश्चेष्ट शरीरका धारक विनयदत्त दिखा ॥१४४|| जिसका चित्त दयामें आसक्त था ऐसे क्षुद्र नामक पुरुषने ऊपर चढ़कर उसे बन्धन मुक्त किया । तदनन्तर विनयदत्त नीचे उतर उस क्षुद्रको साथ ले अपने घर चला गया ॥१४५॥ विनयदत्तके लानेसे उसके घरमें महान् आनन्दसे युक्त उत्सव हुआ और विशालभूति उसे देख दूर भाग गया ॥१४६।। क्षुद्र, विनयदत्तक घर रहने लगा उसके पास मयरपत्रका बना हआ एक मयरका खिलोना था सो वह खिलौना एक दिन हवामें उड़ गया और राजाके पुत्रको मिल गया ॥१४७॥ उस कृत्रिम मयूरके निमित्त बहुत भारी शोक करता हुआ क्षुद्र, अपने मित्रसे बोला कि हे मित्र! यदि मुझे जीवित चाहते हो तो मेरा वह कृत्रिम मयूर मुझे देओ ॥१४८॥ मैंने तुझे उस तरह वृक्षपर बँधा हुआ छोड़ा था सो इस मुख्य उपकारका बदला मेरे लिए देओ ॥१४९।। तब विनयदत्तने उससे कहा कि तुम उसके बदले दूसरा मयूर ले लो अथवा मणि या रत्न ले लो तुम्हारा वह मयूर कहाँसे दूँ ॥१५०।। इसके उत्तरमें वह बार-बार यही कहता था कि नहीं, मेरे लिए तो वहीं मयूर देओ। सो क्षुद्र तो मूर्ख होकर उस प्रकार हठ करता था पर आप तो नरोत्तम होकर भी ऐसा हठ कर रहे हैं ॥१५१।। आप ही कहो कि राजपुत्रके हाथमें पहुँची कृत्रिम मयरी कैसे प्राप्त हो सकती थी। राजपुत्रसे तो केवल मांगनेवालोंको मृत्यु ही मिल सकती थी ॥१५२।। इसलिए हे रघुनन्दन ! सीताको इच्छा छोड़ो और जिनके नेत्र सफेद, काले तथा लाल रंगके हैं, जिनकी कान्ति सुवर्णके समान है, जिनके स्तनकलश अत्यन्त स्थूल हैं, जिनके जघनकी शोभा विशाल है, जिन्होंने मुखको कान्तिसे चन्द्रमाको जीत लिया है तथा जो अनेक सुन्दर गुणोंसे युक्त हैं ऐसो कन्याओंके पति होकर महाभोग भोगो, प्रसन्न होओ ॥१५३-१५४।। इस हास्यजनक दुःखवर्धक हठको छोड़ो और १. स्योत्सवे जाती म. । २. जीवितं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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